आत्मकथा भाग-1 अंश-47

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सतलज छात्रावास में रहते हुए मेरे कई ऐसे मित्र भी बने जो मेरे सहपाठी नहीं थे। उनमें पहला नाम है मेरे रूम पार्टनर श्री रमेश डांडगे का वे मराठी थे और अनुसूचित जाति के थे, लेकिन हम दोनों बहुत अच्छे पार्टनर थे। मेरा सौभाग्य कि मुझे उनके साथ रहने का अवसर मिला। उनका स्वभाव बहुत अच्छा था। यद्यपि उनकी राजनैतिक विचारधारा मुझसे भिन्न थी, इसके बावजूद हमारी मित्रता एक आदर्श थी। मेरी लापरवाही के कारण कई बार उन्हें परेशानी उठानी पड़ती थी, लेकिन इसके बावजूद वे मुझसे नाराज नहीं होते थे। उनमें बस एक ही कमी थी वह यह कि वे अपनी जाति के कारण कुछ हीनभावना से ग्रस्त थे और चाहते थे कि उनका विवाह किसी सवर्ण लड़की से हो जाये। ऐसी हीनभावना मैंने अनुसूचित जाति के प्रायः प्रत्येक व्यक्ति में देखी है। वे कहने को तो जातिवाद के विरोधी थे और अन्तर्जातीय विवाह के समर्थक थे, लेकिन स्वयं सवर्णों में ही विवाह करना चाहते थे। जब मैं कहता था कि आप अपने से छोटी मानी जाने वाली जाति में विवाह करके आदर्श प्रस्तुत करें, तो वे चुप हो जाते थे।
उसी होस्टल में मेरे बगल वाले कमरे में श्री रजनीश चन्द्र श्रीवास्तव रहते थे उनसे मेरी काफी घनिष्टता हो गयी थी। उनका स्वभाव भी बहुत अच्छा था और पूरे होस्टल में वे बहुत लोकप्रिय थे। उनके माध्यम से मेरा परिचय काफी लोगों से हुआ था। मुझे दुःख इसी बात का है कि वे ज्यादातर एस.एफ.आई. के लोगों के सम्पर्क में रहते थे और प्रायः उनका ही समर्थन करते थे। उन्हें संघ में लाने के मेरे सारे प्रयास असफल रहे, हालांकि एक दिन वे शाखा भी गये थे। आजकल वे वहीं पर भूगोल में एम.फिल करने के बाद पी.एच.डी. कर रहे हैं। वे हरदोई के मूल निवासी हैं और मैं लखनऊ से हरदोई जाकर उनके विवाह में सम्मिलित हुआ था।
(पादटीप- डाॅ रजनीश चन्द्र श्रीवास्तव अब श्रीगंगानगर (राजस्थान) में किसी कालेज में प्रोफेसर पद से जून 2021 में अवकाश प्राप्त करने वाले हैं और अब वहीं रहते हैं।)
अब मैं ज.ने.वि. के अपने शिक्षकों का परिचय दूँगा। हमारा स्कूल यद्यपि विश्वविद्यालय की राजनीति का केन्द्र नहीं था, क्योंकि उसमें बहुत कम छात्र (अर्थात् वोट) थे, लेकिन अध्यापकों में राजनीति बहुत चलती थी। उनके दो प्रमुख गुट थे। एक गुट में थे- डा. आर. सदानन्द, श्री जी.वी. सिंह, डाॅ. एच.बी. मित्तल आदि। यह गुट वामपंथी माना जाता था। डा. सदानन्द कम्यूनिस्ट थे और अपनी वामपंथी विचारधारा के लिए प्रसिद्ध थे। वे काफी सिद्धान्तवादी थे और दूसरे गुट के गलत कामों का जमकर विरोध करते थे। दूसरा गुट था- श्री एन.पी. मुखर्जी, प्रो. डी.के. बनर्जी, डा. आर.जी. गुप्ता, डा. पी.सी. सक्सेना आदि। यह गुट बहुत शक्तिशाली था और स्कूल का हर कार्य अपने लाभ को दृष्ट में रखकर करना चाहता था। यों इस ग्रुप में केवल एक-दो अध्यापक ही संघ से सम्बन्धित थे, लेकिन इस पूरे गुट को ही आर.एस.एस. का गुट कहकर बदनाम किया जाता था। इस गुट की बदनामी अकारण भी नहीं थी। हमारे विद्यालय में एडमीशनों में घपला होने के लिए इस गुट को ही जिम्मेदार ठहराया गया था, जिसके फलस्वरूप प्रो. बनर्जी को एक साल की छुट्टी पर जाना पड़ा था।
इन दोनों गुटों के अतिरिक्त एक तीसरा गुट भी था जिसे हम गुटनिरपेक्ष कह सकते हैं। इसमें एक-दो अध्यापक ही शामिल थे, जो अवसर के अनुसार इधर या उधर हो जाते थे तथा ज्यादातर चुप रहते थे।
अध्यापकों के गुटों के अनुसार सारे पुराने छात्र भी दो गुटों में बँटे हुए थे, जिनमें से ज्यादातर वामपंथी गुट के साथ थे। छात्रों के बहुमत का समर्थन मिलने के कारण ही वह गुट दूसरे गुट के कामों का विरोध कर पाता था। प्रारम्भ में मैं उदासीन था, लेकिन बाद में श्री झा का चुनाव में समर्थन किया था जो दक्षिणपन्थी गुट के थे। लेकिन शीघ्र ही मैं उनकी एक गतिविधि से बहुत नाराज हो गया था। उन्होंने कई भूतपूर्व छात्रों को कम्प्यूटर सोसायटी आफ इंडिया के वार्षिक सम्मेलन का गलत तरीके से सदस्य बनाकर उनके हिस्से की चीजें बाँटकर खा गये थे। मैं इससे बहुत नाराज हुआ था और फिर मैंने सदा खुले रूप में वामपंथी गुट का साथ दिया था और उसका एक नेता माना जाता था।
