आत्मकथा भाग-1 अंश-41

मेरे एक तमिल मित्र भी रहे हैं- थाना शेखर। यों उसका सही नाम है- ‘धाना शेखर’, जिसका अर्थ होता है- धन एकत्र करने वाला अर्थात् कुबेर। तमिल में भी यही लिखा जाता है, लेकिन उसके प्राइमरी अध्यापकों के अधकचरे अंग्रेजी ज्ञान ने उनका नाम बिगाड़कर थानाशेखर कर दिया था। इसका एक कारण यह भी है कि तमिल में त, थ, द और ध सबके लिए एक ही अक्षर होता है, जिसका उच्चारण शब्द के अनुसार अलग-अलग किया जाता है, लेकिन अंग्रेजी में 'Th' लिखा जाता है। इसलिए ‘धाना’ को 'Thana' लिखा गया। उसका उच्चारण अंग्रेजी में ‘थाना’ किया जाता था। यही नाम अब उसका पेटेन्ट बन चुका है।
आप तमिल युवकों के आदर्श प्रतिनिधि हो सकते हैं। एकदम काला रंग, बाहर निकले दाँत, फूले हुए नथुने, कद कुछ ठिगना और माथे पर लाल सिन्दूरी लकीर। यानी कोई भी उसे देखकर बिना सोचे बता सकता था कि यह तमिल है। उसका रूप-रंग तमिलों का ऐसा औसत है कि एक बार जब मैं मद्रास गया था तो वहाँ के सारे लोग मुझे थानाशेखर ही नजर आ रहे थे। कह नहीं सकता कि यह मेरी नजर का चक्कर था या दिमाग का।
थानाशेखर मेरा एम.स्टेट. का सहपाठी था। प्रारम्भ में आम उत्तर भारतीय युवकों की तरह मैं भी हर दक्षिण भारतीय युवक को खास तौर पर तमिलों को हिन्दी विरोधी मानता था। लेकिन उसके सम्पर्क में आने पर मुझे उल्टा ही महसूस हुआ। उसका अंग्रेजी ज्ञान औसत उत्तर भारतीय छात्रों जैसा ही था। लेकिन हिन्दी सीखने की लगन उसमें ऐसी थी कि दो-चार महीने में ही वह न केवल साफ हिन्दी बोलने लगा था, बल्कि कभी-कभी हिन्दी अखबारों के शीर्षक भी पढ़ लेता था। हिन्दी फिल्में समझना तो सबसे लिए आसान होता ही है।
प्रारम्भ में हम दोनों में उतनी घनिष्टता नहीं थी। इसका कारण मेरे अपने पूर्वाग्रह ही थे। वह पढ़ने में औसत दर्जे का ही था और पहले सेमिस्टर में दो कोर्सों में उत्तीर्ण हो जाने के बाद भी दूसरे सेमिस्टर के तीनों कोर्सों में फेल हो गया था, जिसका मुझे काफी दुःख हुआ था। वह तीन साल में एम.स्टेट. कर सका था और तब तक मैं दिल्ली में पढ़ने लगा था।
उसमें एक खराब बात यह थी (और है) कि वह बहुत आलसी था। जब भी उसका मूड ऑफ होता था (जो कि ज्यादातर ऑफ ही रहता था), तो वह खाट पर पड़ जाता था। अपने आलसीपन का परिणाम उसे भोगना भी पड़ा। लेकिन वह इतना मेहनती भी था कि दबाब पड़ने पर दिन-रात काम में जुटा रह सकता था। मुझे याद है कि एक बार वह बहुत गंभीरता से बैंक में क्लर्क बनने के लिए एक परीक्षा की तैयारी कर रहा था। यह उन दिनों की बात है, जब उसका एम.स्टेट. पूरा भी नहीं हुआ था। कहावत है कि परिश्रम कभी निष्फल नहीं जाता। अतः उसका चयन पंजाब नेशनल बैंक में हो गया।
एम.स्टेट. पूरा होते न होते उसकी नियुक्ति (पोस्टिंग) भी हो गयी, जो अलीगढ़ शहर में हुई। अलीगढ़ आगरा से कोई ज्यादा दूर नहीं है। कभी-कभी दिल्ली आते-जाते समय मैं अलीगढ़ होकर आता-जाता था और उससे मुलाकात करता था। हम दोनों की बहुत अच्छी पटती थी। हम दोनों ही काफी हँसमुख हैं। प्रायः एक दूसरे को नये-नये चुटकले सुनाकर एक दूसरे का मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन किया करते थे। एक-दो बार हमने साथ-साथ फिल्में भी देखीं।
वह कई साल अलीगढ़ में रहा। जब तक वह अलीगढ़ में था, हमारा नियमित पत्र व्यवहार होता था, फिर उसने कोशिश करके अपना स्थानान्तरण अपने ही प्रान्त के एक जिले कोयम्बटूर में करा लिया और आजकल वहीं पर है। उसके पत्र आते रहते हैं। लेकिन दो साल से मैंने उसे देखा नहीं है। मुझे उसकी बहुत याद आती है। पता नहीं हम दोनों का मिलना अब कब हो पायेगा।
(पादटीप- श्री थानाशेखर अब बैंक सेवा से अवकाशप्राप्त कर चुके हैं और अपने गाँव में रहते हैं। मेरा उनसे सम्पर्क बना हुआ है।)
