आत्मकथा भाग-1 अंश-44

जिस समय हम कम्प्यूटर साइंस के स्कूल पर पहुँचे थे, उस समय केवल 7ः30 बजे हुए थे और टेस्ट शुरू होने में काफी देर थी। हमने कुछ खाया-पीया भी नहीं था। अतः हम पास में ही किसी कैन्टीन की तलाश करने लगे। वहीं एक अच्छी कैन्टीन मिल भी गयी, जो उसी इमारत में थी। वहाँ हमने चाय पी और दो-दो समोसे भी खाये।
ठीक 9ः00 बजे हमारा टेस्ट शुरू हुआ। मेरे अलावा और भी सैकड़ों लोग टेस्ट देने आये थे और मैं अब कुछ घबड़ाने लगा था, क्योंकि सीटों की संख्या केवल 15 थी। फिर भी मैंने टेस्ट दिया। टेस्ट मेरी उम्मीद के अनुसार ही था- न ज्यादा सरल और न बहुत कठिन। मैंने ज्यादातर प्रश्नों के उत्तर लिख दिये और संतुष्ट होकर बाहर आ गया। अब मुझे इन्टरव्यू देना था। दोनों के परिणाम पर ही प्रवेश मिलना निर्भर था। लेकिन उस दिन जिन लोगों के इन्टरव्यू होने थे उस सूची में मेरा नाम नहीं था, क्योंकि वे लोग बहुत दूर-दूर से आये थे और मैं केवल आगरा से। उन्होंने बताया कि मेरा इन्टरव्यू कल लिया जायेगा।
तब हम दोनों अर्थात् मैं और डा. भाईसाहब वहाँ से चले। पहले हमने एक रेस्ट्रां में खाना खाया। फिर वे मेडिकल कालेज के पुस्तकालय में अपने मतलब की पुस्तकें खोजने लगे। मैं काफी थका हुआ था, अतः वहीं एक कुर्सी पर बैठा-बैठा मेज पर सिर टिकाकर सो गया। भाईसाहब का काम पूरा होने पर मुझे जगना पड़ा। अब हमें कहीं रात को ठहरने का इन्तजाम करना था। पहले हम नई सड़क गये, जहाँ भाई साहब ने कुछ किताबों के बारे में पूछताछ की और कुछ खरीदीं भी। तब हमने वहाँ के आस-पास धर्मशालाओं की खोज की। एक धर्मशाला मिली, लेकिन उन्होंने बताया कि कोई कमरा खाली नहीं है। वहीं से हमारे साथ एक होटल का एजेन्ट लग गया। उसने कहा कि मैं केवल 20 रुपये में अच्छा कमरा दिलवा दूंगा।
हमें होटलों में ठहरने का कोई अनुभव नहीं था और दिल्ली के लिए भी हम नये थे, इसलिए हम झिझक रहे थे। फिर भी हमने सोचा कि देख लेने में कोई हर्ज नहीं है। अतः हम उसके साथ चल पड़े। जाने किन-किन बाजारों और गलियों से होकर वह हमें एक होटल में ले गया और वहाँ एक कोठरी दिखायी। कोठरी हमें पसन्द नहीं आयी। अतः हम वापस लौटने लगे, तब वह आदमी काफी बड़बड़ाया और उल्टा-सीधा बकने लगा। हमने वहाँ उसे झिड़क तो दिया, लेकिन कुछ डर भी रहे थे, इसलिए तुरन्त बाहर आ गये। हमारे पीछे-पीछे वह भी बाहर आया। सड़क पर उसने फिर हमारा मजाक बनाया, तो मुझे गुस्सा आ गया। मैंने उसे खूब गालियाँ दी और जूतों से पिटाई करने की धमकी दी, तो वह चुपचाप खिसक गया।
होटल में कटु अनुभव होने पर हमने होटलों में ठहरने का इरादा छोड़ दिया और रेलवे स्टेशन पर ठहरने का विचार बनाया। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पास में ही था। हमने पहले उसके बाहर एक सस्ते से होटल में खाना खाया, फिर स्टेशन के प्रतीक्षालय में जाकर सोने के स्थान की तलाश की। सौभाग्य से हमें एक बेंच खाली मिल गयी। वहाँ कुछ लोग और भी बैठे हुए थे। कुछ देर बाद दूसरे लोग उठ गये, तो हमने दो व्यक्तियों के सोने लायक स्थान निकाल लिया। वहीं हमने वह रात बारी-बारी से सोते हुए गुजारी।
दूसरे दिन प्रातःकाल हमने नहाने के लिए बाथरूम की खोज की। वहाँ कई बाथरूम थे, लेकिन बाहर एक जमादार बैठा हुआ था। यद्यपि वहाँ साफ-साफ लिखा हुआ था कि जमादार को पैसा न दें। लेकिन वह बिना पैसे लिये न तो किसी को शौच करने देता था और न नहाने देता था। लिहाजा हमने उसे 25-25 पैसे दिये और नहाने की आज्ञा ली।
