आत्मकथा भाग-1 अंश-49

इस यात्रा के दौरान मैं हैदराबाद में एक दिन विचित्र मुश्किल में फंस गया था, जिसमें से मैं अपनी सूझ-बूझ से ही निकला था। उस दिन मैं अकेला ही हैदराबाद का सालारजंग संग्रहालय तथा चिड़ियाघर देखने चल पड़ा था। मेरी जेब में उस समय एक 50 रुपये का नोट और एक दो रुपये का नोट था तथा 50 पैसे खुले थे। लेकिन मैंने सोचा कि मेरे पास चार रुपये 25 पैसे हैं अर्थात् मुझे यह ध्यान नहीं था कि एक रुपये 75 पैसे मैं खर्च कर चुका हूँ।
पहले मैं सालारजंग म्यूजियम गया और उसे निश्चिंततापूर्वक देखा। बाहर आकर मैंने दो रुपये के केले खाये और फिर चिड़ियाघर जाने वाली बस में चढ़ गया। मेरा ख्याल था कि मेरे पास अभी 2 रुपये 25 पैसे और हैं। लेकिन जब मैंने दो का नोट निकालने के लिए जेब में हाथ डाला तो उसमें से मात्र एक चवन्नी बरामद हुई। अब मैं घबराया क्योंकि बस की टिकट में ही 40 पैसे लगते थे। मैंने कंडक्टर से कहा कि मेरे पास अब केवल 50 रुपये का नोट रह गया है। उसने कहा कि खुले पैसे नहीं है तो उतरो। अब मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि वहीं उतरकर पैदल वापस आता। लेकिन तभी मैंने दो का नोट ढूंढने के लिए एक बार फिर अपनी जेबें टटोलीं, तो मेरे सौभाग्य से एक जेब में एक और चवन्नी पड़ी मिल गयी, जिसका मुझे ज्ञान नहीं था।
अब मेरे पास दो विकल्प थे कि वहीं उतरकर वापस चला जाऊँ या चिड़ियाघर पहुँचकर 50 का नोट तुड़ाने की कोशिश करूँ। उन दिनों रेजगारी की जैसी किल्लत थी, उसमें 50 का नोट तुड़ाना कम से कम मेरे लिए तो असंभव ही था, लेकिन मैंने न जाने क्या सोचकर चिड़ियाघर जाना ही तय किया। चिड़ियाघर पहुँचने पर मेरे पास 50 रुपये का एक नोट और एक 10 पैसे का सिक्का मात्र था। मैंने कुछ बस कंडक्टरों और दुकानदारों से 10-10 के नोट देने के लिए निवेदन किया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। बिना रेजगारी के मेरे 50 रुपये वाले नोट का मूल्य मेरे लिए एक कोरे कागज से ज्यादा नहीं था।
चिड़ियाघर में घुसने की टिकट 50 पैसे मात्र थी और मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ। तभी एक विचार मेरे दिमाग में आया। जिस बस में मैं आया था, उसी में एक मुस्लिम सज्जन अपने 8-10 सदस्यों के परिवार के साथ चिड़ियाघर देखने आये थे। मैंने उनसे प्रार्थना की कि आप मेरे नोट में से सबके लिए टिकट खरीद लें, जिससे खुले रुपये आ जायेंगे। वे सज्जन तैयार हो गये और मैं सबके लिए टिकट खरीदने के लिए लाइन में लग गया।
मुझे उस लाइन में लगे हुए मात्र एक मिनट ही हुआ था कि जाने किधर से एक लड़का आया और मुझसे पूछा- टिकट लोगे? मैं समझ तो गया, लेकिन मुझे विश्वास नहीं आया। तब उसने बिना और कुछ कहे टिकट मेरे हाथ में रख दिया। मैं टिकट को उलट-पुलटकर देखने लगा कि कहीं यह मुझे बेवकूफ तो नहीं बना रहा है। लेकिन मुझे उसमें कोई कमी नजर नहीं आयी। तब तक वह लड़का चला गया था। मुझे तब भी विश्वास नहीं आया। जो लोग खिड़की पर से टिकट खरीदकर ला रहे थे, उनसे मैंने टिकट मिलाकर देखा और संतुष्ट हो गया। मैंने ईश्वर को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया, लेकिन इस बात का अफसोस रहा कि मैं उस सहृदय लड़के को औपचारिक धन्यवाद भी नहीं दे सका।
