आत्मकथा भाग-1 अंश-60

लड़कों के रफू चक्कर होने की सजा जेल के अधिकारियों को भी भुगतनी पड़ी। जेलर और उपजेलर सहित आठ लोगों को निलम्बित कर दिया गया। हमारा जेलर एक बहुत लम्बा और रौबदार आदमी था। हम सब फाटक के बीच में कटे हुए दरवाजे से होकर अन्दर बाहर आते जाते थे और हमें सिर भी झुकाना पड़ता था। लेकिन वह पूरा फाटक खुलवाकर बड़ी शान से नाक ऊँची करके निकलता था। जब वह निलम्बित हो गया तथा गिरफ्तार भी होकर जमानत पर छूटा, तो लड़के मजाक में कहा करते थे कि अब यह भी हमारी तरह सिर झुकाकर फाटक में घुसा करेगा और खाने के लिए थाली लेकर लाइन में खड़े रहा करेगा। बीच में वह एक-दो बार सादे कपड़ों में हमसे मिलने भी आया।
बी-क्लास मिलने के बाद हमारा खाना बहुत सुधर गया था। खाना बनाने का सारा सामान हमारे पास आ जाता था और कुछ सजा काट रहे सी-क्लास के कैदियों को लगाकर खाना बनवाया जाता था। कई लड़कों ने इस बात की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी और वे उस जिम्मेदारी को बड़ी लगन के साथ निभाया करते थे। खाना बनाने में प्रायः देर अवश्य हो जाती थी लेकिन मिलता बहुत अच्छा था। रोज ही पूड़ी, चावल या पुलाव, दाल, सब्जी, खिचड़ी, खीर, दूध, केले, बिस्कुट, अंडा, ब्रेड, चाय, काफी आदि मिला करते थे। लड़के मुफ्त के इस बढ़िया खाने को पाकर बहुत खुश रहते थे। सारा दिन हम गप्पों में या ताश खेलने में बिता देते थे। मैंने ‘ट्वेन्टी नाइन’ नामक ताश का खेल वहीं पर सीखा और दो-तीन दिन में ही मैं इस खेल में पारंगत हो गया था। कई लड़के शतरंज खेलते रहते थे और बहुत से वाॅलीबाल भी। संगीत प्रिय छात्र ढोलक मजीरों पर तरह-तरह के भजन-गीत आदि गाया करते थे। कुल मिलाकर हम वहाँ बहुत खुश थे।
इसी बीच एक दिन मेरे बड़े भाई डा. राममूर्ति सिंघल भी मुझसे मिलने जेल में आये। मेरा काफी दिन तक पत्र न पहुंचने पर और अखबारों में गिरफ्तारी के समाचार छपने पर उन्हें शंका हुई थी। इसलिए भाईसाहब को माताजी-पिताजी ने आगरा से भेजा था। उन्होंने मुझे 100 रुपये दिये। मैंने कहा कि किसी बात की चिन्ता न करें और मैं जल्दी ही बाहर आकर लखनऊ नौकरी करने चला जाऊँगा।
लेकिन हमारे साथ बहुत से ऐसे लड़के भी थे, जो हर समय जमानत पर बाहर जाने की रट लगाते रहते थे। ऐसे लोगों में एस.एफ.आई. के समर्थक अधिक थे, जो वैसे तो बहुत क्रान्तिकारी बनते हैं, लेकिन समय पड़ने पर दुम दबाकर भाग जाते हैं। लेकिन हमारी जमानत होना भी आसान नहीं था, क्योंकि हम सबने अपने गलत नाम दे रखे थे। कोई भी व्यक्ति जाली नाम पर हमारी जमानत लेने को तैयार नहीं होता। प्रत्येक छात्र संगठन के सदस्य अपने अपने आकाओं के माध्यम से जमानत लेने की कोशिश करने लगे। सबसे पहली सफलता एस.एफ.आई. के ही समर्थकों को मिली। उन सबको अपना असली नाम बताना पड़ा। तब सबने यही तय किया कि सब अपना-अपना असली नाम बताकर जमानत ले लें। सब लोगों के हाथ की छाप भी ली गयी और जिनके पास अपना परिचय पत्र नहीं था, उन्हें फोटो भी खिंचवाना पड़ा। मैं भी अपना परिचय पत्र नहीं ला सका था, अतः मुझे भी फोटो खिंचवाना पड़ा।
अदालत से हमारी जमानत पर रिहाई के आदेश हो चुके थे। अतः हमारे जो सहयोगी और मित्र बाहर रह गये थे, उन्होंने भाग-दौड़ करके हमारी जमानत करा दी। आखिर सब लोग 21 मई, 1983 को अर्थात् पूरे 10 दिन बाद शाम 7 बजे तिहाड़ जेल से बाहर आ गये।
