आत्मकथा भाग-1 अंश-45

सोमवार को मेरे नाम एक कमरा एलाट हुआ। मेरे दुर्भाग्य से उस समय उस कमरे में एक सज्जन अपनी प्रेमिका के साथ रहते थे। उनका विचार किसी तीसरे को उस कमरे में टिकाकर अपने ‘कार्य’ में व्यवधान डलवाने का नहीं था। अतः मैंने होस्टल के वार्डन से फिर प्रार्थना की कि मुझे कोई दूसरा कमरा दे दिया जाय। आखिर दो दिन बाद मुझे दूसरा कमरा मिला। तब तक मैं बहुत परेशान हो गया था, क्योंकि मेरे खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं था। मैं सुबह नवीन बंसल के पास से निकलता और दिन भर विश्वविद्यालय में भटकने के बाद रात को उसके कमरे में आकर सो जाता था। पूरा दिन मैं कैन्टीन में चाय समोसा या बिस्कुट खाकर गुजार देता था। एक दिन मुझे भूखा भी रहना पड़ा, क्योंकि वहाँ मेरी जानकारी में कोई होटल नहीं था और बिस्कुट-समोसे खाते-खाते मैं ऊब गया था।
दूसरा कमरा मिल जाने के बाद मैं उसमें गया। मैं अपना सामान नवीन बंसल के पास से ले आया और बिस्तर भी कैन्टीन से लाकर होस्टल में रखा। उसी दिन दोपहर को मैंने होस्टल की मैस में दाखिला लिया और तब कई दिन बाद मैंने पेट भरकर खाना खाया। उस दिन तक मैं इतना परेशान हो गया था कि मैंने तय कर लिया था कि अगर आज कमरा नहीं मिला, तो मैं सब कुछ छोड़-छाड़कर आगरा चला जाऊँगा और मम्मी की गोद में जाकर सो जाऊँगा।
सौभाग्य से इसकी नौबत नहीं आयी। उसी दिन शाम को मैंने पहली बार घर को पत्र लिखा। अपनी एक दिन भूखा रहने की बात मैं छिपा गया, क्योंकि मैं जानता था कि मम्मी यह जानकर बेकार में रोयेगी। मैं कक्षाओं में जाने लगा था और पढ़ने में ध्यान लगाने की कोशिश करता था। लेकिन विश्वविद्यालय का वातावरण मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं आ रहा था। वहाँ के लड़के-लड़कियाँ घंटों तक हाथ में हाथ डाले घूमते रहते थे तथा पेड़ों के नीचे अंधेरे कोनों में गुफ्तगू किया करते थे। यह मेरे लिए एक बिल्कुल नई बात थी। मैं भारतीय संस्कृति का हिमायती था और हूँ। मैं लड़के-लड़कियों की स्वस्थ मित्रता का समर्थक रहा हूँ। लेकिन मर्यादा उल्लंघन को मै अक्षम्य अपराध मानता हूँ। अतः मेरे संस्कार उस विश्वविद्यालय के वातावरण को स्वीकार करने की अनुमति नहीं देते थे।
प्रारम्भ में मैं सबसे कटा-कटा रहा। सौभाग्य से वहाँ मेरे कमरे का साथी तथा कुछ पड़ोसी बहुत सहयोगशील थे। धीरे-धीरे मेरा स्वभाव खुला। पहले मैं डरा करता था कि आगरा के होस्टलों की तरह यहाँ भी रैगिंग होती होगी, लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कम से कम इस बुराई से पूरी तरह मुक्त था। वहाँ का राजनैतिक वातावरण मेरे अनुकूल था। मेरा दावा है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसा लोकतांत्रिक वातावरण कम से कम भारत के किसी अन्य विश्वविद्यालय में नहीं होगा। शीघ्र ही सैकड़ों लोग मेरे मित्र बन गये थे- उनमें संघ वाले भी थे, कांग्रेसी भी, समाजवादी भी और कम्यूनिस्ट भी। हिन्दू तो थे ही, मुस्लिम तथा सिक्ख भी कई थे। एक दो ईसाई और वनवासी भी मेरे मित्रों में थे। मेरी राजनैतिक चेतना और बुद्धिजीवियों जैसे व्यक्तित्व का लोगों पर काफी प्रभाव पड़ता था। मेरा छोटा कद और बच्चों जैसा चेहरा देखकर वे समझते थे कि मैं इण्टर करने के बाद किसी भाषा में एम.ए. करने आया हूँ। लेकिन जब उन्हें पता चलता था कि मैं सांख्यिकी में स्नातकोत्तर कर चुका हूँ और अब कम्प्यूटर साइंस में शोध कर रहा हूँ, तो उनकी नजरों में मेरा सम्मान बहुत बढ़ जाता था।
