आत्मकथा भाग-1 अंश-61
तब तक जवाहरलाल नेहरू वि.वि. से मेरा मन एकदम उचट गया था। वहाँ के दमघोंटू वातावरण, जो अब सारे कैम्पस पर छा गया था, में मैं बिल्कुल नहीं जाना चाहता था। उस समय तो वहाँ तीन-चार महीने तक जाने का प्रश्न ही नहीं था। यही सोचकर मैं अपने साथ मात्र 500 रुपये और छोटा-मोटा सामान लेकर माताजी-पिताजी तथा भाभीजी-भाईसाहब के चरण छूकर दिल्ली के लिए चल पड़ा।
सबसे पहले मैं केशव कुंज गया। वहाँ इन्द्रेश जी से मिला। उनके रुपये वापस किये और घर से लायी थोड़ी-सी मिठाई भी भेंट की। उन्हें मेरी नौकरी की मुझसे ज्यादा चिन्ता थी। उनसे मैंने उस घर की चाबी की पूछताछ की, जहाँ मेरा सामान रखा हुआ था। पता चला कि चाबी संजय सत्यार्थी जी के पास है। उनका ठीक-ठीक ठिकाना मुझे ज्ञात नहीं था, लेकिन यह पक्की तरह पता था कि वे ज.ने.वि. कैम्पस में दिन में आते हैं। यह सोचकर मैं वि.वि. कैम्पस में आ गया। वहाँ मैंने संजय जी को बहुत ढूँढ़ा, लेकिन कोई पता नहीं चला।
मेरी सारी किताबें और कुछ अन्य सामान मेरे होस्टल के कमरे में अभी भी रखा हुआ था। उसे सुरक्षित स्थान पर रखना आवश्यक था, नहीं तो मेरा काफी नुकसान हो जाता। मेरे प्रमाण पत्र भी वहीं रखे हुए थे। उस ताले पर फिर से सील लगा दी गयी थी और वार्डन ने उसे खोलने की अनुमति देने से इंकार कर दिया। उसने कहा कि मैं अपने होस्टल के प्रोवोस्ट से अनुमति लेकर आऊँ। परेशान-सा मैं प्रोवोस्ट के घर गया और अपनी समस्या बताकर कमरा खोलने की अनुमति चाही। काफी कहने-सुनने पर वे इस शर्त पर अनुमति देने को तैयार हुए कि मैं 12 बजे तक सारा सामान निकाल लूँगा और कमरा पूरी तरह खाली कर दूँगा। उस समय प्रातः के 10 बजे हुए थे और मेरे पास केवल 2 घंटे थे। इतना भी समय पर्याप्त जानकर मैंने आकर अपना ताला खोला और किताबों को बाँधना शुरू कर दिया।
एक घंटे के अन्दर मैंने ज्यादातर सामान और सभी किताबों की पैकिंग कर ली। लेकिन काफी छोटा-मोटा सामान मेरा अभी भी वहीं पड़ा हुआ था, जिसे बाँधना सम्भव नहीं था। होस्टल में उस समय कुछ कमरे इसलिए सुरक्षित किये गये थे कि छात्र कमरा खाली करते समय अपना कुछ सामान अपनी जिम्मेदारी पर उनमें रख सकते थे। काफी कह सुनकर होस्टल के केयर टेकर (देखभाल करने वाला) को अपने तीन चार बंडल एक कमरे में रखने को राजी किया। यह करते-करते साढ़े ग्यारह बज गये थे। लखनऊ ले जाने के लिए कुछ सामान मैंने एक बक्से में रख लिया और कुछ महत्वपूर्ण कागज आदि एक अटैची में रख लिये।
कमरा खाली करके भी मैंने अपना ताला लगा दिया। मैंने सोचा कि यदि मेरे कमरे का ताला नहीं तोड़ा जाता है तो मैं जुलाई में आकर बाकी छोटी मोटी चीजें भी इकट्ठी कर लूँगा। ठीक साढ़े ग्यारह बजे मैंने कमरा छोड़ दिया।
