आत्मकथा भाग-1 अंश-57
डिजर्टेशन पूरी होने के बाद, सबसे पहले मेरे गाइड डाॅ. सदानन्द ने मेरी डिजर्टेशन में कई सुधार किये और कई सुझाव भी दिये। उन सबको ध्यान में रखकर मैंने डिजर्टेशन की अन्तिम प्रति तैयार की। इसमें लगभग दो सप्ताह और लग गये। अब केवल दो सप्ताह बाकी थे और मुझे डिजर्टेशन 5 जनवरी 1983 तक जमा कर देनी थी। उस समय तक प्रो. बनर्जी हमारे डीन हो गये थे। उन्होंने कहा भी कि डिजर्टेशन जमा करने में 10-15 दिन इधर-उधर होने का कोई अर्थ नहीं है। लेकिन मैंने तो 5 जनवरी 1983 से पहले ही डिजर्टेशन जमा करने की प्रतिज्ञा कर रखी थी, अतः मैंने उनकी उदारता का लाभ न उठाने का निश्चय किया।
मेरे सौभाग्य से मुझे डिजर्टेशन टाइप कराने के लिए ज्यादा दौड़-धूप नहीं करनी पड़ी। उसी वि.वि. में एक क्लर्क तथा मेरे मित्र श्री सुरेश कुमार सप्रा ने उन्हीं दिनों एक नया टाइपराइटर खरीदा था, जिसका उन्होंने तब तक प्रयोग भी नहीं किया था। अतः मैंने उनसे ही डिजर्टेशन टाइप कराने का निश्चय किया। उन्होंने तीन दिन की छुट्टी इसी कार्य के लिए ली और हम दोनों ने साथ बैठकर तीन दिन में ही सारी डिजर्टेशन टाइप कर ली। श्री सप्रा ने काफी मेहनत की थी और मैं भी लगातार पास बैठा हुआ सुझाव देता रहता था। उन दिनों श्री सप्रा की श्रीमतीजी तथा बच्चे बाहर गये हुए थे, अतः उनका घर भी खाली मिल गया था।
डिजर्टेशन टाइप कराने के बाद मैंने आवश्यक चित्र आदि तैयार किये और उनको जिल्द बांधने के लिए तैयार कर लिया। जिल्द बनवाने में एक बार फिर श्री सप्रा ने मदद की और दो-चार दिनों में ही मेरी डिजर्टेशन की पांच प्रतियाँ जमा करने के लिए तैयार हो गयीं। अपने गाइड डॉ. सदानन्द और डीन प्रो. बनर्जी के हस्ताक्षर लेने के बाद मैंने डिजर्टेशन जमा कर दी। उस दिन तारीख थी 31 दिसम्बर 1982 अर्थात् मैंने अपना लक्ष्य 5 दिन पहले ही प्राप्त कर लिया था। उस दिन मुझे जो प्रसन्नता हुई वह शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। उसे केवल तभी अनुभव किया जा सकता है जब किसी को कठिन परिश्रम के बाद फल की प्राप्ति होती है। मैं एक बहुत बड़ा बोझ अपने सिर से उतरा हुआ महसूस कर रहा था।
अभी तक मेरा कम्प्यूटर का काम पूरा नहीं हुआ था, अतः मुझे उसमें जुट जाना था। लेकिन इससे पहले मुझे दो-तीन काम और करने थे। पहला यह था कि मैंने नेशनल इन्फाॅर्मोटिक्स सेन्टर (NIC) दिल्ली में प्रोग्रामर के पद के लिए आवेदन किया था। उसका इन्टरव्यू 5 जनवरी 1983 को होना था। मुझे यह पता नहीं था कि टेस्ट या इन्टरव्यू किस प्रकार का होगा, अतः मैं अधिकतम जानकारी प्राप्त करके इन्टरव्यू में जाना चाहता था। वहाँ पहले हमारा लिखित टेस्ट हुआ। उसके बाद हमारा इन्टरव्यू हुआ। मेरे टेस्ट तथा इन्टरव्यू दोनों ही मेरे विचार से अच्छे हो गये थे। मुझे पूरा विश्वास था कि मेरा चयन (सलैक्शन) हो जायेगा, वैसा हुआ भी। लेकिन मुझे पता चला कि कुछ लोगों ने सिफारिश आदि के द्वारा अपना सलैक्शन पहले करा लिया। मेरा क्रम उस सूची में छठा या सातवाँ था, जबकि पहले केवल चार या पांच लोगों को जगह दी गयी थी। अब मेरा नाम प्रतीक्षा सूची में था। मैं इन्तजार करने के सिवा कुछ नहीं कर सकता था।
