आत्मकथा भाग-1 अंश-43

आगरा पहुँचकर सबसे पहले मैं लहरी साहब के पास गया और उनसे प्रशंसा पत्र लिखने का निवेदन किया। वे तुरन्त तैयार हो गये, लेकिन उन्होंने यह सलाह भी दी कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में यह कोर्स अच्छा नहीं है। इसलिए मुझे टी.आई.एफ.आर. या किसी आई.आई.टी. में प्रवेश लेना चाहिए। लेकिन मैं उस मौके को छोड़ना नहीं चाहता था। अतः उन्होंने प्रशंसा पत्र लिख दिया। पहले वे टाइप कराना चाहते थे, लेकिन मैंने कहा कि टाइप कराने की सुविधा मेरे पास नहीं है तथा उसमें समय भी लग सकता है, तो उन्होंने अपने हाथ से ही एक लेटर हेड पर प्रशंसा पत्र लिख दिया।
दूसरे प्रशंसा पत्र के लिए मैं डा. बी.एम. सिंह के पास गया, जो लहरी साहब के घर के पास ही रहते थे। उन्हें जब मैंने बताया कि मैं एम.फिल. कम्प्यूटर साइंस में प्रवेश लेना चाहता हूँ, तो वे बहुत खुश हुए। जब मैंने उनसे प्रशंसा पत्र लिखने के लिए कहा, तो वे बोले कि मैं कम्प्यूटरों के बारे में कुछ नहीं जानता, दूसरे यदि मैं सेठी साहब से प्रशंसा पत्र लूँ, तो उसका ज्यादा महत्व होगा। तब उन्होंने संकेत से पूछा कि क्या लहरी साहब ने प्रशंसा पत्र दे दिया है, तो मैंने कहा- ‘हाँ’, तब उन्होंने कहा- ठीक है, दूसरा प्रशंसा पत्र सेठी साहब से ले लो।
मैंने उन्हें अपनी कठिनाई बतायी कि मैंने न तो सेठी साहब का घर देखा है और न उनका नम्बर जानता हूँ, तो उन्होंने कहा कि नम्बर की आवश्यकता नहीं है। तब उन्होंने एक कागज पर सेठी साहब के घर का रास्ता समझाया और तुरन्त वहाँ जाने की सलाह दी।
मैं कुछ निराश अवश्य हुआ लेकिन फिर सोचा कि सेठी साहब से प्रशंसा पत्र तो मिल ही जायेगा। इस बहाने उनका घर भी देख लूँगा। अतः मैं सीधा उनके घर गया। उस समय वे दाढ़ी बना रहे थे। मुझे कुछ देर बाहर खड़े रहना पड़ा। लेकिन दाढ़ी बनाना समाप्त होते ही उन्होंने मुझे बुला लिया। फिर मेरे आने का कारण पूछा। मैंने अपनी आवश्यकता बतायी, तो वे बहुत खुश हुए और तुरन्त प्रशंसा पत्र लिखने को तैयार हो गये। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं इन्स्टीट्यूट जाकर प्रशंसा पत्र टाइप कराकर ला सकता हूँ? मैंने कहा कि ला तो सकता था, लेकिन अब समय नहीं है, क्योंकि फार्म मुझे आज ही डाक में डाल देना है, अन्यथा देर भी हो सकती है।
तब मुझे उनकी महानता का एक और रूप देखने को मिला। उन्होंने एक सादा कागज पर अपने हाथ से प्रशंसा पत्र लिखा और फिर एक छोटा सा टाइपराइटर निकालकर अपने लेटर हेड पर प्रशंसा पत्र टाइप करना शुरू किया। उन्हें टाइप करने का बिल्कुल अभ्यास नहीं था, इसलिए वे अपनी तर्जनी उंगलियों से ही एक-एक कुंजी दबाकर टाइप कर रहे थे। मैं उनके सामने ही बैठा था। आश्चर्य कि उस सारे टाइप में उनसे केवल एक गलती हुई। तुरन्त उन्होंने अपने हस्ताक्षर किये और प्रशंसा पत्र मुझे दे दिया। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। प्रशंसा पत्रों के मिलने की खुशी तो थी ही उससे ज्यादा खुशी इस बात की थी कि सेठी साहब ने मेरे लिए इतनी मेहनत की। बदले में मैं उन्हें औपचारिक धन्यवाद ही दे सका था। लेकिन वह उनकी उदारता और महानता की तुलना में बहुत तुच्छ था।
उसी दिन मैंने अपना फार्म भेज दिया और बुलावे की प्रतीक्षा करने लगा। भाई साहब ने मुझे तब तक कुछ तैयारी कर लेने के लिए कहा, लेकिन उस दिन तक न तो मैंने किसी परीक्षा की गंभीरता से तैयारी की थी और न मैं कर सकता था। मैंने तो साल भर जो भी पढ़ समझ लेता था उसी को वार्षिक परीक्षा की तैयारी मानता था। दूसरा कारण यह भी था कि मुझे यह पता नहीं था कि टेस्ट आदि किस प्रकार के होंगे। बिना यह जाने किसी तैयारी का कोई अर्थ नहीं था। अतः मैं सब कुछ अपने ज्ञान और बुद्धि के ऊपर छोड़कर निश्चिन्त हो गया।
