आत्मकथा भाग-2 अंश-12
प्रारम्भ में एक बार हमारे प्रबंधक आचार्य जी ने मुझे लाइब्रेरी की किताबों की सूची तैयार करने और उनको पूरी तरह व्यवस्थित करने के लिए कहा। उस लाइब्रेरी में केवल मैनुअल थे, जो हमारे नये कम्प्यूटर के हार्डवेयर और साॅफ्टवेयर के बारे में थे। उन मैनुअलों की संख्या लगभग 200 थी। एक ही मैनुअल की 1 से 5 तक प्रतियाँ थीं। उस पर तुर्रा यह कि वे मैनुअल विभिन्न अधिकारियों ने अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार पढ़ने के लिए ले लिये थे और लौटाये नहीं थे। मैनुअल लेने-देने का कोई रिकाॅर्ड भी किसी के पास नहीं था। कई लोगों को तो यह भी मालूम नहीं था कि उनके पास कितने और कौन-कौन से मैनुअल कहाँ-कहाँ पड़े हुए हैं। मेरा कार्य था सभी मैनुअलों का भौतिक सत्यापन भी करना अर्थात् पता लगाना कि कौन-सा किसके पास कहाँ पर है। प्रारम्भ में मेरे पास केवल एक सूची थी, जिसमें बस यह लिखा था कि किस मैनुअल की कितनी प्रतियाँ आयी थीं।
काम बहुत जटिल और लम्बा था। हालांकि यह कार्य मैं अकेला भी कर सकता था, लेकिन सहायता के लिए मैंने सरकार दादा को अपने साथ लगा लिया। घोर आश्चर्य कि वे बिना आनाकानी किये तैयार हो गये और जी भरकर मेरी सहायता की। पहले तो मैंने एक रजिस्टर में सभी मैनुअलों की सूची बनायी और उन पर नम्बर डाले। जो मैनुअल उपलब्ध थे, पहले उन पर नम्बर डाल दिये। फिर जो अधिकारियों से आसानी से मिल गये, उन पर भी नम्बर डाल दिये। साथ ही सबको दो-तीन अलमारियों में व्यवस्थित किया। फिर मैंने खोये हुए मैनुअलों की सूची बनायी, तो 24-25 मैनुअल गायब मिले, यानी वे जिनका कोई अता-पता नहीं था। मैं चाहता तो अपना काम वहीं रोक सकता था, लेकिन मैंने ठान लिया था कि सभी मैनुअलों का पता लगाना है।
फिर मैंने एक-एक करके सभी अधिकारियों की मेजों के ड्राॅअरों और रैक वगैरह की खाना-तलाशी लेना शुरू किया। इस कार्य में समय तो लगता ही है, लेकिन मात्र 3 दिन में मैंने सबकी तलाशी ले डाली और लोग यह देखकर दंग रह गये कि केवल एक मैनुअल को छोड़कर सारे मैनुअल मिल गये। वह अकेला मैनुअल भी बाद में एक अधिकारी के घर पर मिल गया। इस प्रकार मेरा कार्य पूर्ण हुआ। इस पूरे कार्य में केवल 8-10 दिन का समय लगा था और लाइब्रेरी पूरी तरह व्यवस्थित हो गयी थी। फिर उसके मैनुअलों के लेन-देन का भी पूरा हिसाब रखा जाने लगा था।
उस समय तक हमारा कम्प्यूटर ठीक से चालू नहीं था, इसलिए मैंने कोई विशेष कार्य नहीं किया था। लेकिन इस कार्य से सबको विश्वास हो गया कि यह हद दर्जे का कर्मठ आदमी है। इससे भी बड़ी बात सरकार दादा से काम लेने की थी। मुझसे कुछ अधिकारियों ने कहा भी कि ‘तुम महान् हो कि सरकार जैसे आदमी से भी काम ले सकते हो, क्योंकि सभी लोग उससे कोई काम निकालने में असफल हो चुके हैं।’ लेकिन मैं जानता था कि प्यार से सब कुछ सम्भव है। बाद में भी सरकार दादा विभाग के कामों में यथासम्भव सहयोग करते रहते थे। उनसे मेरे सम्बंध अन्त तक अच्छे बने रहे। एक बार मैं उनके घर भी गया था और वहाँ भोजन भी किया था। उनकी पत्नी यानी हमारी भाभी जी बहुत स्नेहशील हैं। उनके दो पुत्र हैं, जो संगीत में अच्छी पैठ रखते हैं। उन्होंने मंचों पर भी कार्यक्रम दिये हैं। आजकल वे क्या कर रहे हैं मुझे पता नहीं। दादा तो रिटायर हो चुके हैं।
दूसरे ऑपरेटर जिनके साथ मेरी बहुत घनिष्टता थी वे थे सरदार कुलदीप सिंह। वे बहुत सज्जन और हँसमुख व्यक्ति थे। उनमें कई प्रतिभाएँ थीं। वे एच.ए.एल. के अपने काम में तो माहिर थे ही, इसके अलावा बहुत अच्छे पेशेवर फोटोग्राफर थे। वे विवाह-शादियों तथा अन्य कार्यक्रमों में फोटोग्राफी किया करते थे और अच्छी आमदनी कर लेते थे। एक बार मैंने भी उनसे संघ के गणवेश में अपना फोटो खिंचवाया था। वह युग स्टिल फोटोग्राफी का था। बाद में जब वीडियो फोटोग्राफी होने लगी, तो उन्होंने वैसा ही कैमरा खरीद लिया था। मैंने उनसे फोटोग्राफी के कई गुर सीखे थे। एक पुराना कैमरा भी मैंने उनसे खरीदा था, हालांकि मैं उसका ज्यादा उपयोग नहीं कर सका।
