आत्मकथा भाग-1 अंश-40
यदि मैं अपनी पत्र मित्रों में एस. प्रिया का जिक्र न करूँ तो यह उसके प्रति बहुत अन्याय होगा। वह पांडिचेरी की रहने वाली थी और उस समय शायद अर्थशास्त्र में एम.ए. कर रही थी। बाद में उसने शायद एलएल.बी. में दाखिला ले लिया था। हम दोनों का सम्बन्ध यद्यपि उतना जोशीला (Warm) नहीं था, जितना मेरी उन पत्र मित्रों का जिनका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूँ, फिर भी हमारा पत्र व्यवहार लम्बे समय तक चलता रहा। मेरी अधिकांश मित्रों की तरह उसके पत्र भी मेरे पास रखे हुए हैं। उसकी एक पत्र मित्र श्रीलंका में थी, जहाँ से उसे एक डाकटिकट मिल जाते हैं। उनमें से कई डाक टिकट प्रिया ने मुझे भेजे थे, जो अभी भी मेरे संग्रह में हैं।
इनके अलावा मेरी और भी कई पत्र मित्र रही हैं। उनमें से कुछ के नाम हैं- शर्मिला सिंघा उर्फ मुनमुन (कानपुर), रूही मराक (मेघालय), बिटू बोरा (गौहाटी), अंजली गुप्ता (बम्बई), बेबी विश्वास (अरुणाचल प्रदेश)। मुनमुन के कुल जमा तीन पत्र मेरे पास हैं और उसका प्रत्येक पत्र स्वयं में एक नमूना है। उसकी पत्र लिखने की स्टाइल मेरे समस्त मित्रों में सबसे अच्छी थी। इसे मैं अपना दुर्भाग्य ही कहूँगा कि केवल तीन पत्रों के बाद उसने मुझे लिखना बन्द कर दिया। कारण की मुझे आज भी तलाश है। रूही, बिटू और अंजली के साथ भी मेरा पत्र व्यवहार क्षणिक रहा। लेकिन मैं इनके दो-तीन पत्रों से ही काफी प्रभावित हुआ था। बेबी विश्वास ने मुझे अपना भाई माना है, लगभग प्रत्येक वर्ष उसकी राखी मुझे मिलती रही है। आजकल यद्यपि उसके पत्र आने लगभग बन्द हो गये हैं, लेकिन वह मुझे भूली नहीं होगी, इसका मुझे विश्वास है।
सुशील कुमार अग्रवाल, कायमगंज, जिला फर्रुखाबाद निवासी, के साथ मेरी मित्रता बहुत लम्बी चली। उनके कोई बहिन नहीं है, अतः मेरी बहिन गीता को ही उन्होंने अपनी बहिन बनाया था। गीता ने कई बार उन्हें राखी भी भेजी थी। इधर कुछ वर्षों से उनका पत्र आना बिल्कुल बन्द है। कारण जो भी रहा हो। सुशील की मुझे आज भी बहुत याद आती है। पत्र व्यवहार बंद होने के बाद मैं उन्हें कई बार स्वयं लिख चुका हूँ, लेकिन जबाब आज तक नहीं आया।
श्री नलिन अवस्थी, कानपुर निवासी मेरे घनिष्टतम पत्र मित्रों में से एक रहे है। आप भविष्य निधि आयुक्त के कार्यालय में प्राप्ति विभाग में लिपिक हैं। उनके पास सैकड़ों पत्र आते रहते हैं और उन पर लगे हुए टिकट भी। उन्होंने ऐसे सैकड़ों टिकट मेरे लिए रखकर भेजे हैं। मेरे डाकटिकट संग्रह का एक बहुत बड़ा भाग उनकी ही देन है। दुर्भाग्य से मेरी अभी तक उनसे आमने-सामने की मुलाकात नहीं हो सकी है। कई बार कानपुर जाने पर उनसे मिलने की इच्छा होती है लेकिन हर बार कोई न कोई कारण पैदा हो जाता है। मुझे विश्वास है कि निकट भविष्य में मेरी आकांक्षा अवश्य पूर्ण होगी।
(पादटीप- मैं कानपुर में एक बार नलिन जी से मिल चुका हूँ। जब मैं अपनी चचेरी बहन आशा (अब स्वर्गीय) के विवाह में शामिल होने लखनऊ से कानपुर आया था, तो उनके कार्यालय में उनसे मिला था और फिर वे उस शादी में भी आये थे।)
