आत्मकथा भाग-1 अंश-35
जूनियर हाईस्कूल में पहुँचने पर मेरे कुछ अन्य नये मित्र बने जो दूसरे गाँवों के थे, क्योंकि उस स्कूल में तीन गाँवों के छात्र पढ़ने आया करते थे। मुझे कुछ के नाम याद है - महेश चन्द्र अग्रवाल, राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता, धर्मवीर सिंह, निन्नू राम आदि। इनमें से पहले दो पास के गाँव गोठा के सेठों के लड़के थे, तीसरे धर्मवीर सिंह उसी गाँव के एक जमींदार श्री हुब्ब लाल के सुपुत्र थे और निन्नूराम नगला विधी के एक जाटव परिवार के होनहार उत्तराधिकारी थे। निन्नूराम पढ़ने में बहुत तेज था और मेरे साथ उसकी नियमित होड़ चलती रहती थी, जिसमें प्रायः मैं जीत जाता था। लेकिन उसका स्वभाव बहुत अच्छा था, जबकि मेरा स्वभाव बस ऐसा ही था। स्वाभाविक रूप से सारे अध्यापक उसे बहुत पसंद करते थे। पहले हम काफी अच्छे दोस्त थे। आगे भी हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ, लेकिन कुछ ईर्ष्यालु लोगों द्वारा पैदा की गयी गलतफहमी से वह भी मुझसे कटा-कटा रहने लगा था। फिर भी मुझे खुशी है कि हम दोनों ही कक्षा 8 की बोर्ड की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुये थे। मेरे अंक उससे दो-चार ही ज्यादा थे। लेकिन गरीबी उसके भविष्य में बाधक बन गयी। उसने शायद पाॅलीटेक्निक में डिप्लोमा किया था और आजकल कहीं नौकरी पर है।
महेश चन्द्र अग्रवाल और राजेन्द्र सिंह सदा मेरे अच्छे दोस्त रहे वे दोनों पास के गाँव गोठा के रहने वाले थे। दोनों पढ़ने में औसत ही थे, लेकिन पास हो जाते थे। मैं पढ़ाई में उनकी मदद किया करता था और बदले में वे भी तरह-तरह से मेरी मदद किया करते थे। उनकी वजह से कक्षा में मुझे कभी अकेलापन महसूस नहीं होता था। आजकल वे अपने गाँव में ही शायद व्यापार किया करते हैं। वे कक्षा 8 से आगे शायद नहीं पढ़ सके।
उसी गाँव के धर्मवीर सिंह के साथ मेरे सम्बन्ध विचित्र प्रकार के थे। कभी तो हमारे सम्बन्ध इतने मधुर रहते थे कि दूसरों की ईष्र्या के पात्र बनते थे और कभी इतने कटु हो जाते थे कि मारपीट तक की नौबत आ जाती थी। इसका कारण हम दोनों का ही अपना-अपना स्वभाव था वह एक बहुत ही धनी किसान के दो लड़कों और आठ लड़कियों में सबसे छोटा था और मैं अपेक्षाकृत एक मामूली दुकानदार का चार लड़कों और दो लड़कियों में सबसे छोटा लड़का था। वह पढ़ने में उतना तेज नहीं था, परन्तु अपनी सम्पन्नता और कुलीनता पर गर्व करता था। मैं उतना सम्पन्न न होते हुए भी अपनी प्रतिभा पर गर्वित था और काफी स्वाभिमानी था। दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्वों के टकराव ने ही हमारे सम्बन्ध विचित्र प्रकार के बना दिये थे। मारपीट में प्रायः मैं ही हार जाता था फिर भी मैं मन से कभी नहीं हारता था। मेरे दूसरे दोस्त और उसके भी दोस्त मिलकर बार-बार हमारा मेल करा देते थे। लेकिन शीघ्र ही कोई न कोई ऐसी घटना हो जाती थी कि हमारा फिर झगड़ा हो जाता था और बोलचाल तक बन्द हो जाती थी।
लेकिन यह भी सत्य है कि हम दोनों मन से एक दूसरे को काफी चाहते थे। वह काफी सुन्दर लगता था जबकि मैं अपने बाहर निकले दाँतों की बजह से अच्छा दिखायी नहीं पड़ता था। फिर भी मैं अपनी प्रतिभा के बल पर अध्यापकों और छात्रों में समानरूप से लोकप्रिय था। इसी बात पर वह मुझसे ईर्ष्या रखता था जो कि स्वाभाविक भी है। इसका एक कारण और था। मैं उस स्कूल में पढ़ने वाली सभी लड़कियों में भी, जो मुझे भाई की तरह मानती थीं, काफी लोकप्रिय था। इनमें धर्मवीर की एक बड़ी बहन भी थी।
उसका नाम था ‘सत्यवती’। वह मुझसे एक कक्षा आगे पढ़ती थी, लेकिन मुझे बहुत प्यार करती थी। गाँव के नाते से उसके पिताजी मेरे बाबा लगते थे, इसलिए मैं उससे ‘बुआ’ कहकर बोलता था, इस हिसाब से मुझे धर्मवीर को ‘चाचा’ कहना चाहिए था, परन्तु नहीं कहता था। इस बात पर वह मुझसे बहुत नाराज होता था। शुरू के एक-दो वर्ष हमारे सम्बन्ध कटु रहे, लेकिन कक्षा-8 में जाकर काफी सुधर गये थे। प्रायः हम एक दूसरे के घर भी जाने लगे थे और मुझे याद है कि एक दिन मैंने उसके घर खाना भी खाया था।
गाँव की पढ़ाई समाप्त करने के बाद हमारी मुलाकातें बहुत कम हो गयी थीं। सत्यवती बुआ हमें प्रायः आते-जाते अपने गाँव के कुएँ पर मिल जाती थी, लेकिन शीघ्र ही उसकी शादी हो गयी थी। उसके बाद उसे देखना मेरे लिए सम्भव नहीं हुआ। लेकिन धर्मवीर एक-दो बार और भी दिखायी पड़ा। अब उसकी शादी भी हो चुकी है और शायद दो-तीन बच्चे भी हैं।
हाईस्कूल और इण्टर में पढ़ने आगरा आने के बाद गाँव के दोस्त पीछे छूट गये थे। लेकिन आगरा में भी नये दोस्त ज्यादा नहीं मिले। हम प्रारम्भ में जिस मुहल्ले में रहते थे- नयाबाँस, लोहामंडी, आगरा- वहाँ मेरी दृष्टि में एक भी लड़का ऐसा नहीं था, जिससे मित्रता की जा सके। ज्यादातर लड़के आवारा घूमने, कंचा-गोली खेलने, गाली-गलौज करने तथा मारपीट करने वाले थे, जिनसे मेरी पटरी बैठना मुश्किल था। यों कंचा-गोली मैं भी खेलता था, मगर ज्यादा सम्बन्ध मेरा उनके साथ कभी नहीं रहा। कक्षा के ज्यादातर लड़कों से भी मेरे सम्बन्ध नाम मात्र के थे। उनकी निगाह में मैं गाँव का गँवार, जिसे नेकर तक बाँधना नहीं आता था, जबकि वे तथाकथित बड़े आदमियों की औलादें थीं। उस पर तुर्रा यह कि मैं जरूरत से ज्यादा स्वाभिमानी था और उनका बड़प्पन भी स्वीकार नहीं करता था। वे मेरी सादगी और सरलता से घृणा करते थे। जबकि मैं उनकी फैशनपरस्ती और हीरोपन का मजाक बनाता था। मुझे याद है कि कई लड़कों के बैल-बाॅटम (एक तरह की पतलून) को मैं ‘सलवार’ कहा करता था और उनकी टी-शर्ट को ‘कुर्ती’। ऐसी हालात में जो हो सकता था वही हुआ, यानी मैं उनमें से ज्यादातर से कटा-कटा ही रहा। यद्यपि गणित आदि विषयों में मैं सबसे आगे रहता था और उनकी ईर्ष्या का पात्र बनता था।
फिर भी कई ऐसे लड़के भी थे, जो काफी सहृदय थे और मेरे साथ मित्रता का बर्ताव करते थे। बहुत बार वे मेरी सहायता भी करते थे। उनमें से कई के नाम मुझे याद हैं- राघवेन्द्र सक्सेना, अशोक कुमार शर्मा, मुन्ना लाल, भीम सिंह, विनय मेहरा, प्रणवीर सिंह, राजेन्द्र गौतम, संजय, राकेश चतुर्वेदी, अनुपम कुमार, लक्ष्मण दास आदि। बहुतों के नाम भी मैं भूल गया हूँ। इनमें से कई लोग बहुत विलक्षण थे।
विनय मेहरा परीक्षा में सदा अव्वल रहने वाला छात्र था। यों कक्षा में वह भौंदुओं की तरह बैठा रहता था। एक बार जब वह सबसे ज्यादा अंक लाकर कक्षा में प्रथम रहा तो, श्री के.डी. माहेश्वरी ने टिप्पणी की थी- ‘मैं तो समझता था कोई गधा बैठा है।’ यद्यपि वह परीक्षाओं में सबसे ज्यादा अंक ले आता था, लेकिन यह सिर्फ उसकी रटने की क्षमता का प्रमाण होता था। गणित की नयी समस्यायें हल करना उसके बूते के बाहर की बात थी। उसकी स्मरण शक्ति परीक्षा के दिनों में तेज हो जाती थी, लेकिन उसके बाद सब कुछ भूल जाता था। क्रिकेट खेलने में वह बहुत अच्छा था, और बाकी मामलों में सिफर अर्थात् शून्य। एक बार हमारी कक्षा 7 के लड़कों से अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता हो गई, तो हमारी कक्षा के कई लड़के बोल रहे थे, मैं खुद 4-5 बार बोला, लेकिन वह उल्लुओं की तरह चुपचाप बैठा रहा।
लेकिन वह बहुत सीधा था और केवल इसी वजह से सब लोग उसे पसंद करते थे। मेरा वह बहुत अच्छा साथी था और हम प्रायः साथ-साथ बैठा करते थे। हाईस्कूल में वह 75 प्रतिशत से ज्यादा अंक लाकर सम्मान सहित उत्तीर्ण हुआ तथा इण्टर में भी ऐसा ही हुआ। उसके बाद वह शायद इंजीनियरिंग का कोर्स करने चला गया। आजकल कहीं इंजीनियर बन गया होगा।
मुन्ना लाल पढ़ने-लिखने में मामूली ही था, लेकिन खेलकूद विशेष कर दौड़ में पूरे काॅलेज में सबसे आगे रहता था। कई बार वह पुरस्कार जीतकर लाता था। वह हमारी कबड्डी टीम का कप्तान भी था और कई बार केवल अपने बल पर टीम को जिता लाता था। इण्टर करने के बाद वह भी मेरे साथ सेंट जाॅह्न्स काॅलेज में बी.एससी. करने आया, लेकिन बीच में ही कृषि में डिप्लोमा करने बिचपुरी चला गया था। उसके बाद उससे मुलाकात नहीं हुई। आजकल कहीं नौकरी से लगा होगा।
राजेन्द्र गौतम मेरे विज्ञान के प्रयोगों का साथी था। फक्कड़पन में कक्षा में सबसे आगे था, अपने बालों में कभी कंघा नहीं करता था। वह मुझे बहुत प्यार करता था और काफी बातें भी करता था। लड़के प्रायः उसे ‘सूरदास’ कहकर चिढ़ाया करते थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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