आत्मकथा भाग-1 अंश-58

करीब सप्ताह भर आगरा में ही रहने के बाद मैं पुनः दिल्ली लौटा। अब मुझे कायदे से पीएच.डी. करनी चाहिए थी। पीएच.डी. के लिए मेरा रजिस्ट्रेशन भी हो गया था। लेकिन मेरी इच्छा पीएच.डी. करने की बिल्कुल नहीं थी और मैं नौकरी करना चाहता था। मुझे पूरा विश्वास था कि एन.आई.सी. तथा एच.ए.एल. दोनों में से किसी न किसी एक जगह मेरा चयन हो जायेगा। एन.आई.सी. में पूछताछ करने पर पता चला कि मेरा नाम प्रतीक्षा सूची में है तथा जुलाई-अगस्त तक मैं बुलावे की आशा कर सकता हूँ। एच.ए.एल. से फरवरी-मार्च में भी कोई जबाब न आने पर मैंने उन्हें एक पत्र लिखा। उन्होंने सूचित किया कि अभी कोई निश्चय नहीं हुआ है और होने पर तुरन्त सूचित किया जायेगा। लेकिन मुझे ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी और 27 अप्रैल 1983 को मेरे पास एच.ए.एल. से नौकरी का प्रस्ताव आ गया। सबसे पहले मैंने श्री राम नरेश सिंह को इस बारे में सूचित किया। मेरा मन एच.ए.एल. में जाने का नहीं था, क्योंकि वहाँ कुल वेतन मात्र 1285 रुपये था, जो उस समय के हिसाब से भी कम था। लेकिन राम नरेश सिंह ने कहा कि मुझे यह मौका छोड़ना नहीं चाहिए। मैंने अपने परिवार वालों से भी पूछा। वहाँ से जबाव आया कि 40-45 रुपये प्रतिदिन की नौकरी छोड़ना ठीक नहीं है। अन्त में मैंने जाने का निश्चय कर लिया और एच.ए.एल. को सूचित कर दिया कि मैं 16 मई तक वहाँ आ जाऊँगा।
मेरा कम्प्यूटर का काम अभी भी पूरा नहीं हो पाया था, क्योंकि डिजर्टेशन जमा करने के बाद मेरा मूड ऑफ हो गया था और मैं इस तरफ से लापरवाह हो गया था। लेकिन जब मुझे एच.ए.एल. से नौकरी का प्रस्ताव मिल गया, तो मैं समझ गया कि यह कार्य भी जाने से पहले पूरा कर लेना है, क्योंकि यदि यह अब न हो पाया तो फिर कभी नहीं हो पायेगा। मुझे तब तक एन.आई.सी. के कम्प्यूटर पर काम करने की अनुमति मिल गयी थी और मैं एक दूसरी प्रोग्रामिंग भाषा पास्कल (Pascal) में अपनी डिजर्टेशन के लिए प्रोग्राम लिख रहा था। मैंने तय कर लिया कि यह कार्य 13-14 मई तक पूरा कर लूँगा और फिर आगरा होकर लखनऊ चला जाऊँगा। इसी उद्देश्य को लेकर मैं फिर कठिन परिश्रम में जुट गया। पास्कल भाषा का प्रयोग वहाँ केवल शाम को 5 बजे से 8 बजे तक किया जा सकता था, अतः मैं दिन भर अपने कमरे पर प्रोग्राम लिखता तथा शाम को 5 बजे एनआईसी जाकर कम्प्यूटर में वही प्रोग्राम प्रविष्ट करता। जल्दी ही मेरा 1500 पंक्तियों का प्रोग्राम पूरा हो गया।
यह मेरा अब तक का सबसे लम्बा प्रोग्राम था और पास्कल भाषा में प्रोग्राम लिखना वैसे भी काफी कठिन होता है, फिर भी मैंने यह कार्य पूरा कर लिया। अब केवल दो दिन का ही काम बाकी रह गया था। तभी ऐसी घटना घट गयी, जिसने मेरी जिन्दगी को लम्बे समय के लिए विषाक्त कर दिया।
उन दिनों हमारे वि.वि. में राजनैतिक सरगर्मियां बड़े जोरों पर थीं। वि.वि. के अधिकारियों ने एक छात्र को जबर्दस्ती उसके कमरे से निकाल दिया था। इसके जबाब में छात्रसंघ ने उस कमरे का ताला तोड़कर उस छात्र को पुनः उसी में स्थापित कर दिया। इस घटना या दुस्साहस की सजा के तौर पर कुलपति ने, जिसकी कुर्सी को उन दिनों श्री पी.एन. श्रीवास्तव कार्यवाहक कुलपति के तौर पर ‘सुशोभित’ कर रहे थे, उस छात्र श्री जलीस अहमद तथा छात्रसंघ के अध्यक्ष श्री मोहंती और महामंत्री श्री सुबोध मलाकर को तीन-तीन साल के लिए विश्वविद्यालय से निकाल दिया। यह कार्रवाई छात्रों को भड़काने के उद्देश्य से जान-बूझकर की गयी थी और इसका कोई औचित्य नहीं था।
