आत्मकथा भाग-1 अंश-37
जिन दिनों मैं इन्टर में पढ़ने लगा था, उन्हीं दिनों मेरी रुचि पत्र-मित्रता की तरफ हो गयी थी। मेरा विचार था कि आमने-सामने के बजाय पत्रों के माध्यम से हम एक दूसरे को ज्यादा अच्छी तरह समझ सकते हैं और आपस में झगड़ा होने का भी खतरा नहीं है। अतः मैं स्वाभाविकतया ही पत्र-मित्रता की तरफ झुक गया। मैंने लखनऊ से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी दैनिक ‘नेशनल हैराल्ड’ के पत्र-मित्र स्तम्भ में अपना पता तीन बार छपवाया था जिसमें से एक बार वह गलत छपा था। इसके जबाव में मुझे दर्जनों पत्र मिले। कई गुमनाम पत्र भी मिलते थे जिन्हें मैं तुरन्त फाड़कर फेंक दिया करता था। लेकिन मैंने यह नियम बना लिया था कि अपने पास अपने वाले पत्रों का जबाब मैं अवश्य दूँगा। इस प्रण को मैंने पूरी तरह निभाया और आज भी निभाने की कोशिश करता हूँ।
अपने समय का एक बड़ा हिस्सा मैं पत्र लिखने पर खर्च किया करता था। उसके कारण मुझे घर वालों के कोप का पात्र भी बनना पड़ता था। उन तंगी के दिनों में डाक खर्च के लिए पैसों की मुश्किल तो थी ही, फिर भी मैं किसी तरह उसका प्रबन्ध कर लेता था, ज्यादातर जेबखर्च काटकर। मुझे बाजार में खाने पीने पर पैसा उड़ाने की आदत कभी रही नहीं, अतः जो सीमित जेबखर्च मिलता था, उसमें से अन्तर्देशीय या लिफाफों के लिए पैसे बचाने में मुझे कोई कठिनाई नहीं होती थी। पोस्ट कार्ड मैं प्रायः नहीं लिखता था।
पत्र-मित्रता के माध्यम से मुझे कई घनिष्ट मित्र पाने का सौभाग्य मिला, जिनका जिक्र आगे करूँगा। मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में मेरे मित्रों, खासकर पत्र मित्रों का बहुत हाथ रहा है, अतः उन सबके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना मेरा कर्तव्य है।
मेरे सबसे बड़े और घनिष्ट मित्रों में से एक हैं श्री रमेश चन्द्र राणा। आप सेना में सिग्नल कम्पनी में उस समय हवलदार थे और आजकल किसी ऊँची पोस्ट पर हैं। ये मुझे बहुत प्यार करते हैं। उनके सारे पत्र प्यार से ओत-प्रोत होते थे। हम दोनों की उम्र में काफी अन्तर है लेकिन इन्होंने मुझे कभी इस बात का अहसास नहीं होने दिया। मेरी प्रतिभाओं (जो भी छोटी-मोटी हैं) के वे बहुत प्रशंसक हैं। उनके अनुरोध पर मैंने अपने दो कार्टून उन्हें बनाकर भेजे थे। पहले मैं कार्टून बहुत बनाया करता था, जिनमें से केवल एक छप सका है। बाद में इसमें मेरी अरुचि हो गयी, क्योंकि इसमें समय बहुत लगता था और उसकी तुलना में फायदा नगण्य था। राणा साहब की रुचि साहित्यिक थी और मैं तो एक तरह का हरफनमौला रहा ही हूँ। अतः वे मुझे अपनी लघु रचनाएं लिखकर भेजते थे और मैं भी अपनी कविताएँ उन्हें लिख देता था, जिनके वे बहुत बड़े प्रशंसक थे। उन्हीं दिनों मेरे कान खराब हुए थे। एक दिन मैंने अपनी समस्या के बारे में उन्हें लिख दिया। जबाब में उनका बहुत प्रेरणादायक पत्र आया। मेरी आँखों के सामने छायी निराशा की धुंध को अपनी प्रेरणाओं से समाप्त करने का बहुत कुछ श्रेय उन्हीं को है।
मुझे एक बार उनके दर्शन का भी सौभाग्य मिल चुका है। एक बार वे जबलपुर से आगरा होकर दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने अपने आने का दिन तथा समय मुझे लिख दिया था। सौभाग्य से मुझे वह पत्र एक-दो दिन पहले ही मिल गया। अतः मैं कुछ पेठा और दालमोंठ लेकर प्रातः 5 बजे पैदल ही लोहामंडी से आगरा कैंट स्टेशन पर गया था। मेरे सौभाग्य से उनका डिब्बा ढूँढ़ने में मुझे कोई मुश्किल नहीं हुई और वे भी मिल गये। यद्यपि मैं उन्हें पहचान नहीं पाया था, क्योंकि फोटो देखकर किसी को पहचानना मेरे लिए बहुत मुश्किल होता है, लेकिन उन्होंने मुझे पहचान लिया था। मैंने राजा की मंडी तक की टिकट ले रखी थी अतः हम उसी गाड़ी से साथ ही साथ राजा की मंडी तक आये और बातें करते रहे। मैंने राजा की मंडी स्टेशन पर उनसे विदा ली। वह दिन मेरी जिन्दगी के सबसे ज्यादा खुशी वाले दिनों में से एक है। उसके बाद उनके दर्शन नहीं हो पाये, यद्यपि कई बार अच्छे मौके मिले। उनके सैकड़ों पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित रखे हुए हैं, जिन्हें मैं अपनी निधि मानता हूँ आज भी कभी-कभी भूले भटके उनका पत्र आ जाता है।
