आत्मकथा भाग-1 अंश-46
कक्षा में मेरे सबसे अच्छे मित्र थे श्री विजय शंकर प्रसाद श्रीवास्तव जिन्हें सब लोग वी.एस.पी. कहा करते थे। वे पढ़ने-लिखने में हालांकि काफी अच्छे थे, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण थी उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति। वे अन्य लोगों के विपरीत बहुत मेहनती थे। दूसरे लोग जब गप्पों में समय गुजारते थे, तो वे कहीं पुस्तकालय में बैठे हुए पुस्तकें घोंट रहे होते थे। हमारी कक्षा में सबसे पहले एम.फिल. इन्हीं की पूरी हुई। इन्होंने केवल 4-5 महीनों में ही अपनी डिजर्टेशन लिखकर जमा कर दी थी, जब तक कि दूसरे लोगों ने काम ढंग से शुरू भी नहीं किया था। इनके डिजर्टेशन काफी अच्छी श्रेणी की थी और उचित ही उन्हें उच्चतम ग्रेड ए+ मिला था। बाद में इन्होंने पीएच.डी. भी कर ली थी। आजकल ये इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज लखनऊ में एक अच्छे पद पर हैं और यूरोप में 6 माह की ट्रेनिंग भी ले आये हैं। इनकी शादी भी हो चुकी है और अपने परिवार के साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं।
इनमें एक और खासियत थी कि दूसरे लोग जहाँ पैसे खर्चे करने में कंजूसी करते थे, वहीं ये कभी हाथ नहीं खींचते थे। जब भी हम सम्मिलित चाय पीते थे प्रायः ये ही पैसे चुकाते थे। हम दोनों की दोस्ती स्कूल में आदर्श मानी जाती थी। इसका एक कारण यह भी था कि हम दोनों के ही विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा और मान्यताओं पर आधारित थे।
(पादटीप- डॉ वीएसपी श्रीवास्तव पहले आई.टी.आई. मनकापुर (गोंडा) में सेवा करने लगे थे, फिर वे इन्दिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय में कम्प्यूटर विभाग के प्रमुख के पद तक पहुँचे और अब हाल में ही अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। मैं उनसे एक बार तब मिला था, जब हम वाराणसी में थे और वे अपने पुत्र का मुंडन संस्कार कराने मीरजापुर के पास विंध्यवासिनी देवी के मंदिर जाने के लिए आये थे। मैं भी उनके साथ गया था।)
इनके अतिरिक्त मेरी कक्षा में कई अन्य लोग भी थे जिनका मैं केवल नामोल्लेख कर रहा हूँ। पी. कृष्ण प्रसाद, सुनील कुमार सिन्हा, उड़ीसा के कोई त्रिपाठी, श्रीनिवासन आदि। अन्य के नाम मुझे याद नहीं आ रहे हैं। इनमें से श्री पी. कृष्ण प्रसाद मेरे अच्छे दोस्त थे और मेरे ही होस्टल में रहते थे। लेकिन बाकी के साथ मेरे औपचारिक सम्बन्ध ही थे।
यदि मैं अपने उन दोस्तों का जिक्र न करूँ जो मुझसे एक-दो साल आगे या पीछे थे, तो मेरा अपराध अक्षम्य होगा। मेरे वरिष्ठ दोस्तों में प्रमुख नाम है श्री एस. कृष्णा राव का। वे विचारों से चीन और वियतनाम समर्थक वामपंथी थे, लेकिन एक इंसान की तरह उनका जोड़ मिलना मुश्किल था। यह जानते हुए भी कि मैं बहुत पक्का जनसंघी हूँ, वे मुझसे राजनैतिक मामलों पर राय लिया करते थे। ज.ने.वि. में मेरी राजनैतिक गतिविधियाँ शुरू कराने का श्रेय उनको ही है। वे राजनीति के बहुत अच्छे जानकार थे और हर बात को राजनीति की तराजू पर तौलकर ही बोलते थे। मेरे एक अन्य मित्र श्री बी. राजेश्वर कहा करते थे कि इनसे सलाह मत लो, ये राजनीतिज्ञ हैं। श्री राव आजकल नेशनल इनफोर्मेटिक्स सेन्टर नई दिल्ली में प्रोग्रामर के पद पर हैं।
