आत्मकथा भाग-1 अंश-51

अगले वर्ष अ.भा. विद्यार्थी परिषद के कुछ नये और कट्टर समर्थक विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर आये। उनसे परिचय होने पर हमने विधिवत् विद्यार्थी परिषद की ज.ने.वि. में स्थापना की। श्री संजय सत्यार्थी को उसका संयोजक तथा मुझे कार्यवाहक बनाया गया। हमारे लगभग 30 पक्के और सक्रिय समर्थक थे, लेकिन सहानुभूति रखने वालों की संख्या लगभग 100 थी। हमने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सायंकालीन शाखा भी कैम्पस के अन्दर लगाना शुरू किया जो काफी समय तक चलती रही, लेकिन उसकी संख्या 20 से ऊपर नहीं जा सकी। यह संख्या भी काफी उत्साहवर्धक थी, क्योंकि इससे पहले वहाँ कोई संघ का नाम लेने वाला भी नहीं था। हमारी शाखा लगाने के लिए उस समय आई.आई.टी, नई दिल्ली में पढ़ाने वाले डा. दुर्ग सिंह चौहान आया करते थे, जो बाद में उ.प्र. तकनीकी विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद पर भी रहे।
अ.भा. विद्यार्थी परिषद से सम्बन्धित रहते हुए मैंने बहुत राजनैतिक क्रियाकलापों में भाग लिया और मैं ऐसे हर कार्य में अग्रिम पंक्ति में रहता था। यह मेरी पढ़ाई के दूसरे और तीसरे साल की बात है। जब मैं अपनी गले की बीमारी से जुझता हुआ एम.फिल. पूरा करने की कोशिश कर रहा था।
मैं प्रारम्भ से ही कविताएं आदि लिखने में रुचि रखता था। मेरी कविताएं मेरे कुछ गिने चुने सहपाठियों को काफी पसन्द आती थी। उनके ही आग्रह से मैं दो-तीन बार वि.वि. में आयोजित होने वाली कवि गोष्ठियों में भी शामिल हुआ था और अपनी गज़लें पढ़ी थीं।
उर्दू शायरी में अपनी रुचि के कारण मैं विश्वविद्यालय के मुस्लिम छात्रों में काफी लोकप्रिय हो गया था। वैसे मैं धर्म के आधार पर किसी भी भेदभाव के पक्ष में नहीं हूँ। लेकिन रा.स्व.संघ का समर्थक होने के कारण लोग गलती से यह समझते थे कि हम मुसलमानों तथा अन्य धर्मवालों से नफरत करते हैं, जबकि यह बात सत्य नहीं है। जब ऐसी आशंका रखने वाले लोग मेरे नजदीक आते थे और मेरे धर्मनिरपेक्ष और मानवतावादी विचारों को सुनते थे तथा मेरी दैनिक गतिविधियों को भी देखते थे कि तो उन्हें बहुत आश्चर्य होता था कि मैं संघ का समर्थक क्यों हूँ। यह समझाने में मुझे बहुत परिश्रम करना पड़ता था कि मेरे जो विचार हैं वे संघ के ही है और तुम संघ को पास से देखोगे तो पाओगे कि हम किसी भी धर्म या जाति के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन लोगों को इस पर विश्वास नहीं होता था और मुझसे कहते थे कि तुम संघ के नहीं हो। कई कम्यूनिस्ट और मुस्लिम छात्र प्रायः मुझसे ऐसा कहा करते थे।
उन्हीं दिनों मैंने फाॅरट्रान प्रोग्रामिंग भाषा के शब्दों के आधार पर एक कविता लिखी थी, जो मेरे साथियों को काफी पसन्द आयी थी। वे कभी-कभी मुझसे यह कविता सुनाने का आग्रह करते थे और मैं उनकी इच्छा पूरी कर देता था। आप भी इस कविता का आनन्द लीजिए-
फाॅरट्रान में प्यार
प्रिये