सरदार कुलदीप सिंह नृत्य के बहुत शौकीन थे और काफी अच्छा डांस कर लेते थे। लखनऊ में हर साल क्लार्क्स अवध होटल में नये साल की पूर्व रात्रि में एक नृत्य प्रतियोगिता होती थी। श्री कुलदीप सिंह और उनकी पत्नी प्रायः हर साल ही वहाँ से उस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीत लाते थे।
एक बार मुझे शिमला से हि.प्र. सरकार की कम्प्यूटर कम्पनी हिपट्राॅन से इंटरव्यू के लिए काॅल लैटर मिला। मैंने शिमला जाना तय किया और कुलदीप सिंह से कहा कि आप भी मेरे साथ चलिए। वे खुशी से तैयार हो गये। मैंने पंजाब मेल से अम्बाला तक जाने का आरक्षण करा लिया, जो पहले वेटिंग में मिला, फिर पक्का हो गया। मुझे उम्मीद थी कि कम्पनी से मुझे आने-जाने का किराया मिल जाएगा और जो थोड़ा सा अतिरिक्त खर्च होगा, वह मैं कर लूँगा। हालांकि कम्पनी ने कोई किराया नहीं दिया, लेकिन इस यात्रा में बहुत आनन्द आया। अम्बाला से हम किसी गाड़ी में कालका तक आये और वहाँ से टाॅय ट्रेन में बैठे, जो जाने के लिए तैयार ही खड़ी थी। पहाड़ी ट्रेन में बैठने का वह मेरे लिए पहला (और अभी तक अन्तिम) अवसर था। इस रेलगाड़ी में सफर बहुत मजेदार रहा। बल खाती हुई ट्रेन सैकड़ों सुरंगों से होकर निकलती थी और बीच-बीच में छोटे-छोटे साफ-सुथरे स्टेशनों पर रुकती थी।
उसी गाड़ी में सूरत से आये हुए 7-8 लड़कों का एक समूह भी यात्रा कर रहा था। वे लड़के एक-एक क्षण का आनन्द ले रहे थे। वे हर स्टेशन पर उतरते थे और चलती गाड़ी में चढ़ते थे। रास्ते में किसी पहाड़ी पर या मकान की छत पर कोई सुन्दर लड़की दिखाई पड़ जाती थी, तो वे उसकी ओर हाथ हिलाते थे। कभी-कभी वह लड़की भी हाथ हिला देती थी, तो सब बहुत खुश होते थे।
यह आनन्ददायक सफर दोपहर 12 बजे के बाद शिमला में समाप्त हुआ। हमने रिज का नाम सुना था। इसलिए वहीं होटल में ठहरने का विचार किया। हमें यह अंदाज नहीं था कि वह कितना ऊपर है। इसलिए अपने पास जो थोड़ा सा सामान था, उसे लेकर चढ़ने लगे। जल्दी ही हमारी साँस फूल गयी। एक कुली हमारे पीछे पहले से ही लगा हुआ था। वह बार-बार कह रहा था कि आप इसे ऊपर तक नहीं ले जा पायेंगे। हारकर हमने उससे सामान ढुलवाया। उसने इसके 10 रुपये लिये, जो उन दिनों के हिसाब से हमें ज्यादा लग रहे थे, परन्तु मजबूरी थी।
रिज पर पहुँचकर हमने एक होटल में कमरा ले लिया। वहाँ का पानी बहुत ठंडा था। होटल से गर्म पानी मिल सकता था, परन्तु वे बहुत देर लगा रहे थे। इसलिए हमने थोड़े-थोड़े पानी से किसी तरह नहाने की रस्म निभायी और कपड़े बदलकर पहले खाना खाने गये। वहाँ अच्छे होटल थे, लेकिन काफी मँहगे थे। इसलिए हम मिडिल शिमला में गये, जो रिज से थोड़ा नीचे है। वहाँ से उतरने के लिए सीधा सा रास्ता भी है। वहाँ हमने एक ढाबे पर खाना खाया। वहीं पास में ही बस अड्डा था। वहाँ गन्दगी बहुत थी। रिज उसकी अपेक्षाकृत काफी साफ-सुथरा था।
मिडिल शिमला से रिज आते समय हम रास्ता भूल गये, लेकिन एक पुलिसवाले से पूछकर ऊपर आ गये। फिर हम रिज पर काफी देर बैठे और वहाँ आसपास घूमे। माल रोड पर भी टहले, परन्तु उस दिन रविवार था, इसलिए खास चहल-पहल नहीं थी। बाजार कुछ महँगे भी लगे। हमने सोचा कि हिमाचल प्रदेश में सेब पैदा होता है, तो यहाँ सस्ता होना चाहिए। परन्तु जब हमने उसका रेट पूछा, तो वह लखनऊ से भी ज्यादा था। वैसे टूरिस्ट सेंटरों में सभी चीजें ऐसे ही मँहगी मिलती हैं। हम भारतीय भले ही अपनी अतिथि सत्कार की परम्परा का दम्भ करते हों, लेकिन बाहरी लोगों को जी भरकर लूटते हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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