आत्मकथा भाग-1 अंश-59

बारी-बारी से बसों में भरकर हम लोग तिहाड़ जेल के एक वार्ड में लाये गये। वहाँ हमें कम्बलों का ढेर दिखा दिया गया। दो-दो तीन-तीन कम्बल उठाकर हम लोग इधर-उधर लेट गये। कई लोग भूखे ही सो गये। प्रातः उठने पर हम समाचार पत्रों तथा चाय का इन्तजार करने लगे। हमें सी-क्लास दी गयी थी, अतः चाय के नाम पर जो कुछ आया वह आया 10 बजे। लेकिन इससे पहले ही समाचार पत्रों के साथ जो समाचार आया, उसने हम सबको स्तब्ध कर दिया।
समाचार यह था कि हम सबको कई संगीन आरोपों में गिरफ्तार किया गया था, जिनमें प्रमुख थे- हत्या का प्रयास, अपहरण, हत्या के लिए अपहरण, डकैती, दंगा, आगजनी, मारपीट, लूटपाट आदि-आदि। यानी बलात्कार के आरोप को छोड़कर लगभग सारी भारतीय दंड संहिता हमारे ऊपर चिपका दी गयी थी। इनमें उस धारा 144 का कोई उल्लेख नहीं था, जिसे तोड़कर हमने गिरफ्तारी दी थी। समाचार में आगे बताया गया था कि आरोपों की जाँच चल रही है और हमें 14 दिन की पुलिस रिमांड पर रखा गया है, जिसके बाद हमें कोर्ट में पेश किया जायेगा।
यह हमारे साथ जबर्दस्त धोखा था। ऊपर जिन धाराओं का जिक्र किया गया है उन्हें पढ़कर कौन नहीं हँसेगा? लेकिन पुलिस और विश्वविद्यालय के अधिकारियों में अगर इतनी ही शर्म होती, तो इस बात का मौका ही नहीं आता। उन्होंने जी खोलकर अपनी धूर्तता, बेईमानी, झूठ और नीचता का परिचय दिया था। गिरफ्तारी के समय हमें यही बताया गया था कि हमें धारा 144 तोड़ने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। हम सब स्वेच्छा से ट्रकों में शान्तिपूर्वक चढ़े थे। हमारे पास कोई हथियार तो क्या, मामूली डंडा भी नहीं था। दूसरे हमें किसी मजिस्ट्रेट के सामने भी पेश नहीं किया गया था और न जेल भेजते समय हमें आरोपों को पढ़कर सुनाया गया था। जाहिर है सारी कार्यवाही अनैतिक और अन्यायपूर्ण थी।
लेकिन हम अब पछताने के सिवा कुछ नहीं कर सकते थे। बिडम्बना तो यह है कि अधिकांश समाचारपत्रों, जिनमें स्वयं को निष्पक्ष बताने वाला तथाकथित राष्ट्रीय समाचार पत्र ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ भी शामिल था, की सहानुभूति विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ थी और बिना यह जाने कि छात्रों को घेराव जैसा कदम उठाने पर क्यों बाध्य होना पड़ा, वे छात्रों की आलोचना कर रहे थे और उन्हें कठोर से कठोर दंड दिये जाने के पक्ष में थे। हम जानते थे कि इन सबके लिए आदेश ‘ऊपर’ से आये थे। उस समय दिल्ली की गद्दी पर इन्दिरा गांधी विराजमान थीं और दिल्ली का उप राज्यपाल था इमरजेंसी का कुख्यात जगमोहन, जिसका नाम तक लेने में भी छात्र घृणा से थूक देते थे।
इन्दिरा गांधी यह मौका हाथ लगने पर छात्रों से अपना विरोध करने का बदला गिन-गिनकर ले रही थीं। उन्हें यह ख्याल नहीं था कि इस तरह की अत्याचारपूर्ण कार्यवाही से देश के कितने भावी कर्णधारों की जिन्दगी मिट्टी में मिल सकती है। कहीं फरियाद करने का भी कोई अर्थ नहीं था। यह जानते हुए भी कि सभी गिरफ्तार छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षित हैं, हमें पहले सी-क्लास दी गयी, जो कि सामान्य अपराधियों को दी जाती है। पहले दिन हमें सी-क्लास का ही ‘खाना’ खाने को मिला, जिसमें थे चने की दाल और रोटी। करीब दो दिन ऐसे ही खाने पर रखने के बाद ही हमें बी-क्लास दी गयी और तब हमें अपना खाना स्वयं बनवाने का अधिकार मिला। एक शेर है -
किस किसके हाथों में ढूँढ़ूँ लहू अपना।
तमाम शहर ने पहने हुए हैं दस्ताने।।