एक दिन ऐसा भी आया कि उस विश्वविद्यालय में जहाँ मैं एक दिन अकेला गया था, मैं काफी प्रसिद्ध हो गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आधारित अपनी विचारधारा और अपने धर्मनिरपेक्ष आचरण के कारण मैं अपनी विचारधारा के विरोधियों में भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपने प्रथम वर्ष में मैं प्रायः पढ़ाई की तरफ ही ध्यान देता रहा। यद्यपि मैं विश्वविद्यालय की राजनीति में पूर्ण दिलचस्पी लेता था, लेकिन सक्रिय भाग नहीं लेता था। उस वर्ष विश्वविद्यालय छात्रसंघ के जो चुनाव हुए उसमें मैं एक दर्शक की तरह दिलचस्पी लेता रहा। अपने स्कूल के पार्षद की सीट पर मैंने संघ के समर्थक और अपने मित्र श्री आदित्य चन्द्र झा का गुप्त समर्थन किया और वे मामूली बहुमत से जीत भी गये।
हमारी कक्षा में 15 लड़कों को प्रवेश दिया गया था। कोई लड़की प्रवेश पाने में सफल न हो पायी थी। उन पन्द्रह में से कई प्रायः गायब रहते थे, केवल 9 या 10 लोग ही नियमित कक्षाओं में जाया करते थे। इनमें से मुझे छोड़कर बाकी सब ज.ने.वि. के राजनैतिक वातावरण के मात्र मूकदर्शक रहते थे। जबकि मैं पढ़ाई की तरफ पूरा ध्यान देते हुए भी राजनैतिक गतिविधियों में भी यदा-कदा भाग लेता था। हमारी कक्षा में एक-दो को छोड़कर सभी पढ़ने में काफी तेज थे। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि हम सब अखिल भारतीय स्तर की प्रतियोगिता में उत्तीर्ण होकर ही प्रवेश पा सके थे। कक्षा में सबसे आगे रहते थे श्री पूर्णेन्दु नारायण, जिन्हें मैं सुविधा के लिए ‘पूरन’ कहा करता था। वे पढ़ने में काफी तेज थे और प्रायः हर समय किताबों में ही सिर घुसाये रहते थे। अन्य गतिविधियों से प्रायः अलग ही रहते थे। हमारी कक्षा में केवल वे ही शादीशुदा थे। प्रारम्भ में हम दोनों में बहुत मधुर सम्बन्ध थे। लेकिन कुछ माह बाद अचानक हमारे बीच तनाव आ गया। एक साल की पढ़ाई करके ही वे ओ.आर.जी. कम्पनी में नौकरी पर चले गये थे। और जहाँँ तक मेरी जानकारी है अभी तक उनकी एम.फिल. पूरी नहीं हुई। आजकल वे देहली क्लाथ मिल (डी.सी.एम.) में किसी अच्छे पद पर हैं।
कक्षा में दूसरा नम्बर था श्री ओ. वेणु गोपाल कृष्णा का, जिन्हें सब लोग ओ.वी.जी. कहा करते थे। वे आन्ध्र प्रदेश के रहने वाले थे और काफी तेज थे। उनका स्वभाव बहुत अच्छा था। लेकिन कभी-कभी वे बहुत गुस्सा हो जाते थे। वे मेरे होस्टल में मेरे सामने के कमरे में ही रहते थे। हमारे सम्बन्धों में उतार चढ़ाव आता रहता था। लेकिन कुल मिलाकर हम बहुत अच्छे दोस्त थे। उनका शौक था चित्र बनाना। वे बहुत उच्चकोटि के चित्र बनाते थे। आजकल आप पटनी कम्प्यूटर्स बम्बई में एक अच्छे पद पर हैं।
कक्षा में इनके बाद नम्बर आता था श्री जितेन्द्र प्रसाद सिंह का। पूर्णेन्दु की तरह वे भी बिहार के रहने वाले थे। इनका दिमाग बहुत तेज था, लेकिन पढ़ने में प्रायः लापरवाही भी किया करते थे। हम दोनों में बहुत मीठी-मीठी झड़पें हुआ करती थीं। वे प्रायः मेरा गाल चूम लेते थे। आजकल ये भी ओ.आर.जी. बड़ौदा में हैं। इनकी एम.फिल भी शायद अभी पूरी नहीं हुई है।
कक्षा में चौथा नाम मेरा था और पाँचवें सज्जन थे श्री हवा सिंह। आप हरियाणवी युवकों के एक उदाहरण थे। व्यवहार में काफी तेज, कुछ चालाक भी, स्वास्थ्य बहुत अच्छा और लगभग हर बात में हरियाणवीपन। लेकिन आम जाटों के विपरीत इनका ज्ञान और बुद्धि बहुत ऊँचे दर्जे की थी। कक्षा में कई विषयों में पीछे रहते थे, लेकिन अन्त में वे मेरे बाद दूसरे नम्बर पर आ गये थे। पहले वे भोपाल विश्वविद्यालय के एक संस्थान में लैक्चरर बने और अब शायद अमरीका पी.एच.डी. करने चले गये हैं। हम दोनों में घंटों तक बातें होती रहती थीं और लम्बी-लम्बी बहसें हुआ करती थीं, जिनमें हार जीत का फैसला कभी नहीं होता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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