आत्मकथा भाग-1 अंश-36

इण्टर में भी हमारी कक्षा में ज्यादातर हाईस्कूल के ही साथी थे, लेकिन कई नये दोस्त भी मिले। उनमें से कई पिछली साल फेल होने वाले लड़के थे, उनमें से दो के नाम मुझे याद हैं - सादुल कुद्दूस और कृष्ण कुमार (राजेश) वशिष्ठ। सादुल कुद्दूस आगरा शहर के मुफ्ती का लड़का था अपने आप में मुस्लिम युवक का एक नमूना था। उसका उर्दू साहित्य का ज्ञान काफी अच्छा था। इन्टर में तो हमारे सम्बन्ध औपचारिक ही रहे, लेकिन वह हमारे साथ बी.एससी. में भी पढ़ने आया था, तब हम बहुत नजदीक आ गये थे। उसके माध्यम से मेरा उर्दू सम्बन्धी ज्ञान काफी विकसित हुआ। कई बार मेरी उससे बहस भी हो जाती थी, जो कटुता तक नहीं पहुंचती थी। आजकल वह शायद कुवैत में है।
वशिष्ठ का पूरा नाम शायद ‘कृष्ण कुमार’ था, लेकिन वह ‘राजेश’ उपनाम से कहानियाँ लिखा करता था। शायद एकाध छप भी गयी थी। मेरी साहित्यिक रुचि उसे ज्ञात थी, क्योंकि मैं ऐसे मामलों में कक्षा में सबसे अव्वल माना जाता था। इसलिए वह अपनी लिखी हुई कहानियाँ केवल मुझे पढ़ने को दिया करता था। वह काफी अच्छी कहानियाँ लिखता था, मगर पढ़ने-लिखने में फिसड्डी था। वह बहुत अच्छा साहित्यकार बन सकता था (शायद बन भी गया हो) लेकिन गरीबी की मार ने उसे तोड़कर रख दिया था। मुझे याद है कि एक बार वह तीन महीने तक अपनी फीस नहीं दे पाया था, जिसके कारण उसका नाम काट दिया गया था। तब कक्षा के लड़कों ने चन्दा करके उसकी छः महीने की फीस जमा की थी। आजकल वह कहाँ पर है मुझे ज्ञात नहीं।
इन दोनों के अलावा फेल होने वालों में तीसरा और था, उसका नाम भी मुझे याद नहीं। लेकिन वह गाना गाने में बहुत अच्छा था। नयी से नयी और पुरानी से पुरानी फिल्मों के प्रसिद्ध गाने उसे कंठस्थ थे और प्रायः कक्षा में सुनाया करता था। इन्टर पास करने के बाद मेरा इन सबसे सम्बन्ध बिल्कुल टूट गया था। केवल कुछ लड़के जो सेंट जाॅह्न्स काॅलेज में पढ़ने लगे थे मेरे साथ रहे। ज्यादातर आगरा कालेज में चले गये थे।
सेंट जाॅह्न्स काॅलेज में पूरा माहौल ही बदला हुआ था। बी.एससी. आदि कक्षाओं में आकर लड़के काफी परिपक्व हो जाते हैं। व्यक्तिगत झगड़े प्रायः समाप्त हो जाते हैं। यहाँ आकर मुझे काफी नये और अच्छे दोस्त मिले जिन्होंने न केवल मेरे स्वाभिमान को पहचाना बल्कि मेरी प्रतिभा को भी सम्मान दिया। उनमें से ज्यादातर के नाम मुझे अभी भी अच्छी तरह याद हैं- वत्सराज सिंह, रामेश्वर सिंह सोलंकी, श्यामबाबू उपाध्याय, राकेश गुप्ता, प्रशान्त कुमार सिंह, राजेन्द्र मदान (उर्फ छैलाबाबू), सोहराब साबिर, कृष्ण कुमार अग्रवाल, क्षेम वैभव शर्मा, अनिल कुमार जैन आदि। इनमें से कई सहपाठियों तथा सभी सहपाठिनियों का जिक्र में अध्याय छः में कर चुका हूँ यहाँ अन्य सहपाठियों को स्मरण करूँगा।