(पादटीप- श्री राणा अब रिटायर होकर हि.प्र. के मंडी जिले के अपने गाँव में रहते हैं।)
(पादटीप- श्री राणा अब रिटायर होकर हि.प्र. के मंडी जिले के अपने गाँव में रहते हैं।)
पवन कुमार गुप्ता मेरे एक और घनिष्ट पत्र मित्र रहे हैं। वे काफी स्मार्ट और आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक हैं। कुछ समय तक बेरोजगार रहने के बाद वे एक होटल में रिसेप्शनिस्ट हो गये थे। उनके साथ मेरी अच्छी पटती थी। पत्र लिखने में हम दोनों में ही होड़ लगी रहती थी। उन्होंने अपने कई चित्र (फोटू) मुझे भेजे थे जो आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। उनसे कई बार मिलने का सौभाग्य मिला, आगरा में भी और दिल्ली में भी। आजकल वे दिल्ली में ही एक पंचतारा (फाइव स्टार) होटल में हैं।
मेरी कई महिला पत्र मित्र भी रही हैं। उनमें सबसे पहला और सबसे ऊपर नाम है अनिता अग्रवाल (लखनऊ) का, जिन्हें मैं ‘अनी’ कहा करता था। उसे मैंने एक बहुत ही सुलझे हुए विचारों वाली मित्र पाया। मुझमें सैकड़ों तरह की गन्दी आदतें रही हैं, मैं बहुत जल्दी किसी के बारे में अपनी सही या गलत, अच्छी या बुरी राय बना लेता था और उसी के अनुसार मेरा व्यवहार होता था, जिसके कारण मुझे प्रायः हानि उठानी पड़ती थी या शर्मिन्दा होना पड़ता था। मेरी ऐसी ही आदतों को काफी हद तक सुधारने का श्रेय अनी को ही है। उसकी भी साहित्य में रुचि थी। मेरी कविताएं उसे बहुत पसन्द थी। मैंने अपनी कई कविताएं उसे लिख भेजी थीं। उसने भी अपने एक दो कविताएं मुझे लिखी थीं। उसका शौक था- नामकरण करना। मेरा उपनाम ‘अंजान’ उसी का दिया हुआ है। जो मुझे काफी पसंद है।
मैंने अपने एक-दो फोटो उन्हें भेजे थे, मगर अफसोस कि तमाम प्रार्थनाओं के बावजूद उन्होंने मुझे अपना फोटो नहीं दिया। लेकिन इस बात का मुझे कोई दुःख नहीं है। वास्तव में उनके पत्र ही उनके सौन्दर्य के सच्चे दर्पण हैं। हो सकता है वे तन से सुंदर न हों लेकिन मन से सुंदर अवश्य हैं। मुझे उनके दर्शन करने का सौभाग्य अभी तक नहीं मिला है और शायद कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि आजकल वे इलाहाबाद के एक संभ्रान्त परिवार की कुल वधू हैं। लखनऊ में वर्षों तक रहते हुए भी मैं कभी उनके घर (मायके) जाने का साहस नहीं जुटा सका, क्योंकि हमारा समाज खून के रिश्ते के अलावा अन्य किसी सम्बन्ध को मान्यता नहीं देता। अनी की शादी ठीक उस दिन हुई थी, जिस दिन मैं तिहाड़ जेल से छूटा था। मैं वहाँ ‘संगीन अपराधों’ के आरोप में बंद था। अनी की शादी का निमन्त्रण पत्र मुझे आगरा में मिला था, उसकी शादी के एक दिन बाद। जाने का प्रश्न ही नहीं था, क्योंकि समाज द्वारा खड़ी की गयी दीवारों को लाँघने का साहस मुझमें नहीं था।
उम्र में छोटी होते हुए भी मैं उसे अपनी बड़ी बहन की तरह मानता था और उसे मुझको डाँटने-फटकारने का भी अधिकार मिला हुआ था। एक बार मैंने उसके ऊपर एक कविता लिखी थी, जो उसे भेजी भी थी। अनी ने उस कविता पर सीधी तरह कोई टिप्पणी नहीं की। लेकिन उसके पत्र उसकी शादी के बाद भी एक-दो आये थे। उसके द्वारा लिखे गये पचास से भी ज्यादा पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं, जिन्हें मैं अपनी अमूल्य धरोहर मानता हूँ। कभी-कभी जब मुझे अनी की बहुत याद आती है, तो मैं उसके पुराने पत्रों को खोलकर पढ़ लेता हूँ।
अनी और मेरी पत्र मित्रता के बारे में परिवार वालों और कई घनिष्ट मित्रों को भी मालूम था। यहाँ तक कि कल्पना को भी यह मालूम था। प्रायः कल्पना मुझे अनी का नाम लेकर छेड़ा करती थी। मेरी और अनी की मित्रता एक आदर्श थी और मैं स्वयं को इस बात के लिए बहुत सौभाग्यशाली मानता हूँ।
(पादटीप- अनिता अग्रवाल से मेरा दोबारा सम्पर्क लगभग 28 साल बाद हुआ और मैं दो बार उससे मिल भी चुका हूँ। इसका पूरा विवरण मैं अपनी आत्मकथा के चौथे भाग में लिख रहा हूँ।)
(पादटीप- अनिता अग्रवाल से मेरा दोबारा सम्पर्क लगभग 28 साल बाद हुआ और मैं दो बार उससे मिल भी चुका हूँ। इसका पूरा विवरण मैं अपनी आत्मकथा के चौथे भाग में लिख रहा हूँ।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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