अधिकारियों की आशा और षड्यंत्र के अनुसार छात्र भड़क गये और उन्होंने कुलपति, रजिस्ट्रार तथा रेक्टर तीनों बड़े अधिकारियों का घेराव कर लिया। तीनों को कुलपति के निवास स्थान पर एक कमरे में बैठा दिया गया। प्रारम्भ में उनकी बिजली, पानी भी बंद रखी गयी, लेकिन शीघ्र ही वह प्रतिबंध हटा लिया। छात्रों ने तीनों अधिकारियों को बहुत समझाया, उनके लिए अच्छे से अच्छा खाना लाकर खिलाया, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। अध्यापकों ने कई बार उनको घेराव से मुक्त कराने की कोशिश की, लेकिन छात्रों की सुदृढ़ एकता के कारण उनका कोई बस नहीं चला।
तब किसी अध्यापक की पत्नी ने या शायद कुलपति की बेटी ने दिल्ली दरबार में फरियाद की। मुझे अच्छी तरह याद है कि उस दिन 12 मई थी। मैं प्रातः तथा दोपहर तक घेराव में शामिल था तथा अध्यापकों का प्रयत्न विफल करने में भी आगे रहा था। तब मैं 3-4 बजे रोज की तरह एन.आई.सी. पर कम्प्यूटर पर काम करने चला गया। उस दिन मेरा मन पता नहीं क्यों काम में नहीं लग रहा था। अतः मैं 6 बजे ही वापस आ गया। वापस आते समय मैंने देखा कि पुलिस की कई गाड़ियाँ तथा फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ भी हमारे कैम्पस की तरफ दौड़ती चली जा रहीं थी।
किसी अनहोनी की आशंका से मैं सहम गया। वहाँ पहुँचकर मुझे ज्ञात हुआ कि लगभग 5 बजे पुलिस भारी संख्या में कैम्पस में घुसी तथा घेराव कर रहे छात्रों को बेरहमी से पीट-पीटकर गिरफ्तार करके ले गयी। कुलपति आदि को मुक्त करा लिया गया तथा लगभग 50 छात्रों तथा छात्राओं को जेल में बंद कर दिया गया। उनमें से कई को अस्पताल भी जाना पड़ा।
भारी संख्या में पुलिस सारे कैम्पस में फैल गयी थी। धारा 144 की घोषणा हो चुकी थी। बाकी छात्रों, जिनमें छात्रसंघ के अध्यक्ष भी थे, ने यह तय किया कि कैम्पस में पुलिस हस्तक्षेप तथा छात्रों की गिरफ्तारी के विरोध में धारा 144 तोड़कर सामूहिक गिरफ्तारी दी जाय। तुरन्त ही काफी लोग गिरफ्तारी देने को तैयार हो गये। उनमें मैं भी था। सबका यह विचार था कि हम धारा 144 ही तोड़ रहे हैं, अतः अधिक से अधिक एक रात रखकर सुबह तक हमें छोड़ दिया जायेगा और हमारा विरोध पूर्ण हो जायेगा। लेकिन अधिकारियों के खूनी इरादों की हमें कोई भनक नहीं थी।
गिरफ्तारी में काफी ऐसे छात्र भी शामिल हुए थे, जिन्होंने तब तक किसी राजनैतिक गतिविधि में भाग नहीं लिया था। लगभग 500 छात्र-छात्राओं को गिरफ्तार करके पहले दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन ले जाया गया। वहाँ न तो हमारे सोने-बैठने का कोई इन्तजाम था और न खाने-पीने का। अतः ज्यादातर लोग थाने से बाहर आकर किसी कैंटीन में खा-पी गये। तब तक किसी को किसी प्रकार की आशंका नहीं थी। रात लगभग 12 बजे हमें बताया गया कि सबको रात में तिहाड़ जेल में सोने भेजा जायेगा। सबका नाम लिखना शुरू किया गया। ज्यादातर लड़कों ने अपना नाम और पता गलत बताया। कई लड़कों ने अपना पता लड़कियों के होस्टल का लिखाया। हमारे विश्वविद्यालय में होस्टलों के नाम नदियों के नाम पर हैं, जैसे गंगा, झेलम, सतलज, गोदावरी, कावेरी आदि। कई लड़कों ने होस्टल के नाम के रूप में ऐसी नदियों का नाम बताया, जिनके नाम पर कोई होस्टल नहीं था। जैसे जमुना, चम्बल, घाघरा, गोमती आदि। कई लड़कों के रूम नं. ऐसे थे, जिनका कोई अस्तित्व नहीं था। अधिकतर का नाम काल्पनिक था और उनमें से कई बाद में अपना नकली नाम भूल भी गये। मैंने स्वयं अपना नाम अरुण कुमार पुत्र मदन गोपाल बताया था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आत्मकथा भाग-4 अंश-62 (अन्तिम)

आत्मकथा भाग-4 अंश-61

आत्मकथा भाग-4 अंश-21