आत्मकथा भाग-1 अंश-50
हमारे समूह से मैं तथा एक-दो अन्य लड़के ही नियमित कम्प्यूटर का प्रयोग करते थे। कम्प्यूटर के समय को लेकर हम में प्रायः झगड़ा होता रहता था। तभी एक ऐसी घटना हो गयी, जो काफी गंभीर मोड़ तक पहुंच गयी थी। हुआ यह कि एक बार मैंने कम्प्यूटर के साथ जुड़े हुए प्रिन्टर को गलती से खोल लिया, लेकिन मैं उसे ठीक से लगा नहीं पाया और इसी तरह छोड़कर चला आया। जब प्रो. बनर्जी, जो कम्प्यूटर के इंचार्ज थे, को इस घटना का पता चला तो उन्होंने मुझे बहुत डाँटा। मैं उनसे पहले से जला हुआ तो था ही, इससे और ज्यादा भड़क गया, हालांकि गलती मेरी थी।
कुछ दिनों बाद मेरा उनके एक चेले से, जो बहुत उद्दंड था तथा खुद को दादा मानता था, कम्प्यूटर के ऊपर झगड़ा हो गया। तभी प्रो. बनर्जी तथा उनके ही साथी डाॅ. सक्सेना वहाँ आ गये और बिना पूरी बात सुने उस लड़के का पक्ष लेकर मुझे डाँटने लगे। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने कुछ उल्टा-सीधा बोल दिया। इस बात पर प्रो. बनर्जी बहुत नाराज हो गये और उन्होंने कम्प्यूटर को अनिश्चित काल के लिए बन्द कर दिया। तब मैंने उनसे कहा- ‘सर! यह तानाशाही है और मैं इसके खिलाफ लडूँगा।’
उसी दिन प्रो. बनर्जी ने मेरी शिकायत करते हुए एक पत्र हमारे डीन डाॅ. मुखर्जी को लिखा। डा. मुखर्जी ने मुझसे जबाब माँगा तथा मेरे गाइड डाॅ. सदानन्द को भी सूचित कर दिया। मुझे डर था कि डाॅ. सदानन्द मुझे बहुत डाँटेंगे, क्योंकि सारी गलती मेरी थी। लेकिन उस समय मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने मुझसे कहा- ‘तुम उनसे जो कुछ कहा या किया, ठीक है। अगर वे राजनीति खेलना चाहते हैं, तो हम भी तैयार हैं।’ मैं यह सुनते ही धक से रह गया। उस दिन से मेरी नजरों में डाॅ. सदानन्द का सम्मान कुछ कम हो गया। मेरे कई दोस्तों ने मुझे समझाया भी कि प्रायः प्रोफेसर इसी तरह अपने छात्रों को अपना मोहरा बनाते हैं।
कुछ दिन बाद डाॅ. मुखर्जी ने मुझे और प्रो. बनर्जी को बातचीत तथा समझौते के लिए बुलाया और मुझे समझाया कि ये तुम्हारे गुरु हैं, इनसे उलझना नहीं चाहिए तथा इनका सम्मान करना चाहिए। उन्होंने प्रो. बनर्जी का शिकायती पत्र भी मुझे पढ़ने को दिया। उसे पढ़कर मैंने कह दिया कि इसमें जो कुछ लिखा है, ठीक है। मैंने अपनी गलती स्वीकार की और प्रो. बनर्जी से अपनी धृष्टता के लिए क्षमा मांगी। यह प्रो. बनर्जी की महानता ही कही जायेगी कि उन्होंने न केवल मुझे क्षमा कर दिया, बल्कि आगे मुझे बहुत सहयोग और प्यार दिया।
हमारे इस समझौते को स्कूल में बहुत प्रशंसा मिली। मेरे अधिकतर साथियों ने मुझे इस बुद्धिमत्तापूर्ण कदम के लिए बधाई दी। डाॅ. सदानन्द भी मामला समाप्त हो जाने पर खुश थे। लेकिन कई लोग ऐसे भी थे जो मुझे बलि का बकरा बनाना चाहते थे और इस तरह मामला समाप्त हो जाने से अपने मन में खुश नहीं थे।
अपने स्कूल की राजनीति में तो मैं सक्रिय और प्रमुख भाग अदा करता ही था, विश्वविद्यालय स्तरीय राजनीति में भी मैं सक्रिय भाग लेता था। जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ हमारे वि.वि. का वातावरण लोकतांत्रिक था। वहाँ छात्रसंघ के चुनाव भी छात्रों की ही देखरेख में पूर्णतया लोकतांत्रिक रीति से होते थे। चुनाव प्रचार में पैसे या रौब-दाब का नहीं बल्कि विचारों का अधिक महत्व था। हमारे वि.वि. की राजनीति ज्यादातर शान्तिपूर्ण रहती थी। चुनावों के समय अध्यक्ष पद के सभी उम्मीदवार एक ही मंच से भाषण देते थे तथा उनमें किसी भी प्रकार की कटुता उत्पन्न नहीं हो पाती थी। चुनावों में छपे हुए पोस्टर लगाना मना था।
