आत्मकथा भाग-2 अंश-11
हमारा नया और बड़ा कम्प्यूटर बरोज कम्पनी का था। उसकी देखरेख का ठेका सीएमसी लि. नामक कम्पनी को दिया गया था। उस कम्पनी के एक हार्डवेयर इंजीनियर हमारे सेक्शन में स्थायी रूप से पदस्थ थे। उनका नाम था श्री बाला सुब्रह्मण्यम्। उनको बोलचाल में सब ‘बालू’ कहते थे, लेकिन मैं उन्हें पीछे से ‘भालू’ कहता था। उनकी पहाड़ जैसी काया, तवे जैसा काला रंग, फूले हुए नथुने और मोटे काँच के चश्मे के पीछे से झाँकती उनकी बड़ी-बड़ी आँखों की तुलना सहज ही भालू के साथ की जा सकती । वैसे वे काफी योग्य थे और मेहनती इतने थे कि लगातार घंटों तक जमीन पर बैठकर कम्प्यूटर को ठीक करते रहते थे।
उन दिनों यू.पी.एस. नहीं हुआ करते थे। कम्प्यूटर को सीधे लाइन से स्टैबिलाइजर के माध्यम से बिजली की सप्लाई हुआ करती थी। हालांकि एच.ए.एल. में बिजली की अच्छी व्यवस्था थी और बहुत कम जाती थी, परन्तु यदि वह एक सेकंड के लिए भी जाती थी, तो कम्प्यूटर ठप्प हो जाता था। इससे सभी चलते हुए काम यानी प्रोग्राम रुक जाते थे और कम्प्यूटर को फिर से स्टार्ट करना पड़ता था। इस क्रिया को क्लीयर स्टार्ट (Clear Start) करना कहा जाता था। उन दिनों कभी-कभी दिन में 8-10 बार भी क्लीयर स्टार्ट करना पड़ता था। कई बार ऐसा भी होता था कि बिजली जाने से कम्प्यूटर का मुख्य प्रोग्राम यानी ऑपरेटिंग सिस्टम तथा हार्ड डिस्क भी खराब सी हो जाती थी। ऐसा होने पर पहले तो हार्ड डिस्क की सफाई करनी पड़ती थी, फिर ऑपरेटिंग सिस्टम उस पर फिर से लोड करना पड़ता था। इस प्रकार कम्प्यूटर को बिल्कुल ऐसे चलाना पड़ता था, जैसे वह पहली बार चलाया जा रहा हो। इस क्रिया को कोल्ड स्टार्ट (Cold Start) करना कहा जाता था।
वह कम्बख्त कम्प्यूटर इतना नाजुक था कि हर तीसरे-चौथे दिन उसे कोल्ड स्टार्ट करना पड़ता था। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि एक ही दिन में दो-दो बार कोल्ड स्टार्ट करना पड़ा हो। ऐसे ही एक दिन जब बालू जी कम्प्यूटर को कोल्ड स्टार्ट करने में लगे हुए थे, तो मैंने उनसे व्यंग्य में कहा- ‘एक बार इसे हाॅट स्टार्ट (Hot Start) करो, मिस्टर बालू’। वे बोले- ‘यह कोई मजाक नहीं है, क्योंकि एक वार्म स्टार्ट (Warm Start) भी होता है।’ मैंने कहा- ‘तो वही करो।’
वैसे उस कम्प्यूटर का साॅफ्टवेयर बहुत शक्तिशाली था। इसलिए मैं प्रायः मजाक में कहता था कि ‘यह एक विचित्र कम्प्यूटर है। इसका साॅफ्टवेयर तो हार्ड है और हार्डवेयर साॅफ्ट है।’ इस पर सब लोग हँसते थे।
बालू जी काफी दूरदर्शी भी थे। एक बार बातचीत में उन्होंने मुझसे कहा था कि भविष्य में ऐसे पेशेवरों की बहुत माँग होने वाली है, जो हार्डवेयर ठीक कर सकते हों और थोड़ा सा साॅफ्टवेयर का ज्ञान भी रखते हों। मैं उस समय उनकी बात का महत्व नहीं समझ पाया था, लेकिन बाद में मुझे उसकी सत्यता का ज्ञान हुआ। जब घर-घर में पीसी, डेस्कटाॅप और लैपटाॅप आ गये तो ऐसे पेशेवरों की अच्छी माँग होने लगी थी।
