आत्मकथा भाग-1 अंश-38

पत्रों के माध्यम से जिन अनेक मित्रों के सम्पर्क में आने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ उनमें श्री सुभाष चन्द्र दलाल का नाम अविस्मरणीय है। आप हरियाणा के बहादुरगढ़ जिले के एक गाँव मातन (या मुंडाखेड़ा) में एक गरीब लेकिन आकार में बड़े परिवार के सदस्य हैं। अगर मुझसे सच्चे इंसानों का उदाहरण देने के लिए कहा जाय तो मैं दलाल साहब का नाम शायद सबसे पहले लूँगा। आप कांग्रेस के प्रति काफी श्रद्धा रखते थे, जबकि मैं सदा से कांग्रेस का कट्टर विरोधी रहा हूँ। इस सबके बावजूद वे मुझे बहुत प्यार करते थे। हममें पत्रों के माध्यम से काफी लम्बी और कभी-कभी अप्रिय बहसें हुआ करती थीं। लेकिन मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने कभी मुझे यह अनुभव नहीं होने दिया कि भिन्न राजनीतिक विचाराधारा के कारण या अन्य किसी कारण से वे मुझे पसन्द नहीं करते। बल्कि मैंने सदा ये पाया कि घोर बहस और मतभेद के दिनों में भी उनका प्यार मेरे प्रति बढ़ता ही जाता था।
इससे भी बढ़कर उनकी इंसानियत की झलक उनकी परदुःखकातरता में मिलती थी। स्वयं गरीब और घरेलू कारणों से तनावग्रस्त होते हुए भी उन्होंने सैकड़ों गरीबों की मदद की थी और आज भी करते रहते हैं। आजकल वे वहीं एक जूनियर हाईस्कूल में शिक्षक हैं और अपना ज्यादातर समय समाजसेवा में लगाते हैं। मेरे पास उनके पत्रों की संख्या सबसे ज्यादा है और सबसे लम्बे भी। सारे पत्र अभी तक मेरे पास रखे हैं और रखे रहेंगे। उनका एक फोटो भी मेरे संग्रह में है। काफी दिनों तक हम दोनों का पत्र व्यवहार चलता रहा था लेकिन समय के साथ वह भी बन्द हो गया। मुझे अभी तक उनके दर्शन का सौभाग्य नहीं मिला है, जिसके लिए मैं काफी कोशिश करता था। शायद यही ईश्वर की इच्छा है।
गोरखपुर निवासी श्री शिव प्रसाद तुलस्यान मेरे एक और घनिष्ट पत्र मित्र रहे हैं। आप आनन्द नगर (गोरखपुर) की गणेश सुगर मिल्स में सुपरवाइजर हैं। मेरी तरह तुलस्यान साहब भी संघ के स्वयंसेवक हैं और नियमित कार्यक्रमों में जाया करते हैं। कई बार मुझे उनका दर्शन करने का सौभाग्य भी मिला है। डाक टिकट संग्रह में जाग्रत हुई मेरी रुचि को बढ़ाने में उनका बहुत योगदान रहा है। उन्होंने काफी टिकट मुझे भेंट में दिये थे। उनका अपना संग्रह मुझसे काफी बड़ा है। मैं प्रायः प्रसिद्ध व्यक्तियों पर जारी की गयी टिकटें इकट्ठे करने में बहुत रुचि लेता था। आजकल यद्यपि समय की कमी से मेरा यह शौक लगभग रुक गया है, लेकिन प्रायः टिकटें मिलती रहती हैं। तुलस्यान साहब के पत्र मुझ तक अभी भी कभी-कभी आ पहुँचते हैं।
एक बार मेरा पता ‘यूथ टाइम्स’ नामक अंग्रेजी की एक साप्ताहिक पत्रिका में छप गया था। उसके बाद मुझे काफी पत्र मिले थे, विशेषकर लड़कियों के और उनमें से कई मेरे बहुत घनिष्ट मित्र बन गये थे। उनमें सबसे उल्लेखनीय नाम है- शहनाज का। वैसे उसका नाम ‘नफीसा नाज’ था, लेकिन मैंने उसका नाम ‘शहनाज’ रख दिया था। उसे भी यह नाम बहुत पसन्द था। वह मुझे ‘विजू’ कहकर पुकारा करती थी, जो कि मेरा बचपन से घर का नाम चला आ रहा है। शहनाज और मैं शीघ्र ही पत्रों के माध्यम से बहुत खुल गये थे। वह गुजरात और राजस्थान की सीमा पर बसे ‘दोहद’ या ‘दहोद’ की रहने वाली थी और उसके घर में अंग्रेजी बोली जाती थी, लेकिन मेरे हिन्दी प्रेम को देखकर उसने मुझे हिन्दी में पत्र लिखना शुरू कर दिया था। प्रारम्भ में उसकी हिन्दी ऐसी ही थी लेकिन शीघ्र ही वह काफी सुधर गयी थी। वह मेरी पहली महिला पत्र-मित्र थी जिसने अपना फोटो मुझे भेजा था। वह काफी सुन्दर थी। जिस दिन मुझे उसका फोटो मिला था, मैं देर तक छुपकर उसे देखता रहा था। उसकी सुन्दर आँखें और बाल तथा मासूम चेहरा मेरे दिल में बस गये थे। उस दिन पहली बार मैंने वह महसूस किया था, जिसे लोग ‘प्यार’ कहा करते हैं।