हमारा कोर्स तीन सेमिस्टरों का था। पहले दो सेमिस्टरों में कक्षायें लगती थी तथा तीसरे सेमिस्टर में किसी प्रोजेक्ट पर डिजर्टेशन लिखी जाती थी। डिजर्टेशन के लिए जो परियोजना हाथ में दी जाती थी वह प्रायः एक सेमिस्टर में पूरी नहीं हो पाती थी। इसलिए डिजर्टेशन लिखने में प्रायः दो या तीन सेमिस्टर लग जाते थे। पहले सेमिस्टर का मेरा कोर्स वर्क बहुत अच्छा रहा और अपनी कक्षा में मैं कुल मिलाकर चौथे नम्बर पर था, लेकिन ग्रेडों में ज्यादा फर्क नहीं था। प्रथम सेमिस्टर के केवल एक पर्चे में मेरा ग्रेड बी+ था जो नौ में से छः अंकों के बराबर होता है। इस ग्रेड से मैं बहुत असंतुष्ट था, क्योंकि मेरा प्रदर्शन उस पेपर में उतना खराब नहीं था, अतः मैंने उस विषय के अध्यापक डाॅ. नारायण प्रसाद मुखर्जी, जो भारतीय जनसंघ के संस्थापक तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सुपुत्र थे, को एक पत्र लिखा, जिसमें मैंने उनसे अपना ग्रेड फिर से निर्धारित करने का निवेदन किया था। मेरे सौभाग्य से उन्होंने मेरी बातों को सत्य पाया और मेरा ग्रेड उस पर्चे में ए- जो नौ में से सात अंकों के बराबर होता है, हो गया। मुझे इसके लिए अधिक प्रत्यत्न नहीं करना पड़ा।
दूसरे सेमिस्टर में भी मुझे अच्छे ग्रेड मिले थे। दोनों सेमिस्टरों में कई विषयों में मैं दूसरे लड़कों के साथ सबसे आगे था। कक्षा कार्य की समाप्ति पर मैं अपनी कक्षा में चौथा था और पहले तीन से ज्यादा पीछे भी नहीं था।
ज.ने.वि. के प्रत्येक स्कूल में छात्रों और अध्यापकों की एक समिति बनायी जाती थी, जिसमें पांच छात्र तथा लगभग सभी अध्यापक होते थे। यह समिति दाखिलों आदि के समय प्रार्थना पत्रों की प्रारम्भिक छँटाई आदि का कार्य करती थे। आजकल तो इन कमेटियों के अधिकार बहुत कम कर दिये गये हैं लेकिन पहले इन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त थे। छात्र प्रतिनिधियों का चुनाव गुप्त मतदान से किया जाता था। स्वाभाविक रूप से प्रत्येक अध्यापक का यह प्रयास रहता था कि उसके समर्थक अधिक से अधिक छात्र उस समिति में चुने जायें। अतः इनके चुनाव के समय काफी सरगर्मी रहती थी, जो कि छात्र संघ के चुनावों से कुछ ही कम होती थी।
छात्र संघ के चुनावों में मैंने दक्षिणपंथी गुट का समर्थन किया था। यद्यपि वह काफी बदनाम था। मैंने इस बात पर विश्वास नहीं किया था कि इन्होंने प्रवेश के समय घोटाला किया होगा। लेकिन जब उनके एक छात्र श्री आदित्य चन्द्र झा हमारे स्कूल से छात्र संघ पार्षद कौंसिलर चुन लिए गये, तो उन्होंने कम्प्यूटर सोसायटी ऑफ इंडिया के अधिवेशन, जो उस वर्ष दिल्ली में हुआ था, में कुछ गलत काम किये थे, जिनके कारण मैं उनसे बहुत निराश हो गया था। मुझे यह भी विश्वास हो चला था कि उन्होंने पहले भी ऐसे ही काम किये होंगे।
अतः मैंने तुरन्त तय कर लिया कि अब मैं इनका साथ नहीं दूँगा। मैं अब खुलकर वामपंथी गुट के समर्थन में आ गया था और मैंने सबको चुनौती दे दी थी कि अगर किसी में हिम्मत है तो अगली बार प्रवेशों के समय घोटाला करके दिखाये। छात्र अध्यापक समिति के चुनावों में हमारे समूह ने पाँच छात्रों को खड़ा किया था जिनमें से चार चुन भी लिये गये थे, लेकिन पाँचवा केवल एक वोट से हार गया। चुने जाने वालों में मैं तथा श्री वी.एस.पी. श्रीवास्तव भी थे। इन चुनावों के बाद मैं अपने स्कूल में नेता के रूप में स्थापित हो गया।
उस वर्ष जो प्रवेश हुए, उनके प्रारम्भिक कार्यों में मैं अपनी बीमारी के कारण अनुपस्थित था, लेकिन शीघ्र ही लौट आया था। फिर सारे प्रवेश मेरी ही देख-रेख में हुए। मैं वहाँ कई घंटे रोज कार्य करता था और इस बात पर बहुत चौकन्ना रहता था कि कोई गड़बड़ करने की कोशिश न करे। उस वर्ष प्रवेश पूरी तरह शान्तिपूर्ण रहे और कई वर्षों बाद पहली बार ऐसा हुआ कि स्कूल में प्रवेशों पर कोई विवाद उत्पन्न नहीं हुआ। ज्यादातर लोगों ने इस बात का श्रेय छात्र अध्यापक समिति के छात्र प्रतिनिधियों और विशेषकर मुझको दिया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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