आत्मकथा भाग-1 अंश-52

अध्याय-10: सेवा धर्म कठिन जग जाना
काँटा लगे किसी को तड़पते हैं हम अमीर।
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है।।
सेवा की भावना मुझमें अपने पारिवारिक संस्कारों की देन है। हमारी माताजी ने प्रारम्भ से ही हमें बड़े-बूढ़ों का सम्मान करने और उनकी सेवा करने की प्रेरणा दी है। घर पर कभी कोई भिखारी या साधु-महात्मा आता था, तो वे प्रयत्नपूर्वक हमारे हाथों से ही उन्हें दान दिलवाती थीं या सेवा कराती थीं। प्रारम्भिक जीवन में पड़े ये संस्कार आगे चलकर और प्रबल हो गये। मेरे बचपन में ही एक ऐसी घटना घट गयी थी, जिसके द्वारा मेरे जीवन को एक दिशा मिली और मैंने सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
घटना कुछ यों है कि हमारे गाँव में एक नीलकंठ बाबा नाम के महात्मा प्रायः आया करते थे। वे पास के ही एक गाँव जुगसना में आश्रम बनाकर रहते थे और वहाँ से प्रतिदिन प्रातःकाल मुँह-अँधेरे ही पैदल यमुना स्नान करने जाते थे। यमुना उनके आश्रम से लगभग 10 मील दूर बल्देव के पास थी और उनके आने-जाने का रास्ता हमारे गाँव से होकर था। इसलिए कभी-कभी हमें उनके दर्शनों का सौभाग्य मिल जाता था। कई बार लौटते समय गाँव के लोग मिन्नतें करके उन्हें रोक लेते थे और अपनी बीमारियों की दवा आदि पूछा करते थे। ऐसा माना जाता था कि वे एक सिद्ध पुरुष हैं।
एक बार की बात है कि हमारे मौहल्ले के सेठ श्री झुन्नीलाल जी, जो हमारे ही खानदान से थे और रिश्ते में हमारे बाबा लगते थे, ने उनको रोक लिया। उनके बड़े सुपुत्र श्री भगवान स्वरूप के पैरों को लकवा मार गया था, जिसकी दवा वे पूछना चाहते थे। नीलकंठ बाबा उन दिनों केवल दही या मठा लिया करते थे। अतः सेठजी ने उनको मठा लाकर दिया, जिसको उन्होंने पी लिया। फिर उन्होंने पानी माँगा, तो मैं दौड़कर अपने घर से पानी ले आया। जब मैं पानी उनके कमंडल जैसे बर्तन में डाल रहा था, तो बाबा के मुँह से ये शब्द निकले- ‘सेवा करौगे, तो मेवा पाऔगे।’ मुझे लगा कि बाबा ने ये शब्द मेरे लिए ही कहे हैं, मानो मुझे गुरुमंत्र दिया हो। मैंने इसे अपना सौभाग्य समझा कि इतने बड़े सिद्ध पुरुष ने बिना माँगे ही मुझे गुरुमंत्र दे दिया।
तभी से मैंने सेवा को अपना धर्म बना लिया। इसके बाद जब भी मुझे किसी की सेवा करने या कोई परोपकार करने का अवसर मिलता है, तो मैं उसे छोड़ता नहीं हूँ। परन्तु यह समझना सही नहीं होगा कि सेवा का व्रत मैंने मेवा पाने के लिए लिया है। वास्तव में मैं बिना किसी प्रति-उपकार की कामना से ही ऐसे कार्य किया करता था और यथासंभव अभी भी करता रहता हूँ। कई बार लोगों ने इसका अनुचित लाभ भी उठाया है, फिर भी मैं बदले में किसी उपकार की आशा नहीं करता। इस सम्बंध में मैंने एक नियम और बना रखा है- ‘नेकी कर और दरिया में डाल।’
दुनिया में हर प्रकार के लोग हैं। जहाँ बहुत से लोग किसी उपकार के बदले उपकार करने की कोशिश करते हैं, तो अधिकांश लोग ऐसे उपकारों को तुरन्त ही भूल जाते हैं। कई महान् लोग ऐसे भी होते हैं, जो उपकार के बदले अपकार (भलाई के बदले बुराई) भी कर डालते हैं। इन सभी श्रेणियों के लोगों से मेरा पाला पड़ा है। एक बार मैंने एक सरदारजी की टैक्सी के पीछे ये शब्द लिखे देखे थे- ‘नेकी कर और जूते खा। मैंने खाए तू भी खा।’ शायद उन सरदारजी का पाला तीसरी श्रेणी के लोगों से ज्यादा पड़ा होगा, जिससे जल-भुनकर उन्होंने अपना यह तत्व ज्ञान प्रकट किया था।
