आत्मकथा भाग-1 अंश-39

शहनाज की तरह ही मेरी एक और पत्र मित्र थी- टीना। उसका असली नाम था ‘मैरीना कोलाको’। वह ईसाई थी और बम्बई में रहती थी। उसने भी मुझे बहुत प्यार भरे पत्र लिखे थे। मेरी कविताओं पर वह बुरी तरह मरती थी। यद्यपि वह स्वयं अंग्रेजी लिखती-बोलती थी, लेकिन हिन्दी फिल्मों की कृपा से हिन्दी अच्छी तरह समझ लेती थी। वह बहुत अच्छी गायिका थी और प्रायः शौकिया प्रोग्राम दिया करती थी। उसका हस्तलेख बहुत सुन्दर था। वह पत्रों पर रंगबिरंगे फूल हाथ से बनाकर भेजा करती थी। साथ ही साधारण शब्दों में वह बहुत प्यार भरी बातें लिखा करती थी। उसके पत्र छोटे-छोटे होते थे, लेकिन मेरे ऊपर गहरा असर करते थे।
एक बार हम दोनों में किसी बात पर झगड़ा भी हुआ था। बात मामूली ही सी थी (और इस समय मुझे याद नहीं क्या थी), फिर भी उसने पत्र लिखना बन्द कर दिया। मैंने अपनी एक और पत्र-मित्र शिखा को टीना का परिचय और हमारी प्रगाढ़ होती मित्रता की जानकारी दे रखी थी। जब उसे मैंने झगड़े के बारे में लिखा, तो उसका जबाब आया कि प्यार करने वालों में ऐसा झगड़ा कम से कम एक बार अवश्य होता है और फिर खुद ही खत्म हो जाता है। उसकी भविष्यवाणी सत्य निकली और मेरे एक पत्र से पसीजकर ही टीना ने बहुत प्यारा पत्र लिख दिया। उस पत्र को मैंने कई बार पढ़ा और चूमा। उस दिन से मैं उसकी तरफ बहुत आकर्षित हो गया।
उसका एक छोटा-सा फोटो मेरे पास था और आज भी है। वह अगर बहुत सुन्दर नहीं तो खराब भी नहीं लगती। उसकी आँखें बहुत सुन्दर हैं। कुल मिलाकर वह बहुत आकर्षक लगती है। अगर हम मात्र पत्र-मित्र न होकर आमने-सामने होते, तो मैं शायद पागल हो जाता। मैं उसे सपने में देखा करता था और वह भी ऐसा ही लिखती थी। उन्हीं दिनों शहनाज से मेरा पत्र व्यवहार बंद हुआ था। अतः मैं टीना की तरफ बहुत खिंच गया था।
उसके पचास-साठ पत्र मेरे पास आये। एक बार मैंने उसे लिखा कि मैं कल्पना करता हूँ कि हम दोनों बंधन में बंध गये हैं और मैं आफिस जाते समय तथा वापिस लौटकर उसे बाहों में भरकर चूम लेता हूँ। उसे यह पढ़कर बहुत मजा आया और उसने लिख दिया कि वह मेरी जीवनसंगिनी बनकर स्वयं को धन्य मानेगी। उसने यह भी लिखा कि मैं जल्दी से कोई काम देख लूँ, ताकि हम दोनों की गुजर-बसर हो सके। तब मैंने गंभीरता से इस मामले पर सोचा और यही निश्चय किया कि पहले पढ़ाई पूरी करके कुछ बनना है, तभी शादी-वादी की बात सोची जा सकती है।
मेरे जबाब से वह कुछ निराश हुई, लेकिन जल्दी ही उसने सच्चाई महसूस कर ली। हमारा पत्र व्यवहार पूर्ववत् चलता रहा। मेरे जे.एन.यू. के कई दोस्तों को हमारी मित्रता के बारे में मालूम था और वे प्रायः मुझे ‘टीना’ का नाम लेकर छेड़ा करते थे।
अगले दो-तीन महीनों में ही उसने लिखा कि उसके पिता उस पर एक लड़के से शादी करने के लिए दबाब डाल रहे हैं। वैसे वह लड़का ठीक है, लेकिन वह मुझे ज्यादा चाहती है। मैंने लिखा कि तुम केवल दो साल मेरा इंतजार कर सको, तो कर लो, मैं तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी बनाकर अपना सौभाग्य मानूँगा। लेकिन उसने जबाब दिया कि वह पिताजी के वचन को नहीं टाल सकती और यह भी कि उसने उस लड़के से मिलना-जुलना शुरू कर दिया है। धीरे-धीरे उसके पत्र कम होने लगे। मैं वास्तविकता समझ गया, अतः मैंने भी उस पर जोर नहीं डाला। मैंने उसे अपनी शुभकामनाएं भी दीं।