राकेश गुप्ता, राजेन्द्र मदान, सोहराब साबिर, कक्कड़, अलीम खाँ, अजमल अली शाह, सन्देह सिंह त्रिपाठी, क्षेम वैभव शर्मा, के.के. अग्रवाल ये सब मेरे अर्थशास्त्र विषय के सहपाठी थे। इनमें से तीन बी.ए. के थे और बाकी मेरे साथ ही बी.एससी. के। हम बी.एससी. में अर्थशास्त्र वालों ने मिलकर एक समूह बना लिया था और आपस में काफी अच्छी समझदारी (अंडरस्टैंंडिंग) थी। मुझे याद नहीं आता, यदि हममें आपस में कभी किसी किस्म का झगड़ा हुआ हो। यों हममें बहस बहुत होती थी, लेकिन उसका स्वरूप हंसी मजाक तक ही सीमित रहता था। खाली समय में हम प्रायः पास के होटलों में जाकर चाय पिया करते थे और गप्पें हांका करते थे। एक-दूसरे के घर भी आना-जाना लगा रहता था। मगर मुझे अफसोस है कि इनमें से अधिकतर के बारे में मुझे आज कोई जानकारी नहीं है कि ये कहाँ पर हैं। राकेश गुप्ता के पिताजी उस समाज विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर थे, जहाँ से मैंने एम.स्टेट. किया था। 
एक बार मुझे संयोग से राजेन्द्र प्रसाद मदान मिला था, उससे ज्ञात हुआ कि वह इलाहाबाद बैंक, सतना में कैशियर है।
(पादटीप- राजेन्द्र प्रसाद मदान अब इलाहाबाद बैंक की सेवा से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं और शायद आगरा में ही रहते हैं।)
केवल सोहराब साबिर के साथ मेरे घनिष्ट सम्बन्ध आगे भी चलते रहे। वह मेरा बहुत अच्छा मित्र साबित हुआ। उसके पिताजी काफी पहले ही गुजर गये थे, अतः माताजी ने ही उसका पालन पोषण किया था। उसकी एक विवाहित बहिन है, जो आगरा में रहती है। दुःख सिर्फ इस बात का है कि उसमें ज्यादा प्रतिभा नहीं थी और वह कई वर्षों के प्रयत्नों के बाद ही बी.एससी. कर सका। बाद में जब मैं दिल्ली में पढ़ रहा था, तो उसने मेरे कमरे में कुछ दिन रहकर रेलवे की प्रतियोगी परीक्षा दी थी और कुछ समय बाद सहायक स्टेशन मास्टर के पद पर उसका चयन हो गया था।
(पादटीप- सोहराब साबिर अब रेलवे में स्टेशन मास्टर पद से अवकाश प्राप्त करके आगरा में ही रह रहे हैं।)
अलीम खाँ और अजमल अली शाह मेरे बी.ए. के अर्थशास्त्र के सहपाठियों में से थे। उनके साथ मेरी बहुत घनिष्टता हो गयी थी। मैं उर्दू शायरी का शौकीन रहा हूँ। ये दोनों, विशेषकर अजमल अली शाह, मुझे उर्दू के शेर बताया करते थे जिन्हें मैं काफी पसन्द करता था और अपनी डायरी में लिख लेता था। अलीम खाँ के साथ प्यार की एक बहुत बड़ी दुर्घटना हो गयी थी। एक लड़की ने उसे धोखा दे दिया था। उस सदमे से वह 3-4 माह तक बीमार रहा था, लेकिन बाद में समय ने सारे घावों को भर दिया। मैं उसके इस प्यार का राजदार था। उसने एक-एक बात मुझे बतायी भी और प्रायः मैं अपनी समझ के अनुसार उसे सलाह दिया करता था। मैं दिल से चाहता था कि उसकी शादी उसकी महबूबा से हो जाय, लेकिन ‘मेरे मन कछु और है, कर्ता के कछु और’। आज इन दोनों के बारे में ही मुझे कुछ पता नहीं है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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