कुछ समय बाद श्री बालू के सम्बंध हमारे सेक्शन के कुछ अधिकारियों से बिगड़ गये, खास तौर से श्री हरमिंदर सिंह से, जो कम्प्यूटर के इंचार्ज थे। बात किसी मैनुअल की थी, जिसे शायद हरमिंदर जी ने छिपा लिया था। दुर्भाग्य से उस मैनुअल की दूसरी प्रति उपलब्ध नहीं थी, इसलिए बालू जी बहुत भन्नाये थे। लगभग दो-ढाई साल एच.ए.एल. में हमारे सेक्शन में रहकर जब बालू जी का स्थानांतरण हुआ, तो सेक्शन ने उनको औपचारिक विदाई भी नहीं दी थी। इसका मुझे बहुत बुरा लगा था, लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकता था। श्री बालू के बाद जो इंजीनियर वहाँ आये थे, वे वहाँ केवल 6 महीने रहे थे, लेकिन उनको बाकायदा विदाई दी गयी थी।
श्री बाला सुब्रह्मण्यम् के साथ एक और इंजीनियर थे श्री आप्टे। उनके साथ हमारे बहुत अच्छे सम्बंध बन गये थे। वे हमारे साथ चिनहट की पिकनिक पर भी गये थे। दुर्भाग्य से वे बम्बई में एक मोटर साइकिल दुर्घटना में घायल हो गये और शायद इलाज में लापरवाही से काॅमा में चले गये। तीन-चार माह बाद काॅमा में ही उनका देहांत हो गया था। इसका हमें बहुत दुःख हुआ था।
प्रारम्भ में हमें ट्रेनिंग देने के लिए एक साॅफ्टवेयर इंजीनियर भी वहाँ रहे थे। उनका नाम था श्री दत्ता राम, लेकिन लोग उनके नाम का गलत उच्चारण ‘दाता राम’ किया करते थे। उसको अंग्रेजी में "Data Ram" लिखा जाता था और ‘डाटा राम’ पढ़ा जाता था। हालांकि उनका ज्ञान बहुत अच्छा नहीं था और मेरे कई प्रश्नों का वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते थे। कम्प्यूटर कम्पनी के इंजीनियरों को हमारे यहाँ अर्थात् एच.ए.एल. में अधिकारियों जितना ही सम्मान दिया जाता था, जिसके वे पात्र भी थे।
अधिकारियों के अलावा वहाँ ऑपरेटर कर्मचारियों की एक बड़ी संख्या थी, जिनके नामों का उल्लेख ऊपर कर चुका हूँ। इस सभी के बारे में विस्तार से बताना न तो सम्भव है और न आवश्यक ही। लेकिन कुछ के बारे में अवश्य बताना चाहूँगा।
उनमें सबसे प्रमुख नाम है श्री तारक नाथ सरकार का। वे अपने मोहल्ले में ‘हिटलू सरकार’ के नाम से जाने जाते थे। जैसा कि नाम से स्पष्ट है वे बंगाली थे और लखनऊ में ही पैदा हुए थे। इसलिए उनका बंगाली और हिन्दी दोनों का ज्ञान उच्चकोटि का था। उनकी विशेषता यह थी कि वे नाटककार थे। नाटक लिखते भी थे और खेलते भी थे। उनके नाटक प्रायः रेडियो पर प्रसारित होते थे। एक-दो नाटक टी.वी. पर भी आये थे। रेडियो पर प्रसारित होने वाले नाटकों की रिकाॅर्डिंग बहुत सावधानी से करनी पड़ती थी। उसमें कोई एक्शन नहीं होता, केवल डायलाॅग और ध्वनियाँ होती हैं। एक बार एक नाटक की रिकाॅर्डिंग देखने मैं भी श्री तारक नाथ सरकार के साथ गया था। उस दिन वहाँ लखनऊ की कुमकुम धर नामक प्रसिद्ध अभिनेत्री भी रिकाॅर्डिंग के लिए आयी थी।
तारक नाथ सरकार को सब लोग ‘दादा’ कहा करते थे। बंगाल में इसका अर्थ होता है ‘बड़े भाई’। वे थे भी बड़े भाई जैसे, क्योंकि काफी वरिष्ठ थे। मुझे वे छोटे भाई की तरह मानते थे और मैं भी उन्हें बड़े भाई का सा सम्मान देता था। हालांकि प्रारम्भ में मेरे साथी पुराने अधिकारियों ने मुझे चेताया था कि यह आदमी कोई काम नहीं करता और परेशानी पैदा करता है, इसलिए इससे दूर रहना। पर मेरे ऊपर ऐसी सलाहों का उल्टा ही असर होता था। वैसे भी मेरा स्वभाव सबसे घुलने-मिलने का है। इसलिए मैं अधिकारियों और कर्मचारियों में समान रूप से लोकप्रिय अथवा अलोकप्रिय था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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