ईश्वर का नाम लेकर मैं चिड़ियाघर में प्रवेश कर गया और घूम-घूमकर देखने लगा। वह काफी बड़ा और अच्छा था, लेकिन मैं उसका पूरा आनन्द नहीं ले पाया, क्योंकि एक तो मुझे जोर की भूख लग रही थी और फिर वापस लौटने की चिन्ता भी थी। मैंने कई सूटेड-बूटेड लोगों से 50 रुपये के खुले रुपयों के बारे में पूछा, लेकिन सबने मना कर दिया। अंग्रेजी देवी भी इसमें मेरी कोई मदद नहीं कर सकी।
मैं एक कैन्टीन की तलाश में था। अन्ततः ऐसी एक कैन्टीन मुझे मिल गयी जहाँ दूध की बोतलें डेढ़-डेढ़ रुपये में बिक रही थीं। मैंने उससे एक-दो बोतलें लेने की इच्छा व्यक्त की और बताया कि मेरे पास पचास का नोट है, तो उसने कह दिया खुले रुपये नहीं है। वहीं काउन्टर पर एक और आदमी रुपये गिन रहा था। उसके पास खुले नोट भी थे, लेकिन मेरी हिम्मत उससे माँगने की नहीं हुई। जब उसने सिर उठाकर देखा कि मेरे हाथ में पचास का नोट है तो वह समझ गया कि इसे खुले रुपये चाहिए। उसने मुझसे नोट ले लिया और गिन कर 5-5 के 10 नोट पकड़ा दिये।
मेरी एक बहुत बड़ी समस्या तो हल हो गयी थी, लेकिन भूख का इन्तजाम और करना था। इसलिए मैंने 9 नोट तो अपनी जेब के हवाले किये और दसवाँ नोट पहले आदमी की तरफ बढ़ाया कि एक बोतल दे दो। तो वह फिर बोला- खुले पैसे नहीं हैं। मैं नियति के इस मजाक पर हँस पड़ा। खैर, मैंने सोचा कि नहीं हैं तो न सही, बाहर देखा जायेगा। मैं तुरन्त बाहर आया और कुछ खाकर अपने पेट की आग शान्त की।
हमारी यह यात्रा आशा से अधिक सफल रही। लोग मेरी कार्य कुशलता का लोहा मान गये और कई लड़के तो मजाक में मुझे ‘मैनेजिंग डायरेक्टर’ कहा करते थे।
हमारी इन सफलताओं से दक्षिणपंथी गुट लगभग शान्त हो गया था। यद्यपि उनके नेता प्रो. दिलीप कुमार बनर्जी, जो वैसे बहुत योग्य थे, तब तक वापस आ गये थे। उस वर्ष छात्र-अध्यापक समिति के लिए जो चुनाव हुए उनमें हमारे ग्रुप द्वारा नामजद पाँचों छात्र निर्विरोध निर्वाचित हो गये थे, क्योंकि दूसरे गुट ने किसी को खड़ा करने तक की हिम्मत नहीं की थी। चुने जाने वालों में इस बार भी मेरा नाम था।
प्रो. बनर्जी के आ जाने के बाद उस ग्रुप को कुछ आत्मविश्वास प्राप्त हुआ और वे फिर से हमसे उलझने की कोशिश करने लगे थे। इसका एक कारण यह भी था कि उस समय डा. मुखर्जी डीन थे तथा प्रो. बनर्जी हमारे एक मात्र चालू कम्प्यूटर के इंचार्ज थे। दूसरा समूह इस बात का नाजायज फायदा उठाने की सदा कोशिश किया करता था।
उस समय हमारे सेन्टर पर एक ही कम्प्यूटर था- एच.पी. 1000/40 जो कि मिनी कम्प्यूटर था और उस पर एक बार में एक ही व्यक्ति काम कर सकता था। नियम के अनुसार कोई छात्र या अध्यापक उस पर प्रतिदिन अधिक से अधिक एक घंटे कार्य कर सकता था, यदि दूसरा कोई उसका प्रयोग करना चाहता हो। लेकिन उस गुट के लड़के जानबूझकर ज्यादा समय लेते थे और झगड़ा करने की कोशिश करते थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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