मेरे बहुत से मित्र आन्ध्र प्रदेश के निवासी रहे हैं, जिनमें से कई बहुत घनिष्ट भी हुए। ज्यादातर दिल्ली में ही बने थे। उनका जिक्र अगले अध्याय में करूँगा। दिल्ली जाने से पहले मेरे जो आन्ध्र प्रदेश के दो मित्र बने, उनमें से एक एल.यू. विजय कुमार का उल्लेख पहले कर चुका हूँं। यहाँ एक और घनिष्ट मित्र की चर्चा करूँगा। वे हैं- शिवराम कृष्णैया, जिसे वह तेलुगू के प्रभाव में ‘सिवारामा’ लिखता है, लेकिन मैं उसे शुद्ध रूप में ‘शिवराम’ कहा करता हूँं।
मेरे सम्पर्क में आये हुए आंध्र प्रदेश के ज्यादातर लड़के और चाहे कुछ न हों, प्रतिभाशाली अवश्य हैं। उनमें भी शिवराम कृष्णैया असाधारण रूप से प्रतिभाशाली है। कई विषयों में उसका ज्ञान विस्तृत है। इससे भी अधिक है उसकी ज्ञान प्राप्त करने की लालसा। कई बार उसकी इस लालसा से ही मैंने उसे अपने ज्ञान भंडार में बहुमूल्य मोतियों को जोड़े जाते देखा है।
आजकल वह वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सी.एस.आई.आर.) में एक अच्छे पद पर है। अल्प समय में ही उसने कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की कई भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया है और केवल अपने कठिन परिश्रम के कारण ही वह अपने विभाग में अधिकारी न होते हुए भी काफी महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गया है। ऐसा सौभाग्य तो मुझे भी नहीं मिला। आज भी वह बहुत कठिन परिश्रम करता है और आई.आई.टी. दिल्ली में पार्ट टाइम पी.एच.डी. कर रहा है। वह मेरा बहुत आदर करता है। जब मैं दिल्ली में ही था, तब से वह वहीं सर्विस कर रहा है। अब भी मैं जब कभी दिल्ली जाता हूँ, तो उससे कम से कम एक बार मिले बिना मुझे चैन नहीं पड़ता। उसके पत्र नियमित रूप से आते रहते हैं। उसकी श्रीमती भी उसकी सच्ची जीवनसंगिनी हैं। उनके हाथ की इडली खाना मुझे बहुत पसन्द है। उनके एक पुत्र और एक पुत्री भी है। पुत्र का नाम उसने 'जय प्रकाश' रखा है और पुत्री का नाम मेरे नाम पर 'विजयलक्ष्मी'।
(पादटीप- डाॅ शिवरामकृष्णैया पीएचडी करने के बाद केन्द्र सरकार के एक विभाग में उच्च पद पर पहुँचकर अब रिटायर होकर हैदराबाद के पास अपने गाँव में रहते हैं। उसके पुत्र और पुत्री दोनों उच्च सरकारी पदों पर सेवा कर रहे हैं।)
यदि अपने इन मित्रों के साथ मैं उन ‘मित्रों’ का जिक्र न करूँ, जिन्होंने गाढ़े समय में मुझे धोखा दिया था, या जो सदैव मेरे खिलाफ बोलते रहे, तो यह विवरण अधूरा ही रहेगा। ऐसे लोग प्रायः अपने मतलब के लिए मेरे ‘मित्र’ बन जाते थे और मतलब निकल जाने पर न केवल मुझसे कतराते थे, बल्कि उल्टे मेरे साथ बुराई करने की भी कोशिश करते थे। जूनियर हाईस्कूल, हाईस्कूल तथा इन्टर में मेरे अधिकतर सहपाठी ऐसे ही थे। लेकिन यहाँ मैं उनके नामों का उल्लेख करके उन्हें अनुचित महत्व नहीं देना चाहता। लेकिन जब भी मैं उनके द्वारा अपने साथ किये गये व्यवहार का विश्लेषण करता हूँ, तो ऐसा कोई कारण नहीं ढूँढ़ पाता, जो उनके व्यवहार का स्पष्टीकरण दे सके। ऐसे दोस्त वास्तव में दुश्मनों से भी बुरे होते हैं। किसी ने सही कहा है-
दोस्तों से हमने वो सदमे उठाये जान पर।
दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा।।
इससे भी बड़ी संख्या मेरे उन दोस्तों की भी है जिन्होंने प्रत्यक्षतः तो मेरा कोई बुरा नहीं किया, लेकिन आवश्यकता के समय मेरी मदद करने से पीछे हट गये। किसी ने कहा है-
हमें भी आ पड़ा है दोस्तों से कुछ काम यानी।
हमारे दोस्तों के बेवफा होने का वक्त आया।।
यहाँ मैंने एम.स्टेट. तक के अपने मित्रों तथा पत्र मित्रों का जिक्र किया है। आगे भी मुझे ढेर सारे सच्चे और झूठे मित्र मिले, जिनका उल्लेख आवश्यकता के अनुसार अगले अध्यायों में करूँगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आत्मकथा भाग-4 अंश-62 (अन्तिम)

आत्मकथा भाग-4 अंश-61

आत्मकथा भाग-4 अंश-21