आत्मकथा भाग-1 अंश-48
मेरा कक्षा कार्य पूरा होने के बाद मुझे अपने परियोजना कार्य के लिए कोई संरक्षक गाइड चुनना था। मैंने उसके लिए डा. आर. सदानन्द को पसंद किया। वे यद्यपि पढ़ाने में बहुत अच्छे नहीं थे, लेकिन उनमें कई गुण ऐसे थे जो अन्य अध्यापकों में उपलब्ध नहीं थे। मेरे सौभाग्य से वे तुरन्त मुझे गाइड करने के लिए तैयार हो गये। इसका एक कारण यह भी था कि मैं आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस जैसे नये विषय पर कुछ शोध कार्य करना चाहता था। वहाँ इस विषय के विशेषज्ञ डाॅ सदानन्द ही थे।
लेकिन उन्हीं दिनों मेरे गले पर चारों ओर टान्सिल उग आये थे, जिनमें बहुत दर्द होता था तथा मवाद भी निकलता था। मैंने इनका इलाज पहले आगरा में कराया। मेरे बड़े भाई डा. राममूर्ति सिंघल उन दिनों आगरा के ही सरोजिनी नायडू मेडीकल काॅलेज तथा अस्पताल में हाउस जाॅब कर रहे थे। उन्होंने अच्छे-से-अच्छे डाक्टर से मेरा इलाज कराया। कई बार उन्होंने मेरे गले पर चीरा लगाकर मवाद निकाला। उन्होंने क्षयरोग (टी.बी.) से मिलता जुलता कोई रोग बताया था। मुझे इससे पूरी तरह छुटकारा पाने में लगभग एक साल लग गया था। मुझे स्ट्रेप्टोमाइसिन के सैकड़ों इन्जेक्शन लगवाने पड़े थे तथा इथाम्ब्यूटाॅल की सैकड़ों गोलियां या कैप्सूल भी खाने पड़े थे।
हमारे वि.वि. के मेडीकल सेन्टर के प्रमुख डाॅ. बी.बी. अग्रवाल बहुत स्नेही डाक्टर थे। उन्होंने बहुत लगन के साथ मेरी देखभाल की थी तथा कई बार छोटे-छोटे आपरेशन करके मवाद निकला था। मुझे वहाँ से सारी दवाएँ मुफ्त मिल जाती थी। उन दवाओं से मेरे टान्सिल आदि तो ठीक हो गये थे, लेकिन नजर की कमजोरी आदि कई अन्य शिकायतें पैदा हो गयी थीं। जब मैंने डा. अग्रवाल को बताया कि मेरी नजरें बहुत कमजोर हो गयी हैं, तो उन्होंने तत्काल इथाम्ब्यूटाॅल के कैप्सूल बन्द कर दिये। इससे कई महीनों बाद ही मेरी आँखें सामान्य हो पायीं।
उस एक साल की अवधि में मेरी पढ़ाई लगभग ठप्प थी। डा. सदानन्द ने मुझसे कहा था कि पहले तुम अपने स्वास्थ्य की चिन्ता करो। डिजर्टेशन की चिन्ता बाद में करना। उन्हीं दिनों मैंने योगासन आदि सीखे थे पुस्तकों से पढ़कर और कई माह तक नियमित करता भी रहा था। मैं प्रायः प्रातःकाल पहाडों की ओर टहलने भी जाता था। इससे मेरा स्वास्थ्य काफी सुधरा भी था। लेकिन मैं हर दो-तीन महीने पर आगरा आता रहता था, जिससे योगासनों में व्यवधान आ जाता था। इसका नुकसान भी मुझे उठाना पड़ता था।
यहाँ यह बता दूँ कि यों तो गाँव में भी मेरा स्वास्थ्य कोई अच्छा नहीं था, लेकिन आगरा आने पर तो और भी खराब हो जाता था, क्योंकि वहाँ का वातावरण मुझे अनुकूल नहीं आता था। वहाँ से जब मैं बीच-बीच में गाँव जाता था, तो आश्चर्यजनक रूप से वहाँ मैं एक सप्ताह में ही लगभग पूरी तरह स्वस्थ हो जाता था। दिल्ली में हमारे विश्वविद्यालय का क्षेत्र पहाड़ी था, वहाँ का वातावरण मुझे बहुत अनुकूल रहता था, इसलिए मैं दिल्ली में अपने प्रवास के दौरान कभी भी बीमार नहीं पड़ा। यों मुझे कभी-कभी जुकाम आदि हो जाता था, जो दो-तीन दिन में ठीक हो जाता था। मैं अपना स्वास्थ्य कम से कम इतना बनाये रखता था कि मैं पूर्ण क्रियाशील रह सकूँ।