कमरा छोड़ देने के बाद मुझे फिर संजय जी का इन्तजार करना था। बैठने के लिए कोई अच्छी जगह नहीं थी और मुझे नींद भी आ रही थी। अतः मैं एक होटल में खाना खाकर मैस में जाकर लेट गया। वहीं मैंने अपना सामान रख दिया जो लखनऊ ले जाना था। तभी मुझे अपने गाइड की याद आयी। उनका घर पास में ही था और मैं अभी तक उनसे मिला भी नहीं था, अतः मैंने सोचा कि दोपहर उनके ही घर गुजारी जाय। खाना मैं खा ही चुका था, इसलिए उसकी चिन्ता नहीं थी। यह सोचकर मैं डॉ. सदानन्द के घर गया। सौभाग्य से वे घर पर ही मिल गये। वे यह जानकर बहुत खुश हुए कि अब मैं नौकरी पर जा रहा हूँ।
वहाँ मैं थोड़ी देर लेटा। शाम के 5 बजने पर मैं बाहर निकला यह देखने कि संजय जी शायद आ गये हों। मेरे आश्चर्य और खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने देखा कि संजय जी उसी घर के बाहर मेरा इन्तजार कर रहे थे, जहाँ हमारा सामान रखा हुआ था। केशव कुंज से उन्हें यह सूचना मिल गयी थी, यद्यपि कुछ देरी से, कि मैं अपना सामान लेने आया हूँ और उन्हें ढूँढ़ रहा हूँ। तुरन्त ही मैंने अपना आवश्यक सामान निकाला। बाकी वहीं रहने दिया और लखनऊ जाने के लिए सारा सामान इकट्ठा कर लिया। संजय जी उसी समय चले गये और मैं भी अब लखनऊ जाने के लिए एकदम तैयार था।
वापस डॉ. सदानन्द के घर जाकर मैंने उन्हें सूचना दी कि मेरा सारा सामान मिल गया है और अब मैं 8 बजे तक स्टेशन पर पहुँच जाना चाहता था। डॉ. सदानन्द ने कहा भी कि मैं खाना खाकर जाऊँ, नहीं तो शायद समय न मिल सके। लेकिन खाना बनने में देर लगती और मेरे पास ज्यादा समय नहीं था, अतः मैं चाय पीकर ही स्टेशन के लिए चल दिया।
जिस समय मैं स्टेशन पहुंचा उस समय रात के 8 बज रहे थे। लखनऊ मेल प्लेटफार्म पर आ चुकी थी और उसमें काफी भीड़ भी थी। मेरा रिजर्वेशन था नहीं, इसलिए मुझे सामान्य बोगी से ही जाना था। समय नष्ट करना गलत होता, अतः मैंने तुरन्त टिकट लिया और एक साधारण डिब्बे में घुस गया। उसमें काफी भीड़ थी, लगभग सारी जगह भर गयी थी। अन्दर घुसने के लिए मुझे संघर्ष करना पड़ा। सामान रखने के लिए भी थोड़ी खींचतान करनी पड़ी। लेकिन बैठने की जगह न मिलने के कारण मैंने अपने बिस्तर का गट्ठर फर्श पर रख दिया और उसके ऊपर बैठ गया।
मैंने उस शाम एक चाय के सिवा कुछ भी खाया-पिया नहीं था। अगर मैं प्लेटफार्म पर कुछ खाने जाता, तो मुझे डर था कि लोग मेरी जगह पर कब्जा कर लेंगे और फिर अन्दर घुसना भी मुश्किल होगा। अतः मैं भूख-प्यास दबाकर बैठा रहा। ठीक 9 बजे गाड़ी छूटी और उसके साथ ही मैं भी भूखा-प्यासा ही अफसर बनने के लिए चल पड़ा।
-- डॉ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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