आत्मकथा भाग-1 अंश-54

हमारे विश्वविद्यालय में प्रायः संघ के प्रचारक आया करते थे। एक बार श्री राम शंकर अग्निहोत्री, जो कभी पांचजन्य साप्ताहिक के सम्पादक भी रहे थे, हमारे विश्वविद्यालय में आये थे और हम स्वयंसेवकों की बैठक ली थी। कई बार हमने श्री राम जेठमलानी, श्री अरुण जेटली, सुश्री रानी जेठमलानी, श्री महेश शर्मा और एक बार श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को भाषण देने के लिए बुलाया था। उनके कार्यक्रमों में श्रोताओं की संख्या भी अच्छी रही थी, हालांकि कम्यूनिस्ट और नक्सलवादी छात्र अनावश्यक प्रश्न पूछकर और शोर मचाकर व्यवधान डालने की कोशिश करते थे। किन्तु हमारी दृढ़ता से कार्यक्रम पूर्ण सफल होते थे। एक बार श्री नानाजी देशमुख भी हमारे विश्वविद्यालय के निकट डीडीए फ्लैट मुनीरका में आये थे, जिनकी बैठक में हम सभी शामिल हुए थे।
उस समय वहाँ मा. सुरेश जी प्रचारक थे। वे मुझे बहुत मानते थे। वे यह आशा करते थे कि मैं पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रचारक बनकर निकल जाऊँगा। परन्तु मैं जानता था कि यह कार्य मेरे वश का नहीं है। एक तो, अपनी सुनने की असमर्थता के कारण मैं संकोच करता था। दूसरी बात यह थी कि मुझे अपनी कमियों और सीमाओं का ज्ञान था। प्रचारकों को जिस निष्ठा और संयम की आवश्यकता होती है, वह मुझमें होना संभव नहीं था। इसलिए मैं नौकरी के साथ ही संघकार्य करना चाहता था।
जब मैं विश्वविद्यालय छोड़कर लखनऊ नौकरी करने गया, तो वहाँ संघ की शाखा नियमित लगती थी। मैं प्रायः रोज ही शाखा जाता था। वहीं पहली बार मैं एक पूरे दिन के कार्यक्रम में गया और प्रयाग में तीन दिन के शीत शिविर में भी गया। इसकी कहानी आत्मकथा के अगले भाग में विस्तार से लिखूँगा।
राजनैतिक तौर पर मेरी विचारधारा जहाँ राष्ट्रवादी पार्टी भारतीय जनसंघ के निकट थी, वहीं धार्मिक विश्वासों में मैं आर्य समाज के निकट आया। प्रारम्भ में मैं अपनी माताजी के प्रभाव से देवी-देवताओं पर विश्वास रखता था, हनुमान चालीसा आदि पढ़ा करता था और मूर्ति पूजा भी किया करता था। लेकिन जैसे-जैसे मेरी बुद्धि परिपक्व होती गयी, वैसे-वैसे मूर्ति पूजा से मुझे चिढ़ होने लगी। इसकी पृष्ठभूमि यह है कि हमारे पितामह के बड़े भाई स्वामी शंकरानन्द जी महाराज, जिनको हम लाल बाबा कहते थे, आर्यसमाज के प्रचारक थे और लगभग 60 वर्षों तक प्रचारक रहे। पूरे 100 वर्ष की आयु में उनका देहान्त तब हुआ था, जब मैं एम. फिल. की पढ़ाई पूरी करके लखनऊ में नौकरी लगने की प्रतीक्षा कर रहा था।
लाल बाबा ज्यादातर बाहर ही कश्मीर, नैनीताल, हलद्वानी, जोधपुर, अजमेर आदि स्थानों पर रहते थे और बीच-बीच में गाँव भी आते थे। वे जब भी गाँव आते थे, तो हम उनके पास बहुत बैठा करते थे। हम तो अबोध थे, परन्तु गाँव के दूसरे लोगों के सामने वे प्रायः मूर्ति पूजा आदि की निरर्थकता समझाते थे तथा पंडे-पुजारियों-पुरोहितों द्वारा आम हिन्दुओं को ठगे जाने का रोचक और व्यंग्यात्मक वर्णन किया करते थे। धीरे-धीरे हमारी समझ में भी यह सब आने लगा। हालांकि हमारे परिवार पर उनका प्रभाव बहुत कम था, क्योंकि सभी खुलकर मूर्ति पूजा करते थे और सत्य नारायण की कथा, श्राद्ध, ब्रह्मभोज आदि कराया करते थे, जिनके वे घोर विरोधी थे।