उन दिनों मेरे बड़े भाईसाहब डाॅ राममूर्ति जी, जो एनास्थिसियोलाॅजी में एम.डी. कर चुके थे और आगरा में ही प्राइवेट प्रक्टिस कर रहे थे, की शादी की बातचीत चल रही थी। कई लड़कियों को देखने के बाद उन्हें हमारे दूर के रिश्तेदार की एक लड़की पसन्द आयी। मैं इस रिश्ते से उस समय सहमत नहीं था, क्योंकि वे बड़े और धनी परिवार की थीं और मैं सोचा करता था कि धनी परिवार से आयी हुई कोई लड़की हमारी और हमारे माता-पिता की इज्जत नहीं कर सकेगी। लेकिन मैंने विवाह में कोई व्यवधान उपस्थित नहीं किया और पूरे मन से शादी में भाग लिया। मैं बारात में काफी देर तक नाचता रहा था और एक बार अपने बड़ी भाभीजी के सामने नाचते हुए फोटो भी खिंचवाया था। मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि अपनी नयी भाभीजी के बारे में मेरी सारी आशंकाएँ गलत सिद्ध हुईं। भाभीजी को हमने बहुत ही समझदार और शान्त प्रकृति की पाया। वे मुझे बहुत प्यार करती हैं। उनका सारा परिवार भी हमारी बहुत इज्जत करता है।
उस वर्ष छात्र संघ के चुनावों में मैंने अपने स्कूल से श्री बी. राजेश्वर का पार्षद पद के लिए खुला समर्थन किया। दूसरे गुट ने मुझे फोड़ने के लिए कई हथकंडे अपनाये, लेकिन मैं टस से मस नहीं हुआ। मैंने श्री राजेश्वर को जिताने में दिन-रात एक कर दिये थे। उसमें श्री कृष्णराव का मार्गदर्शन मुझे मिला। मुकाबले में पुनः श्री आदित्य चन्द्र झा थे। जब परिणाम आया तो सभी आश्चर्यचकित रह गये। श्री झा को मात्र 12 वोट मिले थे और श्री राजेश्वर 22 वोट पाकर भारी बहुमत से जीत गये। लोगों ने इस जीत का बहुत कुछ श्रेय मुझे दिया। आगे श्री राजेश्वर की सारी गतिविधियों का संचालक मैं ही रहा। लड़के मुझे सुपर काउन्सलर कहा करते थे।
उस वर्ष कम्प्यूटर सोसायटी आफ इंडिया का वार्षिक सम्मेलन मद्रास में होना था। हमारे स्कूल से छात्रों ने जाने का प्रोग्राम बनाया और उस यात्रा का नेतृत्व औपचारिक रूप से श्री राजेश्वर को तथा अनौपचारिक रूप से मुझे सौंपा गया। उस यात्रा का प्रबन्ध करने में मैंने जी-तोड़ मेहनत की। हमारी यात्रा के पड़ाव मद्रास, बंगलौर तथा हैदराबाद थे। उस समस्त स्थानों के लिए तथा वापस दिल्ली के लिए गाड़ियों में आरक्षण कराने का मुश्किल कार्य मैंने पूरा कर दिखाया और हमें कहीं कोई कठिनाई नहीं हुई। श्री राजेश्वर तथा डा. सदानन्द के सहयोग से हमने इन तीनों ही स्थानों पर ठहरने का प्रबन्ध भी बहुत मामूली खर्च में कर लिया और अधिकतम यह कोशिश की कि किसी को कोई परेशानी न हो।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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