उसी महीने की 24 तारीख (अर्थात् 24 जनवरी, 1983) को मुझे हिन्दुस्तान ऐरोनाॅटिक्स लिमिटेड, लखनऊ में प्रोग्रामर जैसी ही पोस्ट के लिए इन्टरव्यू के लिए बुलाया गया था। निश्चित तारीख को मैं वहाँ गया। मुझे काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस में आरक्षण मिल गया था। वह गाड़ी रात को 11 बजे वहाँ पहुंच गयी, जबकि मुझे अगले दिन 8 बजे बुलाया गया था। अब मेरे सामने इसके सिवा कोई विकल्प नहीं था कि मैं प्लेटफार्म पर ही रात काट लूँ। वह जनवरी का महीना था और उस वर्ष वैसे भी भारी जाड़ा पड़ा था। मेरे पास ओढ़ने के लिए मात्र एक कम्बलनुमा चादर थी और मेरी मुख्य जर्सी आगरा में रह गयी थी। ऐसी हालत में भी मैंने पूरी रात प्लेटफार्म पर बैठे हुए तथा कभी ऊँघते हुए काट दी।
प्रातःकाल 6 बजने पर मैं वहीं के शौचालय में शौच से निवृत्त हुआ और हाथ-मुँह धोये। नहाने का प्रश्न ही नहीं था। फिर कपड़े बदलकर मैं टैम्पो से एच.ए.एल. चल दिया। जिस समय मैं वहाँ पहुंचा, उस समय 7.45 बज रहे थे। मुझे खुशी थी कि मैं समय से पहले आ गया। लेकिन मेरी खुशी उस समय उड़ गयी, जब वहाँ के एक चौकीदार ने बताया कि कोई भी इन्टरव्यू 9-10 बजे से पहले शुरू नहीं होता। मेरी तरह दो-चार और लड़के भी आ गये थे। हमें लगभग डेढ़ घंटे बाहर खड़े रहना पड़ा। तब तक हम कुल 13 लोग इन्टरव्यू देने के लिए आ चुके थे। उससे एक दिन पहले भी कई लोगों का इन्टरव्यू हो चुका था। जब हमें अन्दर जाने की इजाजत मिली तब तक 9.30 बज गये थे। वहाँ हमें कैन्टीन में बैठकर प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया। आखिर 10 बजे एक लिपिक महोदय पधारे और हमसे एक प्रार्थना पत्र फिर भरवाया गया। उनके प्रस्थान करने के बाद हमें फिर इन्टरव्यू की प्रतीक्षा करनी थी।
इन्टरव्यू लगभग 10.30 बजे शुरू हुआ और मेरा नम्बर 12 बजे आ गया। जब मैं वहाँ गया तो देखा कि वहाँ 10-12 लोग एक बड़ी मेज के चारों ओर बैठे हैं। उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैं चिड़ियाघर से छूटकर आया कोई जानवर होऊँ। उस दिन मेरा हुलिया भी कोई बहुत अच्छा नहीं था। लापरवाही से, या आधुनिक भाषा में कहें तो समय की कमी से, मैंने चार दिन से अपनी दाढ़ी नहीं बनायी थी। अत्यधिक मेहनत करने के कारण और जाड़े के कारण मैं कुछ कमजोर-सा लग रहा था। उस पर तुर्रा यह कि उस दिन तब तक मैंने एक कप चाय तक नहीं पी थी।