ज.ने.वि. के छात्रों की विचारधाराओं में गम्भीर मतभेद होते थे। वहाँ पर जहाँ हम जैसे जनसंघी थे, वहीं घोर चीन-समर्थक नक्सलवादी भी पर्याप्त संख्या में थे। लेकिन वहाँ मार्क्सवादी छात्र संगठन एस.एफ.आई. बहुत ताकतवर था। दूसरे नम्बर पर ‘फ्री थिंकर्स’ नाम का एक गुट था, जिसके सदस्य प्रायः आभिजात्य वर्ग की औलादें थीं। यह गुट केवल चुनावों के समय ही सक्रिय होता था। लोहिया समर्थक समाजवादी तथा कम्यूनिस्ट भी पर्याप्त संख्या में थे और जनसंघी विचारधारा के छात्रों की संख्या 50-60 से अधिक नहीं थी। कांग्रेसी मात्र 10-20 थे। यानी कुल मिलाकर वहाँ का वातावरण प्रायः वामपंथी था और लगभग सारे छात्र घोर कांग्रेस-विरोधी थे।
दूसरे विश्वविद्यालयों के विपरीत जहाँ चंद गुंडा-टाइप छात्र नेता सारी राजनीति पर कब्जा किये रहते हैं और आम छात्र उनसे दूर ही रहते हैं, हमारे विश्वविद्यालय के अधिकतर छात्र राजनीति में सीधा दखल रखते थे। इसका कारण शायद यह था कि अधिकतर छात्र राजनैतिक रूप से जागरूक थे और उन्हें जल्दी बुद्धू नहीं बनाया जा सकता था। वहाँ लगभग प्रति सप्ताह कोई न कोई बड़ा नेता अपने विचार प्रकट करने के लिए आता रहता था। उन्हें अपने भाषण के उपरान्त छात्रों के तीखे प्रश्नों का जबाब भी देना पड़ता था। स्व. श्री पीलू मोदी, श्री सुब्रह्मण्यम् स्वामी तथा श्री अरुण जैटली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में नियमित आने वालों में थे।
विश्व के किसी भी भाग में घटने वाली किसी महत्वपूर्ण घटना की प्रतिक्रिया किसी न किसी रूप में जे.एन.यू. में हो जाती थी, चाहे वह फूलन देवी द्वारा किया गया नरसंहार हो या रूस द्वारा अफगानिस्तान पर आक्रमण किया गया हो। यह छात्रों की जागरूकता के कारण ही संभव था। लगभग प्रति सप्ताह वहाँ किसी व्यक्ति या घटना के समर्थन या विरोध में जुलूस निकल जाता था। जे.एन.यू. इस हिसाब से बहुत संवेदनशील था। ‘मीर’ ने कहा है -
काँटा लगे किसी को तड़पते हैं हम अमीर।
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है।।
काँटा लगे किसी को तड़पते हैं हम अमीर।
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है।।
यह बात ज.ने.वि. के छात्रों पर शत प्रतिशत सही बैठती थी। विश्वविद्यालय की मैसों (भोजनालयों) तथा कैन्टीनों में अलग-अलग तरह के पोस्टरों की भरमार रहती थी, जिनमें नारों से लेकर कविताएँ और चुनौतियों से लेकर कार्टून तक लिखे रहते थे। कई छात्र केवल पोस्टरों से राजनीति करते थे। वहाँ कई ऐसे प्रतिभाशाली छात्र थे, जिनका शौक था नये-नये पोस्टर लगाकर लोगों की ज्ञानवृद्धि करना। एक बार एक छात्र ने एक पोस्टर पर यह नारा लिख दिया था-
इन्दिरा गाँधी कैसी है?
फूलन देवी जैसी है।
इसके जवाब में किसी अन्य ने उसी के नीचे अपनी निम्न टिप्पणी लिख दी थी-
‘यह तो फूलन देवी का अपमान है।’
इन्दिरा गाँधी कैसी है?
फूलन देवी जैसी है।
इसके जवाब में किसी अन्य ने उसी के नीचे अपनी निम्न टिप्पणी लिख दी थी-
‘यह तो फूलन देवी का अपमान है।’
इस एक उदाहरण से ज.ने.वि. के छात्रों की बौद्धिकता और जागरूकता का अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे ही वातावरण में मेरी राजनैतिक दीक्षा हुई। प्रथम वर्ष में मैं किसी संगठन विशेष से जुड़ा हुआ नहीं था। उन दिनों अ.भा. विद्यार्थी परिषद का अस्तित्व वि.वि. में नहीं था। संघ की विचारधारा का होने के कारण मेरी सहानुभूति विद्यार्थी परिषद के साथ ही थी, लेकिन उसका अस्तित्व न होने से मैं प्रायः समाजवादियों और लोहियावादियों का समर्थन करता था और उनके क्रियाकलापों में भी भाग लेता था। उनकी एक पार्टी थी- समता युवजन सभा, जिसका मैं चवन्नीछाप सदस्य भी था। उनके द्वारा चलाये गये आन्दोलनों आदि में मैंने सक्रिय भाग लिया था। एक बार मैं उनके साथ एक दिन के सामूहिक अनशन पर भी बैठा था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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