यह शेर हमारी उस हालत पर सही बैठता था।
इधर हम जेल में अपनी रिमांड पूरी होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, उधर विश्वविद्यालय के कैम्पस में बचे हुए छात्रों पर अत्याचारों का सिलसिला जारी था। वि.वि. को अनिश्चित काल के लिए बंद घोषित कर दिया गया था और छात्रों को दो दिन, जिसे सरकारी भाषा में 48 घंटे कहा जाता है, में सारे कमरे खाली करने और वहाँ से भाग जाने का आदेश दिया गया था। कैम्पस में तनाव अपनी चरम सीमा पर था और कई लड़के अन्त समय तक डटे रहने के पक्ष में थे, चाहे उन्हें फाँसी पर ही क्यों न चढ़ जाना पड़े। लेकिन ज्यादातर छात्र और छात्र नेता टकराव बचाने के पक्ष में थे, अतः होस्टल खाली करने का निर्णय लिया गया।
मेरे कमरे की चाभी मेरे पास ही थी और मैं अपने कमरे का बल्ब जलता ही छोड़ आया था। मैं केवल एक शर्ट और पैंट पहने हुए था और पैरों में हवाई चप्पल मात्र थी। किसी तरह मैंने अपनी चाबी भेजी और अपने दोस्तों के द्वारा अपने कपड़े आदि मँगाये। उन्होंने मेरे कमरे का काफी सामान भी गट्ठरों में बाँधकर अपने हितैषी एक अध्यापक के घर में रख दिया था। दूसरे कपड़े आने में लगभग चार दिन लग गये थे। तब तक मेरा हुलिया बहुत बिगड़ गया था। दाढ़ी बढ़ गयी थी, कपड़े गन्दे हो गये थे तथा जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी, ताकि बाहर से कोई चीज मंगायी जा सके। सबका लगभग यही हाल था। नये कपड़े आने पर हमारा हुलिया कुछ दुरुस्त हुआ। मनोरंजन के लिए पत्रिकायें, ताश, गेंद, ढोलक, मजीरे आदि भी मंगाये गये। पाँचवें या छठे दिन नाई ने दर्शन दिये, जिससे लड़कों ने अपना थोबड़ा साफ कराया।
पास की ही एक दूसरी जेल में 50 के लगभग छात्राएँ भी बंद थीं। लेकिन वहाँ तक जाने की अनुमति हमें नहीं थी। बी-क्लास मिल जाने पर हमें दोपहर को मिलने आने वालों से मिलने की अनुमति मिलती थी। कई लड़कों ने इस अनुमति का अनुचित लाभ भी उठाया। जो लोग बाहर से मिलने आते थे उन्हें अन्दर घुसाते समय उनके हाथ पर एक मोहर पहचान के लिए लगा दी जाती थी। कई लड़के हाथ से हाथ दबाकर वह मोहर अपने हाथ पर छाप लेते थे और उसे दिखाकर बाहर निकल जाते थे। एक बार बाहर जाने के बाद उनका पकड़ा जाना असंभव था, क्योंकि उन्होंने अपना नाम-पता सब गलत बताया था और इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं था कि वे कभी जेल में थे। जेल वालों की आंखों में धूल झोंककर दो दिन में लगभग 75 लड़के जेल से भाग गये।
यही तकनीक कुछ लड़कियों ने भी अपनायी और वहाँ से भी 5 लड़कियाँ इसी तरह निकल भागीं। इस बात का पता लड़कियों की जेल में पहले ही दिन चल गया, क्योंकि उनकी प्रतिदिन सोते समय गिनती की जाती थी। जैसे ही यह समाचार ऊपर पहुँचा, मानो तूफान आ गया हो। फौरन ही लड़कों की गिनती करायी गयी और गिनती से ज्ञात हुआ कि लगभग 75 लड़के भी उड़नछू हो गये हैं। कुछ लड़कों की इस कारगुजारी से अधिकारी बौखला गये। 75 लड़के तो मुक्त हो गये, लेकिन जो अभी भी जेल में थे, हमारे जैसे, उन्हें उस सबका खामियाजा भुगतना पड़ा।
फौरन ही हमारी स्वतन्त्रता सीमित कर दी गयी। अब तक हम पूरी जेल में कहीं भी खुले घूमते रहते थे। अब वह सुविधा वापस ले ली गयी। मिलने आने वालों से आमने-सामने मिलना निषिद्ध कर दिया गया और गिने-चुने लड़कों को ही जंगले के पीछे से ही मिलने की अनुमति मिलने लगी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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