मैंने अपनी सुनने की कठिनाई बतायी। शीघ्र ही चारों ओर से प्रश्न स्लिपों पर लिखकर आने शुरू हो गये। मैंने सबका समुचित जबाव दिया। इन्टरव्यू लेने वालों के अध्यक्ष (जिनका नाम श्री आर.के. तायल मुझे बाद में पता चला) ने मुझसे कहा कि तुम कम्प्यूटर और डाटाबेस के बारे में जो जानते हो बताओ। मैंने संक्षेप में एक-दो वाक्यों में बता दिया। तो उन्होंने कहा- बताते रहो। अब मैंने विस्तार से बताना शुरू किया और 2-3 मिनट तक बोलता रहा। इसके बाद फिर मुझसे कई प्रश्न पूछे गये। उनमें से ज्यादातर व्यक्तिगत थे। उन्हें इस बात में संदेह था कि मैं अकेला लखनऊ में कैसे रहूँगा। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं तीन साल से दिल्ली में अकेला रह रहा हूँ तथा वहाँ से अकेला ही इन्टरव्यू देने आया हूँ, तो वे संतुष्ट हो गये। उनमें से एक (जिनका नाम श्री राकेश कुमार श्रीवास्तव मुझे बाद में पता चला) ने मुझसे यह भी पूछ डाला कि मेरी शादी हो गयी है या नहीं और अगर नहीं तो कब करूँगा। मैंने उनको बताया कि पहले अपने पैरों पर खड़ा हो जाने के बाद ही इसके बारे में सोचा जाएगा। उन्होंने मुझे चाय भी पिलाई। मेरा इन्टरव्यू काफी लम्बा चला। पूरा होने के बाद मैं धन्यवाद देकर और उन सबको नमस्ते करके बाहर आया।
बाहर आकर सबसे पहले मैंने कैन्टीन में खाना खाया। फिर इस बात की जानकारी ली कि मेरा यात्रा खर्च कब मिलेगा। लगभग 2 बजे मुझे कुल 73 रुपये यात्रा खर्च के मिले। तब मैं वहाँ से छुट्टी पा सका। वहाँ से मैं सीधा स्टेशन गया और पता लगाया कि आगरा के लिए रिजर्वेशन मिल जायेगा कि नहीं। उन्होंने मना किया। तब मैं बस स्टेशन गया। वहाँ से पता चला कि एक बस शाम से सात बजे चलकर सुबह 6 बजे आगरा पहुँचा देगी। मैंने बस से ही जाने का फैसला किया। बीच के 3-4 घंटे मैंने स्टेशन से बाहर लॉन में बैठकर तथा गौतम बुद्ध मार्ग पर घूमकर काटे। उसी मार्ग पर मेरी पत्र-मित्र कु. अनिता अग्रवाल का घर था, जिसे मैंने ढूँढ़ लिया और दूर से देखकर लौट आया। उस समय उसकी छोटी बहन तथा वह भी बालकनी में खड़ी थी। शायद उसने मुझे पहचान भी लिया हो। लेकिन बातें करने अथवा उनके घर में जाने का कोई प्रश्न ही नहीं था, इसलिए मैं वहीं से लौट आया।
शाम को निर्धारित समय पर बस चली। रास्ते में जाड़ा तो लग रहा था, लेकिन उससे भी ज्यादा परेशानी मुझे नींद की वजह से हो रही थी। पिछली रात मैं बिल्कुल नहीं सो पाया था तथा पूरा दिन भी खड़े-खड़े या टहलते हुए बीता था। मुझे बहुत जोर से नींद आ रही थी, लेकिन मैं किसी तरह जागता रहा। रास्ते में बस हर दो घंटे बाद 10-15 मिनट के लिए रुका करती थी, मैं उसी बीच सोने की कोशिश करता था। प्रातः आगरा पहुँचकर घर जाकर मुझे कुछ शान्ति मिली।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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