(पादटीप- मैं कानपुर में एक बार नलिन जी से मिल चुका हूँ। जब मैं अपनी चचेरी बहन आशा (अब स्वर्गीय) के विवाह में शामिल होने लखनऊ से कानपुर आया था, तो उनके कार्यालय में उनसे मिला था और फिर वे उस शादी में भी आये थे।)
मेरे अनेक अन्य पत्र मित्र भी रहे हैं। यदि उन सबका विस्तार से परिचय दूँ तो मेरी कलम को कभी आराम नहीं मिलेगा। अतः मैं नामोल्लेख करके ही उन्हें कृतज्ञतापूर्वक स्मरण कर लेता हूँ- कासिम रज़ा जाफरी (अलीगढ़, मुरादाबाद), मोहम्मद आबिद (बिजनौर), सैयद मुहम्मद अली इकबाल (बाँदा, बम्बई), बृजेश कुमार गुप्ता ‘पथिक’ (कानपुर), भास्कर (अरुणाचल प्रदेश), अजय कुमार मूँदड़ा (अमरावती, बिहार), कंचन मजूमदार (राँची), विनय कुमार अग्रवाल (चन्दौसी), सुरिन्दर पाल भंडारी (फिरोजपुर सिटी), संजय अग्रवाल (मेरठ)।
इनमें एक नाम शामिल नहीं है और वह मैंने इसलिए शामिल नहीं किया है कि यदि मैं केवल उसके नाम का उल्लेख करूँ और विस्तार में न लिखूँ, तो मैं स्वयं को कभी माफ नहीं कर पाऊँगा। वह नाम है मेरे परम मित्र और हितैषी श्री कुलवन्त सिंह गुरु का, जिसे मैं ‘कुलवन्त’ कहकर पुकारा करता हूँ। मूलतः वे मेरे पत्र मित्र थे, लेकिन कालान्तर में हमारे बीच ऐसी सभी प्रकार की औपचारिकताएं समाप्त हो गयीं और हम ऐसे मित्र बने, जिस पर किसी को भी गर्व हो सकता है। वे एक सिख हैं। लेकिन सिर्फ यह उनका पूरा परिचय नहीं है। अब तक सैकड़ों सिख भाइयों के सम्पर्क में मैं आ चुका हूँ, लेकिन यदि मुझे उनमें से सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करना हो, तो मेरे सामने कुलवन्त के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। पता नहीं लोग क्यों कहा करते हैं कि सिखों में अक्ल नहीं होती। मेरा दावा है कि यदि वे एक बार कुलवन्त से मिल लें, तो सदा के लिए सरदारों का मजाक उड़ाना छोड़ देंगे। जिस समय हमारी पत्र-मित्रता शुरू हुई थी, मैं एम.स्टेट. में पढ़ रहा था और वे दिल्ली में रहकर काॅस्ट एंड वर्क्स एकाउन्टेंसी (आई.सी.डब्लू.ए.) का कोर्स कर रहे थे।
पहले हम में साधारण पत्र व्यवहार ही था और मैं उनके बारे में ज्यादा उत्साहित भी नहीं था। लेकिन जब मैं दिल्ली में रहने लगा, तो वे मेरे होस्टल में एक दिन मिलने आये। तब मुझे उनकी महानता का आभास मिला। उसके बाद मैं भी कई बार उनसे मिलने गया और हर बार मैं उनसे पहले से ज्यादा प्रभावित हुआ। उनका ज्ञानकोष मेरी तुलना में कहीं विस्तृत था, यद्यपि विज्ञान विषयों में वे कहीं नहीं थे। लेकिन दुनियादारी और सामान्य ज्ञान के मामले में वे मुझसे बहुत आगे बढ़े हुए थे। उनका स्वास्थ्य काफी अच्छा था। उनका हृदय उससे भी अधिक विशाल और उदार था। वे खर्च के मामले में कभी कंजूसी नहीं करते थे और अपने मित्रों पर खर्च करने में भी संकोच नहीं करते थे। लेकिन यदि कोई उनकी उदारता का गलत फायदा उठाने की कोशिश करता था, तो वे सतर्क हो जाते थे। इस मामले में हम दोनों के विचार एकदम मिलते थे।