श्री बी. राजेश्वर भी श्री राव की तरह आंध्रप्रदेश के निवासी थे। पढ़ने-लिखने में कोई खास तेज नहीं, लेकिन दिमाग आला दर्जे का था। दुर्भाग्य से वे अपनी क्षमताओं का सदुपयोग नहीं करते थे। वे कई साल में एम.फिल. पूरी कर सके और अभी तक पीएच.डी. नहीं कर पाये हैं। लेकिन राजनीति में बहुत भाग लिया करते थे। उनकी विचारधारा मेरी विचारधारा से बहुत कम मिलती थी। लेकिन अपनी स्कूल की राजनीति में हम दोनों एक-दूसरे के कट्टर समर्थक और मित्र थे। वे बहुत ईमानदार थे और उनकी ईमानदारी की कद्र उनके कड़े दुश्मन भी किया करते थे। वे दूसरों की सहायता बहुत उदारता से किया करते थे। हम उन्हें मिनी बैंक, मिनी पोस्ट आफिस, मिनी सब्जी मंडी और मिनी पुस्तकालय कहा करते थे। सारे लोग उनकी इस उदारता का जायज-नाजायज फायदा उठाते थे। वे अभी भी ज.ने.वि. में ही पीएच.डी. कर रहे हैं।
उनके ही एक साथी थे श्री अशोक कुमार जो मेरे घनिष्टतम मित्र माने जाते थे। उनकी उम्र यद्यपि मुझसे लगभग 15 वर्ष ज्यादा थी, फिर भी हमारी बहुत अच्छी पटती थी। वे विवाहित थे और अपनी पत्नी के साथ विवाहितों के होस्टल में रहते थे। हमारे विद्यालय में सारे लोग प्रायः उनका मजाक बनाया करते थे, क्योंकि वे बहुत बड़बोले थे। लेकिन हम दोनों की मित्रता हमेशा कायम रही। हम दोनों ने सदा एक-दूसरे का साथ देने की कसम खाई थी, जिसे अन्त तक निभाया। वे सिर से गंजे होते जा रहे थे, अतः एक टोपी लगाया करते थे। इसलिए लोग उन्हें ‘टोपीवाला’ कहकर मजाक उड़ाते थे। यद्यपि अशोक कुमार कभी-कभी मूर्खतापूर्ण बातें कर जाते थे। लेकिन उनका ज्ञान सागर अथाह था, उन्होंने काफी दुनिया देखी थी। यह बात दूसरे लोग नहीं जानते थे, लेकिन मैं जानता था, क्योंकि हम दोनों घंटों बातें करते रहते थे। अगर किसी दिन अशोक कुमार मेरे कमरे में नहीं आते थे, तो मेरा भी मन नहीं लगता था। सौभाग्य से उनकी नौकरी एक अच्छी जगह लग गयी है, जिसकी उम्मीद लोग नहीं करते थे। वे आजकल भारत पेट्रोलियम में मुम्बई में एक अधिकारी हैं। उनका एक बहुत प्यारा-सा बच्चा बन्टी भी है।
(पादटीप- बहुत बाद में श्री अशोक कुमार चौधरी मुम्बई की नौकरी छोड़कर अपने गृहनगर मैनपुरी आ गये थे और शायद वकालत करने लगे थे। उनके साथ मेरा पत्र-व्यवहार भी काफी दिनों तक चला था, जो समय के साथ बन्द हो गया। वे एकबार सपरिवार हमारे घर आगरा भी आये थे। आजकल वे कहाँ हैं, पता नहीं।)
(पादटीप- बहुत बाद में श्री अशोक कुमार चौधरी मुम्बई की नौकरी छोड़कर अपने गृहनगर मैनपुरी आ गये थे और शायद वकालत करने लगे थे। उनके साथ मेरा पत्र-व्यवहार भी काफी दिनों तक चला था, जो समय के साथ बन्द हो गया। वे एकबार सपरिवार हमारे घर आगरा भी आये थे। आजकल वे कहाँ हैं, पता नहीं।)