बाहर आकर मुझे ज्यादा खुशी नहीं हुई, क्योंकि अब मुझे सन्देह हो चला था कि लखनऊ में मुझे नौकरी पर नहीं लिया जायेगा। मेरा व्यक्तिगत विचार यह था कि चार दिन की रिमांड और पूरी करके हम सब कोर्ट में पेश होते और वहाँ मजिस्ट्रेट को अपनी राम कहानी सुनाकर रिहाई हासिल करते। लेकिन मेरे विचार को दूसरे लोगों का समर्थन नहीं मिला और वे किसी भी तरह बाहर जाना चाहते थे। उनका विचार था कि एक बार बाहर पहुँच जायें, तो सारा मामला किसी न किसी तरह खत्म करा ही देंगे। लेकिन उनकी आशा गलत सिद्ध हुई। अभी भी सारे छात्रों पर सभी संगीन केस लगे हुए हैं और आज तक एक भी तारीख नहीं पड़ी है। केस वापस कराने के सारे प्रयत्न अभी तक असफल ही सिद्ध हुए हैं।
(पादटीप- सारे केस लगभग डेढ़ साल बाद वापस लिये गये थे।)
वन्दिरा राज में हमें न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी, क्योंकि जिन लोगों ने हमारे खिलाफ केस लगाये थे, लगभग वही लोग हमारी किस्मत का फैसला करने वाले थे। एक शेर है -
उन्हीं का शहर, वही मुद्दई, वही मुंसिफ।
मुझे यकीन था मेरा ही कसूर निकलेगा।।
हमारे रिहा होते समय वहाँ संघ और विद्यार्थी परिषद के एक प्रचारक मा. सुरेश जी आ गये थे, जिनके साथ संघ से सम्बन्धित हम आठ-दस लड़के उसी समय दिल्ली में संघ के प्रमुख कार्यालय केशव कुंज गये। वहाँ संघ के प्रचारक मा. इन्द्रेश जी ने हमें अपने हाथों से चाय बनाकर पिलायी और हमारी हिम्मत भी बढ़ाई। फिर हमने वहीं खाना खाया और रात बितायी। इन्द्रेश जी ने आगरा जाने के लिए मुझे 50 रुपये भी उधार दिये।
प्रातः होने पर मैं सबसे पहले अपने होस्टल गया। वहाँ मेरे कमरे के ताले पर सील लगी हुई थी। वार्डेन से कहकर मैंने सील तोड़ी और अपना कुछ सामान लिया। मेरा अधिकतर सामान संघ के कार्यकर्ताओं ने पहले ही दूसरी जगह पहुंचा दिया था। उनमें मेरे कपड़े और बिस्तर भी शामिल थे। लेकिन सभी किताबें तथा कुछ अन्य चीजें उस कमरे में अभी भी पड़ी हुई थीं। जिनको सुरक्षित स्थान पर रखना आवश्यक था, क्योंकि वार्डन ने कहा था कि जून-जुलाई में सभी कमरों को खोला जायेगा (आवश्यक हुआ तो ताला तोड़कर भी) तथा सामान फेंक दिया जायेगा। उस समय सारा सामान न तो आगरा ले जाना संभव था और न किसी सुरक्षित स्थान पर रखना ही। अतः मैंने यह विचार बनाया कि अभी मैं आगरा जाऊँ और वहाँ से आवश्यक सामान और रुपये लेकर वापस दिल्ली जाऊँ। फिर यहाँ सामान को सुरक्षित स्थान पर रखकर लखनऊ चला जाऊँ।
रेलवे में आरक्षण कराने का समय नहीं था। अतः मैं तुरन्त आगरा चल पड़ा। उस दिन 22 मई थी। मेरे आगरा पहुँचने पर सभी बहुत खुश हुए और मेरा लखनऊ जाने का विचार जानकर भी प्रसन्न हुए। यद्यपि हमें इस बात का सन्देह था कि मुझे नौकरी पर ले लिया जायेगा या नहीं, क्योंकि मैं एक-दो दिन लेट हो गया था। फिर भी पिताजी ने कहा कि यदि चार्ज मिल जाता है तो ठीक है, नहीं तो वापस आ जाना। मुझे वैसे नौकरी की ज्यादा चिन्ता नहीं थी, क्योंकि दिल्ली में एन.आई.सी. में भी मेरी नौकरी लगना तय था। फिर सोचा कि बेकार बैठने से तो अच्छा ही है कि दो-चार महीने लखनऊ में ही नौकरी कर ली जाये। अगर वहाँ अच्छा न लगा तो दिल्ली वापस आ जाऊँगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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