शीघ्र ही वहाँ से टेस्ट तथा इन्टरव्यू का बुलावा आ गया। तारीख दो-चार दिन बाद की ही थी अतः हमने जाने का प्रोग्राम तय कर लिया। बुलावे के पत्र में इस बात का कोई उल्लेख नहीं था कि रेलवे स्टेशन से जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तक पहुंचने का क्या तरीका है। अतः दिल्ली के जानकार कुछ लोगों से डा. भाईसाहब ने पूछकर पता लगा लिया कि नई दिल्ली स्टेशन से पहले प्लाजा (कनाट प्लेस) तांगे पर जाना है, फिर वहाँ से 615 नम्बर की सिटी बस मिलेगी, जो सीधी विश्वविद्यालय तक जायेगी। उस समय तक मैं दिल्ली जा तो चुका था, लेकिन बड़े भाई साहब के साथ ही गया था। कभी अकेला नहीं गया था। इसलिए इस टेस्ट के लिए भी अकेले जाने का सवाल नहीं था। अन्ततः डा. भाईसाहब के साथ जाना तय हुआ। उनका साथ मुझे पसन्द भी था।
लिखित परीक्षा का समय प्रातः 9ः00 बजे था अतः ऐसी किसी गाड़ी से जाना खतरनाक था, जो वहाँ 7-8 बजे पहुंचती थीं, क्योंकि गाड़ियां प्रायः लेट हो जाती थीं। अतः हमने यही तय किया कि हम पठानकोट एक्सप्रेस से जायेंगे। जो प्रातः सवा दो बजे आगरा से छूटती थी और दिल्ली प्रातः 5ः00 बजे पहुंचा देती थी। हमने सोचा कि यदि घंटे-दो घंटे लेट भी हो गयी, तो कोई चिन्ता नहीं।
निश्चित दिन हम राजामंडी स्टेशन से पठानकोट एक्सप्रेस में बैठ गये और मेरे सौभाग्य से उस दिन गाड़ी ज्यादा लेट नहीं हुई और हम प्रातः 6ः00 नई दिल्ली स्टेशन पर उतर गये। अब हमें विश्वविद्यालय पहुंचने की जल्दी थी, क्योंकि हमें यह अंदाजा नहीं था कि वहाँ से विश्वविद्यालय तक पहुंचने में कितना समय लगेगा। हम जल्दी-से-जल्दी वहाँ पहुंचकर निश्चिन्त हो जाना चाहते थे। तुरन्त ही हम ताँगे में बैठकर प्लाजा स्टाप तक आये, उन दिनों उस सड़क पर ताँगे ही चला करते थे। संयोग से उस समय वहाँ 615 नम्बर की बस तैयार खड़ी थी। फौरन हम उसमें चढ़ गये और विश्वविद्यालय तक पहुंचने का इन्तजार करने लगे। मैं आंखें फाड़-फाड़कर दिल्ली का नजारा देख रहा था और रास्तों को पहचानने की कोशिश कर रहा था। लेकिन अपने तमाम प्रयत्नों के बाबजूद मैं केवल इंडिया गेट को ही दूर से पहचान पाया। करीब घंटे भर बस में चलते रहने के बाद मुझे एक जगह ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ लिखा हुआ नजर आया। लेकिन तब तक उसका स्टाप निकल गया था, अतः हम उससे अगले स्टाप पर ही उतर सके।
वहाँ से हम लौटकर पैदल विश्वविद्यालय के स्टाॅप पर आये और वहाँ खड़े हुए लोगों से कम्प्यूटर साइंस के स्कूल का ठिकाना पूछा। उनसे ज्ञात हुआ कि वह यहां से बहुत दूर है और बस से जाना पड़ेगा। तब हमने बस का इंतजार किया और उसके आने पर चैन की साँस ली। वह बस न जाने किन-किन पहाड़ों के बीच से गुजरती हुई हमारी मंजिल की ओर चली। मुझे बरबस यह शेर याद आ रहा था-
चलने को चल रहा हूँ पर इसकी खबर नहीं।
कि मैं हूँ सफर में या मेरी मंजिल सफर में है।।
राम-राम करके हम उस स्टाप पर उतरे जो कि कम्प्यूटर साइंस स्कूल का स्टाप बताया जा रहा था। स्टाप से हम दूसरे लोगों के साथ आगे बढ़े, तो बगल में ही एक सुन्दर इमारत पर मुझे ‘स्कूल ऑफ कम्प्यूटर एंड सिस्टम्स साइंसेज’ शब्द लिखे हुए नजर आये। आखिर हम अपनी मंजिल पर आ पहुंचे थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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