श्री आदित्य चन्द्र झा, जिनका नाम ऊपर आया है, अपनी राजनैतिक और अराजनैतिक गतिविधियों के कारण काफी कुख्यात थे। इसका एक और प्रमुख कारण था कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विद्यार्थी परिषद के नेता थे। दूसरा कारण यह भी था कि उनकी कुछ गतिविधियाँ बहुत आलोचना प्राप्त करती थीं। जिन दिनों मैं जे.एन.यू. में दाखिल हुआ था, वे बहुत बदनाम हो गये थे, क्योंकि उस वर्ष हमारे विद्यालय में एम.फिल. के दाखिलों में घपला करने की कोशिश की गयी थी, जिसे बड़ी मुश्किल से रोका गया था। उस घपले में श्री झा तथा दो-तीन ऐसे प्रोफेसरों का नाम लिया गया था, जिन्हें संघ से सम्बन्धित बताया जाता था।
मेरे आने के बाद उनकी गतिविधियाँ कुछ कम हो गयी थी। संघी विचारधारा के होने के कारण मैं शीघ्र ही उनसे जुड़ गया था और मैंने यह पाया था कि उनके बारे में फैली हुई ज्यादातर बातों का कोई सिर-पैर नहीं था और कई मामलों में बात का बतंगड़ बनाया गया था। उस वर्ष वे हमारे विद्यालय से पार्षद पद के लिए खड़े हुए थे और मैंने उनका प्रत्यक्ष समर्थन किया था, जिसके कारण वे केवल तीन वोटों के बहुमत से जीत गये थे। बाद में कुछ ऐसी घटनायें घटीं, जिनके कारण हमारे सम्बन्धों में कुछ तनाव आ गया था, लेकिन कुल मिलाकर हम अच्छे दोस्त बने रहे। आजकल श्री झा राजनैतिक गतिविधियों से मुक्त रहकर इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज, लखनऊ में श्री वी.एस.पी. श्रीवास्तव के साथ ही आफिसर हैं तथा शादी भी कर चुके हैं।
(पादटीप- बाद में मुझे पता चला था कि श्री झा ने नेपाल में एक इंजीनियरिंग कालेज खोला था, जो काफी सफल रहा और वे करोड़पति भी बन गये थे। आजकल वे कहाँ हैं, पता नहीं।)
(पादटीप- बाद में मुझे पता चला था कि श्री झा ने नेपाल में एक इंजीनियरिंग कालेज खोला था, जो काफी सफल रहा और वे करोड़पति भी बन गये थे। आजकल वे कहाँ हैं, पता नहीं।)
इनके अतिरिक्त सरदार जितेन्द्र पाल सिंह, श्री बैजनाथ, श्री बलवीर चन्द्र कैले आदि मेरे कई अन्य सीनियर मित्र थे। बाद में मेरे कुछ जूनियर मित्र भी बने। जिनमें प्रमुख नाम है श्री राम नरेश सिंह का। आप बिहार के रहने वाले थे और पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छे न होने के बाबजूद काफी मेहनती थे। अपनी मेहनत के बल पर ही वे आजकल सी-डाॅट नामक अर्ध-सरकारी कम्पनी में इतने अच्छे पद पर हैं, जिसे हमारे विद्यालय का कोई दूसरा व्यक्ति अभी तक प्राप्त नहीं कर सका है। उन्होंने नौकरी करते हुए ही पीएच.डी. भी पूरी कर ली थी। वे मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं और मेरा बहुत आदर करते हैं। मैं जब भी कभी दिल्ली जाता हूँ, तो अधिकतर उनके पास ही ठहरता हूँ। वे मेरे भविष्य में बहुत रुचि लेते हैं। राम नरेश सिंह जैसा मित्र पाना वास्तव में बहुत सौभाग्य की बात है और मैं स्वयं को इस मामले में भाग्यशाली मानता हूँ।
(पादटीप- डाॅ राम नरेश सिंह बाद में अमेरिका चले गये थे और तभी से मेरा सम्पर्क उनसे कट गया। वर्तमान में वे कहाँ हैं, पता नहीं चल सका।)
(पादटीप- डाॅ राम नरेश सिंह बाद में अमेरिका चले गये थे और तभी से मेरा सम्पर्क उनसे कट गया। वर्तमान में वे कहाँ हैं, पता नहीं चल सका।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें