आत्मकथा भाग-1 अंश-53
जब मैं कक्षा 8 से आगे पढ़ने के लिए आगरा आया, तो संघ से गहरा परिचय हुआ। हमारे बड़े मामाजी संघ के कर्मठ कार्यकर्ता रहे हैं। उन्हीं की प्रेरणा से मैं शाखा जाने लगा। हमारी शाखा प्रारम्भ में सिर की मंडी में गोरखनाथ की बगीची के निकट एक खाली स्थान में लगा करती थी।
यहाँ मैं अपने बड़े मामाजी के बारे में विस्तार से बताना आवश्यक समझता हूँ। उनका नाम है श्री दयाल चन्द गोयल, जिन्हें बोलचाल में सभी लोग ‘डालचंद जी’ कहा करते हैं। मामाजी का मेरे ऊपर बहुत प्रभाव पड़ा है। वे प्रारम्भ से ही संघ के स्वयंसेवक हैं। वे आजादी से पहले से ही संघ से जुड़ गये थे और आज तक जुड़े हुए हैं। उन्होंने कई बार आन्दोलनों में भाग लिया है। मुख्य रूप से वे गोवा मुक्ति आन्दोलन में सक्रिय भाग ले चुके हैं। इसकी पूरी कहानी उन्होंने लिखी थी, जो मैंने भी पढ़ी थी। वे नियमित व्यायाम करते हैं और आज 90 वर्ष की उम्र में भी स्वस्थ और सक्रिय हैं।
मामाजी बहुत ही धार्मिक व्यक्ति हैं। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके सत्संग में पँचकुइयाँ चौराहे की बगीची में जाया करते थे, जहाँ पूज्य व्यास जी महाराज प्रवचन करते थे। जब मैं कक्षा 9 में पढ़ता था और मेरे कान ठीक थे, तो मामाजी की प्रेरणा से कभी-कभी मैं भी सत्संग में जाया करता था। हर सोमवार की सायंकाल पुनियापाड़ा मौहल्ले के मन्दिर में सत्संग होता था, उसमें मैं नियमित जाता था। उसमें बाद में मामाजी भी प्रवचन किया करते थे।
मामाजी की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण थी। वे छोटी सी घी-तेल की दुकान करते थे, जिससे उन्हें गुजारे लायक आमदनी हो जाती थी। इससे अधिक की कामना उन्होंने कभी नहीं की। दुर्भाग्य से उनके बड़े पुत्र श्री सन्त गोपाल की मानसिक स्थिति अच्छी नहीं रही, जिसके कारण वे काफी दुःखी रहे। मामाजी के छोटे सुपुत्र श्री मदन गोपाल अभी भी घी-तेल की दुकान चलाते हैं और उनके पुत्र भी दो अन्य दुकानें करते हैं। इससे उनकी आर्थिक स्थिति अब अच्छी हो गई है। अब श्री सन्त गोपाल का देहावसान हो चुका है।
(पादटीप- हमारे बड़े मामाजी का देहावसान कुछ वर्ष पूर्व लगभग 95 वर्ष की आयु में हो चुका है।)
(पादटीप- हमारे बड़े मामाजी का देहावसान कुछ वर्ष पूर्व लगभग 95 वर्ष की आयु में हो चुका है।)
हमारे छोटे मामाजी श्री दाऊ दयाल गोयल भी स्वयंसेवक थे और प्रायः संघ कार्यक्रमों में जाया करते थे। वे एक बीज कम्पनी के एजेंट थे। दुर्भाग्य से कम आयु में ही उनका किसी बीमारी से देहान्त हो गया था। संदेह किया जाता है कि उनको किसी ने कुछ विषाक्त पदार्थ खिला दिया था। उनके बड़े सुपुत्र श्री अरुण कुमार गोयल (अरुण भाई) लोहे के व्यापारी हैं और उन्होंने अच्छी आर्थिक हैसियत बना ली है। वे एक बार नगर पार्षदी का चुनाव भी लड़कर हार चुके हैं।
सिर की मंडी में हमारी शाखा का नाम था ‘ध्रुव प्रभात’ और हमारे मुख्य शिक्षक थे श्री मुरलीधर ओझा। वे लोहे के एक कारखाने के स्वामी थे और बहुत कर्मठ स्वयंसेवक थे। शाखा में वे तरह-तरह के खेल खिलाया करते थे और गीत आदि गवाते थे। वे अन्य बहुत सी बातें भी बताया करते थे, जो मेरी बुद्धि के अनुसार ही थोड़ी-बहुत समझ में आती थीं। वहीं मैंने संघ की प्रार्थना कंठस्थ की। कक्षा 9, 10 और 11 में पढ़ने तक मैं प्रायः नियमित रूप से शाखा जाता रहा। मेरे ममेरे भाई श्री मदन गोपाल गोयल भी प्रायः नित्य शाखा जाते थे।
इसी बीच एक बार जयपुर हाउस, लोहामंडी में संघ का नया कार्यालय ‘माधव भवन’ बन रहा था। वहाँ श्रमदान करने के लिए बारी-बारी से विभिन्न शाखाओं के लोग आया करते थे। हमारी शाखा के स्वयंसेवक भी एक दिन वहाँ श्रमदान करने गये थे, जिनमें मैं भी था। मैंने अपनी क्षमता के अनुसार वहाँ गिट्टियाँ तोड़ी थीं। बाद में भी एक-दो बार मैं बिना बुलाये ही श्रमदान करने गया था। इसी तरह एक बार मैं दशहरे के पथ संचलन में भी शामिल हुआ था, जिसको तत्कालीन सरसंघचालक श्री बाला साहब देवरस जी ने सम्बोधित किया था।
