आत्मकथा भाग-2 अंश-13
शिमला में रिज के पास से ही एक रास्ता जाखू चोटी की ओर जाता है। परन्तु शाम होने लगी थी, इसलिए वहाँ सुबह जाने का विचार किया। रात्रि को हमने रिज पर ही चाट वगैरह खायी और होटल में आकर सो गये। उस समय हल्की बारिश भी हुई थी, इससे काफी ठंड हो गयी थी।
मेरा इंटरव्यू दूसरे दिन 10 बजे से था। समय पर्याप्त था। इसलिए सुबह जाखू पर चढ़ने लगे। लगभग 45 मिनट में हम जाखू की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच गये। वहाँ एक बड़ा मंदिर भी है। आसपास का दृश्य बड़ा सुहावना है। वहाँ से पूरा शिमला दिखायी पड़ता है। पर वहाँ बन्दर बहुत हैं, जो जूते-चप्पलें उठा ले जाते हैं और फिर खाने-पीने की चीजें देने पर ही लौटाते हैं।
कुलदीप सिंह ने वहाँ कई फोटो खींचे। तीन-चार फोटो मेरे भी खींचे, जो बहुत अच्छे आये हैं। करीब घंटाभर जाखू पर रहने के बाद हम नीचे लौटे। फिर मैं हाथ-पैर धोकर कपड़े बदलकर इंटरव्यू देने गया। इंटरव्यू का स्थान वहाँ से काफी दूर लोअर शिमला में था। अतः मुझे पूछते-पूछते नीचे ही नीचे उतरना पड़ा। खैर, किसी तरह पहुँच गया। वहाँ इंटरव्यू के नाम पर तमाशा हो रहा था। शायद उन्होंने चयन पहले ही कर लिया था और बाहर वालों को 2-2 मिनट में फालतू के सवाल पूछकर टरका रहे थे। उसी समय संयोग से मेरे ही सेक्शन के प्रमोद मोहन चौबे भी 11 बजे के आसपास इंटरव्यू देने आ गये। उनका भी वैसा ही इंटरव्यू हुआ। करीब 1 बजे हम वहाँ से छूटे। पहले होटल आकर कुलदीप सिंह को साथ लिया, फिर मिडिल शिमला में पहुँचकर खाना खाया।
हमारा लौटने का कोई रिजर्वेशन नहीं था और कुलदीप को चंडीगढ़ या अम्बाला जाना था। इसलिए यह विचार बना कि बस में शिमला से अम्बाला चला जाये, फिर वहाँ से कोई गाड़ी पकड़कर लखनऊ पहुँच लेंगे। हिमाचल प्रदेश की बस सेवा अच्छी है, अतः हम आराम से मात्र 3-4 घंटे में अम्बाला पहुँच गये। हालांकि पहाड़ी रास्तों में जब बस मुड़ती थी, तो मुझे बहुत डर लगता था। कुलदीप सिंह वहाँ से अपने रास्ते कहीं चले गये और मैं तथा चौबेजी एक ट्रेन में भीड़ में ठुँसकर लखनऊ आये। अम्बाला में एक कुली ने हमें गाड़ी में चढ़ाने के पैसे लिये थे और किसी तरह जनरल बोगी में घुसा दिया था। लखनऊ आने तक हमारे पास बस इतने रुपये रह गये थे कि टैम्पो में बैठकर अपने घर तक आ गये।
कुलदीप सिंह की रुचि बाद में योग की तरफ हो गयी थी। वास्तव में उन्हें कुछ जुकाम वगैरह की शिकायत थी, जिसके लिए मैंने उन्हें योग करने का सुझाव दिया था। योग करते-करते उनकी रुचि बढ़ी और उन्होंने योग में कोई डिप्लोमा कोर्स भी कर लिया। आगे चलकर उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा में भी कोई डिप्लोमा कोर्स किया और अपने घर पर ही प्राकृतिक चिकित्सा करने लगे। एच.ए.एल. की नौकरी वे तब भी करते रहे। अब वे डाॅ कुलदीप सिंह के नाम से जाने जाते हैं। उन्होंने सिंगार नगर, लखनऊ में अच्छा मकान बना लिया है। उसमें एक बार मैं भी गया था और खाना भी खाया था। बहुत दिनों से एच.ए.एल. की तरफ नहीं गया हूँ, इसलिए उनसे मुलाकात नहीं हुई है। पता नहीं कि वे अब एच.ए.एल. में सर्विस करते हैं या नहीं। शायद रिटायर होने वाले होंगे।
हमारे सेक्शन में एक मात्र मुसलमान ऑपरेटर थे श्री सैयद अब्दुल हसन रिजवी। वे शिया थे और किसी नबाबी खानदान से थे। देखने में बहुत सुन्दर लगते थे। उनकी पत्नी हिन्दू महिलाओं की तरह अपने माथे पर बिन्दी लगाती थीं और माँग भी भरती थीं। वे संजय नागर के पिताजी के ऑफिस में सेवा करती थीं। रिजवी साहब से मेरे सम्बंध बहुत घनिष्ट तो नहीं थे, फिर भी काफी अच्छे थे। एक बार हम उनके घर भी गये थे। रिजवी साहब ने एक बार मुझसे कहा था कि किसी दिन वे मुझे अपने साथ ले जाकर सारा लखनऊ घुमा देंगे। पर वह दिन कभी नहीं आया। आज तक भी मैंने पूरा लखनऊ नहीं देखा है। यों मुख्य-मुख्य जगहों को मैं देख चुका हूँ।