मैं बुरी तरह तुम्हारे प्यार के
डू-लूप में फँस गया हूँ।
मेरी जिन्दगी के फ्लोचार्ट का
सारा लाॅजिक गड़बड़ा गया है।
मुझे आश्चर्य है कि
हम दोनों कहीं भी तो इक्विवेंलेंट नहीं हैं,
पचपन इंच है तुम्हारा डाइमेंशन
और मेरा है केवल दस
काॅमन सिर्फ इतना है कि
दोनों प्यार में पड़ गये हैं, बस!
मैंने तुम्हें कितने ही स्टेटमेंट दिये,
सैकड़ों बार राइट किया,
और कई बार काॅल भी किया,
पर, तुमने उनमें से
एक भी एक्जीक्यूट नहीं किया!
जाने कितने गा-टू का पालन करके
मैं तुम्हारे घर के दरवाजे तक पहुँचा,
मगर
तुम्हारे पापा के चेहरे को रीड करके
मेरा फाॅरमैट बिगड़ गया,
दिल की धड़कनें ओवरफ्लो हो गयीं,
मुझे वहाँ से रिटर्न होना पड़ा।
सोचता हूँ-
यह सबरूटिन कब तक काँटीन्यू रहेगा
कहीं न कहीं तो
इसे स्टाॅप देना ही पड़ेगा।
इफ
तुम्हारी तरफ से कम्पाइलेशन ओ.के. हुआ,
दैन
मेरा प्रोग्राम सफल हो जाएगा,
ऐल्स
मेरे जीवन का एंड हो जाएगा।
एक दिन की बात है, हमारे स्कूल का एक कमरा खाली था उसमें एक बाहर का लड़का और एक लड़की, जो दोनों ही मुस्लिम थे और हमारे वि.वि. के किसी अन्य स्कूल में पढ़ते थे, ‘मीर’ का निम्नलिखित शेर उर्दू और हिन्दी में बोर्ड पर लिख रहे थे-
अशफाक की मंजिल से गया कौन सलामत?
असबाब लुटा राह में याँ हर सफरी का।
संयोग से उसी समय मैं वहाँ पहुँच गया। इस शेर को पढ़कर मैंने उनको निम्नलिखित शेर सुनाया-
हिरासां हो न हरगिज रहजनों से राहे-उल्फत में।
जो इस रस्ते में लुट जायें बड़ी तकदीर वाले हैं।।
यह शेर को सुनकर वे दोनों ‘वाह-वाह’ कर उठे। उन्होंने मेरा नाम पूछा। उन्होंने समझा था कि मैं भी मुसलमान हूँ। लेकिन जब मैंने बताया- ‘विजय कुमार सिंघल’, तो वे और भी आश्चर्यचकित हुए कि यह हिन्दू होते हुए भी इतनी अच्छी उर्दू शायरी जानता है। उसके बाद जब भी उन दोनों में से कोई मुझे आते-जाते मिलते थे तो ‘हैलो’ जरूर करते थे।
कुल मिलाकर मैं ज.ने.वि. में काफी रम गया था। मैं सोचा करता था कि यदि कभी अचानक वि. वि. छोड़ना पड़ा तो मेरी सारी गतिविधियों का क्या होगा।

यहाँ यह बता दूँ कि जनेवि में पहले साल मुझे कोई फैलोशिप नहीं मिली, क्योंकि कोई खाली नहीं हुई थी। लेकिन दूसरा साल शुरू होते ही मुझे अपने ही विवि की फैलोशिप मिल गयी थी, जो रु. 600 प्रतिमाह थी और साथ में रु. 250 प्रतिमाह स्टेशनरी-पुस्तकों आदि के लिए मिला करते थे, जिनके लिए बिल देना पड़ता था। मैं अपनी फैलोशिप में से काफी राशि बचा लेता था, क्योंकि वहाँ रहना तो लगभग मुफ्त था और खाने के लिए केवल लगभग रु. 150 प्रतिमाह का बिल देना होता था। अपनी बचायी गयी राशि में से मैंने अपने एक रिश्तेदार का कर्ज चुका दिया था, जो कुछ हजार रुपयों का था और पिताजी जिसके लिए चिन्तित रहते थे। मेरी पढ़ाई पूरी होने तक हमारा परिवार पूरी तरह ऋणमुक्त हो चुका था। 

-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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