मेरे शाखा जाने में व्यवधान तब आया जब आपात्काल लगने पर सभी शाखाएँ बन्द हो गयीं, श्री मुरलीधर ओझा गिरफ्तार कर लिये गये और हमारे मामाजी भूमिगत होने के कारण बच गये। बाद में मुरलीधर जी 20-सूत्री कार्यक्रम के लिखित समर्थन का सहारा लेकर छूटे, परन्तु शाखा दोबारा प्रारम्भ नहीं हो पायी। तब तक मैं बी.एससी. में पढ़ने लगा था।
आपात्काल में छात्र संघर्ष समिति के नाम से भूमिगत साप्ताहिक समाचार पत्र निकलता था। किसी तरह मुझे उसकी प्रति प्राप्त हो जाती थी और मैं उसे खूब पढ़ा करता था। उसमें ऐसे समाचार छपते थे, जो समाचारपत्रों या सरकार द्वारा दबा दिये जाते थे। उदाहरण के लिए, एक बार किसी कालेज में हुई वाद-विवाद प्रतियोगिता का समाचार छपा था, जिसका विषय था ‘आपात्काल देश के लिए लाभदायक है’। समाचार में बताया गया था कि जिन 15 छात्रों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया था, उनमें से केवल 1 छात्र इसके समर्थन में बोला था और अन्य 14 छात्र आपात्काल के विरोध में बोले थे।
मैं शाखा भले ही नहीं जाता था, परन्तु संघ से मेरा सम्पर्क दृढ़ होता गया। कई बार दोपहर को अपने सेंट जाॅह्न्स कालेज से लौटते समय मैं राजामंडी के पुराने संघ कार्यालय में चला जाता था। वहाँ बड़े मामाजी व्यवस्था प्रमुख थे और कार्यालय के भंडार की पुस्तकों तथा अन्य सामग्री की व्यवस्था का दायित्व वे ही सँभाला करते थे। संघ कार्यालय जाकर मैं प्रायः पांचजन्य, राष्ट्रधर्म आदि राष्ट्रवादी समाचार पत्र और पत्रिकायें पढ़ा करता था और कभी-कभी मामाजी से कोई पुस्तक लेकर भी पढ़ा करता था। इससे मेरे राष्ट्रवादी विचारों को परिपक्वता प्राप्त हुई। आगरा में पढ़ने की अवधि में मेरा संघ से मात्र इतना ही सम्पर्क रहा।
जब मैं दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ने गया, तो वहाँ संघ की शाखा नहीं थी। उस समय वहाँ संघ के जो लोग थे, उन्हें कम्यूनिस्टों ने बदनाम कर दिया था। दूसरे वर्ष अन्य बहुत से स्वयंसेवक वहाँ प्रवेश लेकर आये, जिनमें प्रमुख थे- सर्वश्री हरे कृष्ण जेना, संजय सत्यार्थी, नरेश भोक्ता, महेश उपाध्याय, सिन्धु कुमार झा, कमलेश्वर जी, नरेश चौधरी आदि। ये सभी समर्पित स्वयंसेवक थे। इनके आने पर स्वाभाविक रूप से विद्यार्थी परिषद का कार्य सुचारु रूप से चलने लगा और सायं शाखा भी प्रारम्भ की गई।
हमारी शाखा लगाने के लिए पास में ही स्थित आई.आई.टी. से श्री दुर्ग सिंह चौहान आया करते थे। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षित थे और महामना मालवीय मिशन के भी सक्रिय कार्यकर्ता थे। वे बाद में उ.प्र. तकनीकी विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी बने। वे नियमित आते थे और नियमित शाखा आने वालों में मैं प्रमुख था। मैं किसी उचित कारण के बिना कभी शाखा नहीं छोड़ता था। प्रारम्भ में कम्यूनिस्टों ने आपत्ति की थी कि वि.वि. परिसर में शाखा क्यों लगाते हो, हम नहीं लगाने देंगे। मैंने उन्हें चुनौती दी थी कि किसी दिन हमारी शाखा को रोककर दिखाइए, तो फिर मैं झेलम लाॅन में शाखा लगाऊँगा। झेलम लाॅन तीन छात्रावासों के बीच में स्थित एक प्रमुख और केन्द्रीय स्थान था, जहाँ छात्र अपनी थकान मिटाया करते थे। मेरे इस रवैये से किसी कम्यूनिस्ट की हिम्मत नहीं हुई कि शाखा में व्यवधान डाल सकता। शाखा की संख्या प्रायः 8-10 तो रोज ही हो जाती थी, कभी-कभी 15-20 भी हो जाती थी। हमारी शाखा बहुत समय तक चलती रही। छात्र अशांति होने पर ही वह बन्द हुई।
-- डा विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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