सेवा करने की मेरी भूख को तृप्त किया है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने। मैं प्रारम्भ से ही देशभक्तिपूर्ण विचारों का रहा हूँ। जब हमारी प्राइमरी पाठशाला में अध्यापक राष्ट्रीय पर्वों जैसे 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्तूबर आदि पर सभा करते थे और उनमें राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया करते थे, तो अन्य सभी छात्रों की तरह मेरे ऊपर भी गहरा असर होता था और मैं महान् देशभक्त बनने के सपने देखा करता था। समय पाकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आकर मेरे इन विचारों को और अधिक परिपक्वता प्राप्त हुई।
मैं प्रारम्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अधिक परिचित नहीं था। हालांकि हमारे पिताजी प्रारम्भ से ही संघ के स्वयंसेवक थे और वार्षिक गुरुदक्षिणा भी करते थे। गाँव में कुछ अन्य लोग भी पुराने स्वयंसेवक थे, जैसे श्री राम लाल जी (जिन्हें सब बड़े भैया कहते थे) और पंडित श्री राम नारायण जी, परन्तु गाँव में कोई शाखा नहीं लगती थी। जब भी संघ के तत्कालीन सरसंघचालक परम पूज्य श्री गुरुजी मथुरा या आसपास आते थे, तो पिताजी उनके कार्यक्रम में अवश्य जाते थे।
संघ से मुझे परिचित कराने का श्रेय जाता है श्री बल्देव जी सिसौदिया को। (वे इस समय जहाँ भी हों, मेरे शतशः प्रणाम स्वीकार करें।) वे हमारी सादाबाद तहसील में नियुक्त संघ प्रचारक थे। छोटा कद, भरा-भरा शरीर, रंग साँवला और आँखों पर मोटा चश्मा। हमेशा धोती-कुर्ता पहनते थे और बहुत ही मीठा बोलते थे। वे प्रायः हर साल-छः माह में हमारे गाँव में सम्पर्क हेतु आया करते थे और अधिकतर हमारे घर पर ही भोजन और निवास करते थे।
रात्रि को सोते समय वे हमसे बहुत बातें किया करते थे। वे हमें रामायण, महाभारत और पुराणों की कहानियाँ सुनाया करते थे और उनका मर्म समझाते थे। मुझे याद है कि एक बार जब मैं टेसू खेल रहा था, तो उन्होंने पूछा था कि यह क्यों खेलते हो और इसका क्या अर्थ है? मैं कुछ नहीं बता सका, क्योंकि वास्तव में मुझे पता नहीं था। तब उन्होंने ही बताया कि यह खेल भीम के उस महापराक्रमी पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की याद में खेला जाता है, जो महाभारत के युद्ध में लड़ने के लिए आया था और कह रहा था कि जो पक्ष हारेगा, मैं उसी की ओर से लड़ूँगा। तब भगवान् कृष्ण ने सोचा कि यह तो बहुत खतरनाक है, यह पांडवों को कभी जीतने नहीं देगा। इसलिए उन्होंने तत्काल सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। जब उसके कटे हुए सिर ने महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की, तो भगवान ने उसे एक ऊँचे स्थान पर तिलंगे में स्थापित कर दिया। उसी की याद में यह टेसू का पर्व मनाया जाता है। यह मुझे बाद में पता चला कि उसी बर्बरीक की पूजा आजकल खाटू वाले श्याम जी के रूप में की जाती है।
इसी प्रकार वे हमें बहुत सी बातें बताया करते थे। एक बार उन्होंने गुरुदक्षिणा कार्यक्रम भी किया था। परन्तु मैं कुछ जानता नहीं था, अतः ऐसे ही खड़ा रहा। उसी दिन पहली बार मैंने संघ की प्रार्थना सुनी और दोहरायी थी। गाँव में संघ से मेरा परिचय बस इतना ही रहा।
-- डा विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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