श्री विजय कुमार लाल अपनी राजनैतिक गतिविधियों के लिए जाने जाते थे। वे अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर ‘विजय कौशल’ के नाम से नेतागीरी किया करते थे। मंच पर अच्छा भाषण दे लेते थे, परन्तु एच.ए.एल. में चुपचाप रहते थे। मेरी उनसे बहुत राजनैतिक बातें हुआ करती थीं। उनकी विचारधारा कुछ स्पष्ट नहीं थी। बस जोड़-तोड़ की बातें ही किया करते थे। वास्तव में वे फैजाबाद के एक चर्चित नेता (शायद निर्मल खत्री) के साथ लगे हुए थे। वह नेता अवसरवादी था और प्रायः दल बदलता रहता था। उसके साथ ही लाल साहब की राजनैतिक विचारधारा भी बदल जाती थी। कहना कठिन था कि वे किस पार्टी में कब तक रहेंगे और किस में कब आ जायेंगे। इसलिए जब कोई परिचित उनसे दो-तीन महीने बाद मिलता था, तो पहला सवाल यही करता था कि आजकल वे किस पार्टी में हैं।
लाल साहब ने एक बार विधानसभा चुनाव की टिकट लेने की पुरजोर कोशिश की थी और टिकट मिल जाने की स्थिति में पिछली तारीख से एच.ए.एल. की नौकरी छोड़ने तक की व्यवस्था कर ली थी, ताकि बाद में किसी कानूनी पचड़े में न फँस जायें, परन्तु उनको टिकट नहीं मिली। मेरी जानकारी तक उनकी कोई राजनैतिक प्रगति नहीं हो सकी थी। वे मुझे बहुत मानते थे और एक बार मैंने उन्हें कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भी सिखाई थी।
श्री कृष्ण चन्द्र पंत से भी मेरे बहुत अच्छे सम्बंध थे। उनके पिताजी एच.ए.एल. की डिस्पेंसरी में नौकरी करते थे, इसलिए उनका बहुत सम्मान था। कर्मचारियों की रामलीला की व्यवस्था में वे बहुत हाथ बँटाते थे। रामलीला के अवसर पर एक छोटी सी पुस्तिका भी छापी जाती थी। उसमें मैंने कई बार अपने लेख छपवाये थे- ज्यादातर अपने नाम से और कभी-कभी दूसरों के नाम से। पन्त जी स्वयंसेवक भी थे और संघ के अधिकांश कार्यक्रमों में उपस्थित रहते थे।
(पादटीप- ऊपर मैंने जिन कर्मचारियों का उल्लेख किया है, अब वे सभी अवकाशप्राप्त कर चुके हैं। कई साल बाद पन्त जी से मेरी भेंट एक विवाह के समय हुई थी। उनसे सम्पर्क बना हुआ है।)
(पादटीप- ऊपर मैंने जिन कर्मचारियों का उल्लेख किया है, अब वे सभी अवकाशप्राप्त कर चुके हैं। कई साल बाद पन्त जी से मेरी भेंट एक विवाह के समय हुई थी। उनसे सम्पर्क बना हुआ है।)
बाकी कर्मचारियों से मेरा सम्बंध सामान्य ही था। हाँ, बाद में 8 लड़कों का जो नया समूह ऑपरेटर बनकर आया था, उनके साथ मेरी बहुत आत्मीयता थी। मैंने उन्हें बहुत कुछ सिखाया था, इसलिए वे मुझे अपना गुरु मानते थे। हँसी-मजाक भी चलती थी। उन लड़कों में से सभी किसी न किसी बात में विशेष थे। संजय नागर जूडो के जिला स्तरीय चैम्पियन रह चुके थे। पी.के. पांडे कविताएँ करते थे। मुकेश खरे बहुत अच्छा गाते थे। शंकर जयराज अच्छा क्रिकेट खेलते थे और एच.ए.एल. की क्रिकेट टीम में थे। सुशील द्विवेदी का ज्ञान अच्छा था और बाद में वे किसी बैंक की सेवा में चले गये थे। साकेत बिहारी त्रिपाठी, प्रवीण कुमार तथा धवन भी अन्य सभी की तरह बहुत अच्छा कार्य करते थे। यह पूरा समूह ही मेहनती था और सेक्शन का अधिकांश कार्य ये ही किया करते थे। पुराने ऑपरेटर लोग तो बस काम की खानापूरी ही करते थे।
संजय नागर से मेरा ज्यादा घनिष्ट सम्बंध था। मैं कई बार उनके निवास पेपर मिल कालोनी, निशातगंज पर गया था। उनके पिताजी उ.प्र. सरकार की सेवा में एक अच्छी पोस्ट पर थे। संजय नागर का विवाह दिल्ली में हुआ था। उनकी बारात में मैं भी शामिल हुआ था। उनकी पत्नी उनकी तरह ही काफी लम्बी हैं। इसलिए पीठ-पीछे लोग कहा करते थे कि यह तो दिल्ली से कुतुब मीनार उठा लाया है। एक बार संजय नागर और मैंने मिलकर कम्प्यूटर पर एक किताब लिखना शुरू किया था, परन्तु काम ठीक से नहीं हो पाया। इसलिए मामला वहीं समाप्त हो गया। बाद में उस किताब को मैंने अकेले पूरा किया था, परन्तु वह कभी नहीं छपी, क्योंकि वह किताब कोबाॅल प्रोग्रामिंग (COBOL Programming) पर थी और तब तक कोबाॅल का उपयोग कम होने लगा था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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