तैयार होकर हम फिर विश्वविद्यालय आये और इन्टरव्यू के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे। सौभाग्य से मेरी बारी जल्दी ही आ गयी। मैंने इन्टरव्यू की व्यवस्था करने वाले क्लर्क को बाहर ही बता दिया था कि मैं सुनने में असमर्थ हूँ, अतः मेरी बारी आने पर उसने इन्टरव्यू बोर्ड को इसकी सूचना दे दी थी। मैंने भी अंग्रेजी में निवेदन किया कि मैं सुनने में असमर्थ हूँ, अतः कृपया अपने प्रश्न लिखकर पूछें। शीघ्र ही मेरे पास कई प्रश्न पर्चियों पर लिखे हुए आ गये। मैंने अपनी जानकारी के अनुसार एक-एक करके सभी प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर दे दिये। तब उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया और मैं बाहर आ गया। आगरा लौटकर मैं वहाँ से एडमीशन की सूचना प्राप्त होने का इन्तजार करने लगा।
उस समय शहनाज से मेरा पत्र व्यवहार बहुत अच्छी तरह चल रहा था। सबसे पहले मैंने उसी को सूचना दी थी कि मैं दिल्ली में एडमीशन के लिए टेस्ट देकर आया हूँ। जब काफी दिन तक जबाब न आया, तो मैं चिन्तित होने लगा। मैंने शहनाज को अपनी चिन्ता के बारे में लिखा। उसका जबाब आया कि वह मेरे एडमीशन के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही है और मुझे एडमीशन जरूर मिलेगा। आखिर एक दिन उसकी भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई और मुझे एडमीशन होने की सूचना तार द्वारा प्राप्त हुई। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। सबसे पहले मैंने शहनाज को ही एडमीशन मिलने की सूचना पत्र द्वारा दी।
निश्चित तिथि को मैं एक बार फिर डा. भाईसाहब के साथ दिल्ली गया। दाखिले की औपचारिकतायें पूरी होने में ज्यादा समय नहीं लगा, लेकिन चिन्ता मुझे होस्टल मिलने की थी। पता चला कि एक-दो दिन में होस्टल मिलेगा। तब तक मुझे कहीं अपने ठहरने का इन्तजाम करना था। मैं अपने साथ बिस्तर भी लाया था, जिसे हमने एक कैन्टीन में रख दिया, यह कहकर कि जल्दी ही ले जायेंगे। उस दिन शुक्रवार था, होस्टल अगले दिन मिलने की उम्मीद थी। रात को कहीं न कहीं ठहरना आवश्यक था।
संयोग से आगरा के समाज विज्ञान संस्थान, जहाँ से मैंने एम.स्टेट. किया था, के एक भूतपूर्व छात्र श्री नवीन बंसल, जो मुझसे एक साल पीछे थे, उस समय दिल्ली में ही भारतीय सांख्यिकी संस्थान में पढ़ रहे थे। यह बात मुझे ज्ञात थी। वह संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पास में ही था। मैंने उनके पास ही ठहरने का विचार बनाया। सौभाग्य से नवीन बंसल हमें मिल गये और हमारे ठहरने का इन्तजाम करने को भी खुशी से तैयार हो गये। लेकिन डा. भाईसाहब का वहाँ ठहरना आवश्यक नहीं था तथा वह असुविधाजनक भी होता, अतः वे उसी दिन आगरा वापस चले गये।
अब मैं दिल्ली में बिल्कुल अकेला था। यों नवीन बंसल मेरी सहायता करने को तैयार थे, लेकिन मैं सहायता के लिए किसी के आगे हाथ फैलाना पसन्द नहीं करता था, अतः मैंने अपने बल पर ही होस्टल लेने की ठानी। होस्टल लेने वालों की सूची काफी लम्बी थी, इसलिए भीड़भाड़ भी बहुत थी। बहुत से लोगों ने किसी न किसी होस्टल में अपने-अपने दोस्तों के यहाँ अड्डा जमा लिया था और प्रायः निश्चिन्त थे। लेकिन मेरा नवीन बंसल को छोड़कर पूरी दिल्ली में कोई मित्र या रिश्तेदार नहीं था। उस समय कुलवन्त सिंह गुरु मेरे एक साधारण पत्र-मित्र थे, जो दिल्ली में अकेले रहते थे। लेकिन मैं उनके पास इसलिए नहीं जाना चाहता था कि वे मुझे स्वार्थी न समझ लें। दूसरी ओर नवीन बंसल के पास भी ज्यादा दिनों तक रहना संभव नहीं था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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