जब मैं अपने कानों की चिकित्सा के लिए कानपुर गया था, तो वहाँ भाई साहब डाॅ. सूरजभान जी के पास आर्यसमाज की बहुत-सी पुस्तकें थीं। हमारे पूरे खानदान में केवल ये भाईसाहब ही सबसे अधिक आर्यसमाजी थे, क्योंकि वे आर्यसमाजी विधि से दैनिक हवन नियमित किया करते थे, जिसमें मैं भी भाग लेता था। वैसे वे और उनके परिवारी सुविधा के अनुसार मूर्ति पूजा भी कर लेते थे। वहाँ मैं लगभग 2 माह रहा। वहाँ रहते हुए मैंने उनके पास उपलब्ध लगभग सभी धार्मिक पुस्तकें पढ़ डालीं, जिनमें मुख्य थीं- स्वामी दयानन्द सरस्वती की जीवनी और महात्मा आनन्द स्वामी सरस्वती के प्रवचनों की कई पुस्तकें। इनको पढ़कर मेरे धार्मिक विचारों को स्पष्ट दिशा मिली और मूर्ति पूजा की निरर्थकता मेरे सामने स्पष्ट हो गई। बाद में मैंने सत्यार्थ प्रकाश भी कई बार पढ़ा है, जिससे मेरे मन में वैदिक धर्म का स्वरूप पूरी तरह स्पष्ट हो गया है। वैसे मैं आर्यसमाज नामक संस्था से कभी औपचारिक रूप से जुड़ा हुआ नहीं रहा।
अपने पूरे खानदान में भाईसाहब डा. सूरजभान के अलावा मुझे और मेरे एक भतीजे डा. मुकेश चन्द को ही पूरी तरह वैदिक धर्मी कहा जा सकता है। बाकी लोग अपनी सुविधा के अनुसार सनातन धर्मी और वैदिक धर्मी बनते रहते हैं अर्थात् ‘गंगा गये तो गंगादास, जमुना गये तो जमुनादास।’ हमारे एक ताऊ श्री कोमल प्रसाद जी भी आगे चलकर पक्के आर्यसमाजी हो गये थे। मेरे मूर्ति पूजा विरोधी विचार मेरे घर-परिवार में सबको मालूम हैं और एक प्रकार से मैं लाल बाबा से भी ज्यादा उग्र मूर्तिपूजा विरोधी हूँ। प्रारम्भ में मैं मूर्ति पूजकों की बहुत खिल्ली उड़ाया करता था, परन्तु अब मैं मूर्तिपूजा का विरोध तो करता हूँ, लेकिन उनकी खिल्ली नहीं उड़ाता।
आजकल मेरी हालत यह है कि मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बड़े-बड़े मन्दिरों में जाता हूँ, परन्तु कभी मूर्ति को सिर नहीं झुकाता। मैं लाखों की भीड़ देखता हूँ और बड़े-बड़े भव्य श्रंगार और झाँकियाँ देखता हूँ, परन्तु कभी भी मुझे मूर्तियों में रंचमात्र भी श्रद्धा नहीं होती, बल्कि घोर वितृष्णा ही होती है कि इतनी भीड़ मूर्खताओं में फँसी हुई है। मैं दो-तीन बार वैष्णो देवी की यात्रा पर भी गया हूँ, परन्तु दर्शनों के लिए नहीं, बल्कि केवल भ्रमण और प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द लेने के लिए। पुराणों को मैं कहानी की पुस्तकों से अधिक महत्व नहीं देता। हालांकि रामायण, महाभारत आदि को मैं नियमित पढ़ता हूँ और उनके महान् चरित्रों श्रीराम, श्रीकृष्ण, भक्तवर हनुमान्, भगवान परशुराम, पितामह भीष्म, महाराज युधिष्ठिर आदि से बहुत प्रभावित हूँ तथा उनसे कुछ सीखने का प्रयास करता हूँ।
-- डा विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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