शादी से पहले उसके एक-दो पत्र और आये। सौभाग्य से उसने शहनाज की तरह अपना फोटो तथा पत्र वापिस नहीं माँगे। एक बार उसने अपने पत्रों को नष्ट कर देने के लिए कहा था और मैंने उसके प्रारम्भिक अठारह पत्र फाड़कर फेंक दिये थे। लेकिन उसके बाद के सारे पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। उसके फोटो को भी मैं कभी-कभी देखता रहता हूँ और उसके मासूम चेहरे पर अब मुझे और ज्यादा प्यार आता है। उसे एक बार मैंने उसी के ऊपर लिखी अपनी एक कविता भेजी थी, जो इस प्रकार थी-
मैं आज तक नहीं समझ पाया कि तुम क्या हो।
कभी तुम धधकता हुआ शोला हो,
तो कभी शीतल समीर हो,
कभी तुम खिलखिलाती सुबह हो,
तो कभी उदास शाम हो,
कभी तुम बहता हुआ दरिया हो,
तो कभी ठहरा हुआ तालाब हो
कभी तुम तुम हो, तो कभी तुम तुम नहीं हो।
सच तो यह है कि
तुम्हें समझना बहुत मुश्किल है।
मेरी प्रियतमा,
तुम चाहे कुछ भी हो,
सिर्फ एक बार फिर से कह दो कि तुम मेरी हो!
उसे यह कविता बहुत पसन्द आयी थी। उसने अंग्रेजी में लिखा था- क्या मैं समझ में आने में इतनी मुश्किल हूँ? हाँ, मैं कुछ मूडी हूँ! आज जब मैं टीना के बारे में लिखने बैठा हूँ, तो मेरा पेन दौड़ रहा है, रुकने का नाम नहीं ले रहा है और मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा है।
ऊपर जिस शिखा का जिक्र मैंने किया है, वह भी मेरी एक घनिष्ट पत्र-मित्र थी। उसका पूरा नाम था शिखा मिलिकपी। वह असम की रहने वाली थी। हम दोनों में काफी दिनों तक पत्र व्यवहार चलता रहा था। उसने अपने तीन चित्र मुझे भेजे थे, जबकि मैं केवल एक ही भेज पाया हूँ। यों वह मैदानी लड़कियों जैसी सुन्दर नहीं है, लेकिन मैं यह अवश्य कहूँगा कि पहाड़ी लड़कियों में उससे ज्यादा सुन्दर लड़कियाँ कम ही होंगी। इससे भी बढ़कर सुन्दर था उसका दिल। हर बात साफ-साफ और बुद्धिमानीपूर्ण करना उसकी विशेषता थी। यों मैं अपनी समस्त पत्र-मित्रों में अनी को सबसे ज्यादा होशियार और बुद्धिमान मानता हूँ तथा शहनाज को सबसे अच्छे स्वभाव वाली और समझदार, लेकिन शिखा में ये सारे ही गुण पर्याप्त मात्रा में थे। उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी, कम से कम मुझसे तो ज्यादा ही। यों उसके पत्र दो-तीन महीने में एक-दो ही आ पाते थे, लेकिन हर पत्र काफी लम्बा होता था।
मुझे शिखा के पत्र पढ़ना और उनका जवाब देना बहुत पसन्द था। मगर अफसोस समय के कारण हमारा पत्र व्यवहार बन्द हो गया। शायद उसकी कहीं शादी हो गयी हो। हर लड़की का आखिरी ‘कर्तव्य’ यही होता है। शिखा की मुझे आज भी बहुत याद आती है और उसके फोटो को मैं बहुत बार देखता रहता हूँ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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