वह मुस्लिम थी। मैं जानता था कि हमारा सम्बन्ध मात्र पत्र-मित्रता तक सीमित रहेगा और हम दोनों का मिलना लगभग असंभव है। फिर भी मैं उसके पत्रों को ही अपने सौभाग्य की निशानी मानता था। प्रायः हर महीने उसके दो-तीन पत्र आ जाते थे। मैं बेसब्री से उसके पत्र का इन्तजार करता रहता था। वह भी मुझे बहुत प्यारी-प्यारी बातें लिखती थी और कई बार मुझे सान्त्वना तथा प्रेरणा दिया करती थी। उसके दो अन्य फोटो भी मेरे पास आये थे, मगर दुर्भाग्य से उनमें से एक खो गया था।
लेकिन मुझे ज्ञात नहीं था कि भाग्य मेरे साथ एक क्रूर मजाक करने वाला है। केवल एक साल की पत्र मित्रता के बाद जाने क्या हुआ कि उसने अचानक मुझे पत्र लिखना बन्द कर दिया। उसे मेरी कानों की बीमारी के बारे में मालूम था, फिर भी वह मुझे बहुत प्रेरणा देती थी और प्यार भरे शब्दों में सान्त्वना देती थी। उसके अचानक पत्र बन्द कर दिये जाने से मैं हैरान रह गया था। उस समय तक मैंने अनी का शहनाज से परिचय करा दिया था तथा उनमें भी पत्र व्यवहार होने लगा था। अनी के पत्रों से ही मुझे ज्ञात हुआ कि किसी कारणवश वह मुझसे आगे पत्र व्यवहार नहीं रखना चाहती। साथ ही उसने अपने फोटो तथा पत्र भी वापस माँगे थे। अनी के कहने से मैंने उसका एक फोटो अपने पास रखकर उसका फोटो तथा सारे पत्र रजिस्टर्ड डाक से भेज दिये थे। उसने मुझे औपचारिक धन्यवाद भी दिया अनी के माध्यम से। इस समय शहनाज की मात्र दो निशानियाँ मेरे पास हैं- एक उसका फोटो तथा एक दीपावली पर भेजा गया कार्ड, जिसमें उसने कुछ शब्द लिखे हैं। इन दोनों ही चीजों को मैं अपनी अमूल्यतम निधि मानता हूँ। भले ही वह अब मेरी कुछ न लगती हो, लेकिन उसकी यादें मेरे मन पर सदा-सदा के लिए अंकित हो गयी हैं। आजकल भी मुझे उसकी याद आती है। शायद उसकी शादी भी हो गयी हो।
उससे पत्र मित्रता टूट जाने के बाद मुझे बहुत दुःख हुआ था। मैं हर समय उसकी याद में खोया रहता था। इच्छा होती थी कि उड़कर उसके पास पहुँच जाऊँ और उससे पूछूँ कि बता, मेरा कसूर क्या है? उन दिनों मैं बहुत तनावग्रस्त रहता था। मेरा स्वास्थ्य बहुत ज्यादा गिर गया था तथा मेरे गले के चारों ओर टान्सिल हो गये थे। मैंने उसकी याद में कई कविताएं तथा गजलें लिखी हैं। जिनमें से एक नीचे दे रहा हूँ-
मुझे वे दिन याद आते हैं,
जब तुम्हारे हर पत्र से प्यार झलकता था
जब तुम्हारे हर शब्द से स्नेह टपकता था
जब मैं आसमान में उड़ा करता था
जब मैं तुम्हारे ख्यालों में खोया रहता था
एक साल, सिर्फ एक साल
फिर सब कुछ समाप्त हो गया,
एक सुन्दर स्वप्न की तरह!
मेरी प्रियतमा!
मैं तुमसे कुछ नहीं चाहता,
बस तुम मुझे मेरे वे दिन लौटा दो,
ताकि मैं आसमान में उड़ता रहूँ
ताकि मैं तुम्हारे ख्यालों में खोया रहूँ!
मैं आज भी यह मानता हूँ कि उसने मुझसे मित्रता समाप्त करने का निर्णय किसी बहुत बड़ी मजबूरीवश लिया होगा और वह भी उतनी ही, बल्कि उससे ज्यादा ही, दुःखी हुई होगी, जितना मैं हुआ था। क्योंकि उसका प्यार सच्चा था, क्योंकि हमारी मित्रता पवित्र थी और इसका सबूत है उसकी मासूम आँखें और उसकी कभी न मिटने वाली याद।
(पादटीप- शहनाज से भी मेरा दोबारा सम्पर्क लगभग 30 साल बाद हुआ। इसका विवरण भी मैं अपनी आत्मकथा के चौथे भाग में लिख रहा हूँ।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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