धीरे-धीरे हमारी घनिष्टता बढ़ती गयी। एक साल बाद उन्होंने आगरा में उसी इंस्टीट्यूट में मास्टर ऑफ सोशल वर्क (एम.एस.डब्ल्यू.) करना शुरू किया, जहाँ से मैं एम.स्टेट. कर चुका था। वे आगरा में राजा मंडी नामक मुहल्ले में रहते थे, जो हमारे तत्कालीन निवास, जो पी. एंड टी. कालोनी में था, से काफी दूर है। फिर भी मैं आगरा जाने पर उनसे मिलने एक-दो बार अवश्य जाया करता था। वहाँ वे मुझे पुलाव बनाकर खिलाया करते थे। पुलाव बनाने का तरीका मैंने उनसे ही सीखा।
एम.एस.डब्ल्यू. पूरा करने के बाद वे अपने कस्बे मानसा चले गये थे और आजकल वहीं किसी जगह नौकरी कर रहे हैं। इधर दो साल से हमारी मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन कभी-कभी पत्र व्यवहार होता रहता है। हर दीपावली पर उनका एक कार्ड मेरे पास अवश्य आता है, जिस पर प्रायः गुलाब के फूल छपे होते हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि मुझे फूलों से खास तौर पर गुलाब के फूलों से बहुत प्यार है। शहनाज तथा मेरे अन्य अधिकांश मित्र भी मुझे गुलाब के फूलों वाले कार्ड भेजा करते थे। कुलवन्त ने कई बार मुझे अधिकारपूर्वक डाँटा भी है, जिसका मैं कृतज्ञ हूँ। पहली बार उन्होंने मुझे तब टोका था जब मैं उन्हें ‘सरदार’ कहकर पुकारा करता था। उसने ही पहली बार मुझे समझाया कि ‘सरदार’ कहलाना मुझे पसन्द नहीं है। तब से मैं उसे ‘कुलवन्त’ कहा करता हूँ। वह भी मुझे सिंघल या अंजान की बजाय विजय कहकर बुलाया करता है। उसे मेरा शर्ट को पैन्ट से बाहर निकाले रखना बहुत नापसन्द था। उसी की सलाह से अब मैं सदा शर्ट को पैन्ट के अन्दर रखता हूँ। अन्य कई अवसरों पर भी उसने मेरी गलतियों को सुधारा है।
मैंने उससे एक बार पंजाबी भी सीखी थी। मैं पंजाबी अखबारों की हैड लाइनें (शीर्षक) पढ़ने लगा था, लेकिन बाद में सब भूल गया। उसकी रुचि काफी साहित्यिक थी। कई अच्छी पंजाबी और अंग्रेजी कविताओं को उसने मुझे समझाया था। कुल मिलाकर कुलवन्त मेरा एक ऐसा मित्र है, जिस पर मुझे गर्व है।
(पादटीप- कुलवन्त से मेरा सम्पर्क बीच में टूट गया था। लेकिन 22 वर्ष बाद दोबारा हुआ। कैसे हुआ यह कहानी बहुत रोचक है। इसका विस्तृत विवरण मैं आत्मकथा के तीसरे भाग में लिख चुका हूँ। उनसे अभी भी मेरा सम्पर्क बना हुआ है। वे लेबर कमिश्नर जैसे उच्च पद से रिटायर होकर अब मानसा में ही रह रहे हैं।)
(पादटीप- कुलवन्त से मेरा सम्पर्क बीच में टूट गया था। लेकिन 22 वर्ष बाद दोबारा हुआ। कैसे हुआ यह कहानी बहुत रोचक है। इसका विस्तृत विवरण मैं आत्मकथा के तीसरे भाग में लिख चुका हूँ। उनसे अभी भी मेरा सम्पर्क बना हुआ है। वे लेबर कमिश्नर जैसे उच्च पद से रिटायर होकर अब मानसा में ही रह रहे हैं।)
(निवेदन- इस आत्मकथा में मैंने अपने जिन मित्रों का उल्लेख किया है यदि आप उनमें से किसी को जानते हों, तो कृपया मुझे अवश्य बतायें।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें