आत्मकथा भाग-1 अंश-34

अध्याय-8 : मेरे हमदम मेरे दोस्त
दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं।
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए।।
मैं उन लोगों को अत्यधिक सौभाग्यशाली मानता हूँ, जिन्हें सच्चे मित्र प्राप्त होते हैं। यद्यपि मैं भाग्य वगैरह में विश्वास नहीं करता। मेरा यह मानना है कि आज का पुरुषार्थ ही कल का प्रारब्ध है। फिर भी कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिनकी कोई संतोषजनक व्याख्या हम नहीं कर सकते। सच्चे मित्र का मिलना या न मिलना भी इसी तरह की एक घटना है। इसका अर्थ यह नहीं कि सच्चे मित्र की प्राप्ति में अपना कोई हाथ नहीं होता। अवश्य ही हम उसमें एक महत्वपूर्ण भाग अदा करते हैं, क्योंकि बहुत से लोग यह मानते हैं कि मित्र बनाना भी एक कला है और जो लोग इस कला में निपुण होते हैं, उन्हें सच्चे मित्र मिल भी जाते हैं।
लेकिन मैं यह नहीं मानता। मेरा विचार यह है कि यदि हम मित्र बनाने की कला अर्थात् दूसरों को प्रभावित करने की कला में पारंगत हैं, तो हमें भले ही तात्कालिक मित्र बड़ी मात्रा में मिल जायें, लेकिन सच्चे मित्र मिलना फिर भी मुश्किल है। सच्चे मित्र मिलना केवल संयोग की बात नहीं, बल्कि इसमें दैवीय हाथ भी होता है। इसे ही आप भाग्य कह सकते हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि कोई व्यक्ति भले ही दूसरों को प्रभावित करने की कला में कच्चा हो, लेकिन उसके भी कुछ सच्चे मित्र होते हैं, वरना ज्यादातर लोग (दोस्त) मित्र स्वार्थी होते हैं। उनकी मित्रता केवल तभी तक रहती है जब तक उनका कोई उद्देश्य सिद्ध होता हो। यदि उनका मतलब पूरा हो गया है, तो उनकी मित्रता की अवधि भी पूर्ण हो जाती है। ऐसे मित्र संकट के समय अवश्य साथ छोड़ जाते हैं। किसी ने कहा है-
बन जाते हैं सैकड़ों दोस्त जो जर पास होता है।
टूट जाता है गरीबी में जो रिश्ता खास होता है।।
और
हमें भी आ पड़ा है दोस्तों से कुछ काम, यानी।
हमारे दोस्तों के बेवफा होने का वक्त आया।।
आदमी एक सामाजिक जानवर है। समाज में होने वाली घटनाओं का व्यक्ति के ऊपर प्रभाव पड़ना अनिवार्य है। इसलिए किसी भी व्यक्ति की जिन्दगी में सुख और दुःख आते ही रहते हैं। सुख के समय सैकड़ों लोग परिचित-अपरिचित खुशियाँ बाँटने के लिए आ जाते हैं। लेकिन सच्चे दोस्त वही होते हैं जो सुख या दुःख दोनों अवस्थाओं में साथ बने रहते हैं। संकट का समय ही वह समय होता है जब हम स्वयं को और अपने मित्रों को भी परख सकते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-
धीरज धरम मित्र अरु नारी।
आपत काल परखिये चारी।।
कविवर रहीमदास जी ने यही बात और सुन्दर शब्दों में कही है-
रहिमन विपदा हू भली जो थोरे दिन होय।
हित-अनहित या जगत में जान परत सब कोय।।
मैं इस मामले में स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ। मुझसे यद्यपि कुछ तथाकथित मित्र ईर्ष्या के कारण मुझसे दुश्मनी-सी मानते थे, लेकिन मेरे दोस्तों में अधिकतम संख्या उन लोगों की है, जिन्होंने मुझे भरपूर प्यार दिया, सुख में मुझे घमंडी न होने दिया, दुःख में मेरे साथ सहानुभूति जताई और संकट के समय यथाशक्ति सहायता दी और हौसला बढ़ाया। आज मैं जो कुछ हूँ उसमें एक बड़ा हाथ मेरे दोस्तों का भी है, जिन्होंने कभी मुझे यह महसूस नहीं करने दिया कि मैं इस दुनिया में अभिशप्त जिन्दगी जी रहा हूँ या अकेला हूँ। आज जब मैं अपने सभी मित्रों को स्मरण करने बैठा हूँ, तो सैकड़ों नाम मेरी स्मृति में आ-जा रहे हैं। मगर अफसोस, उनमें से अधिकतर आज मुझसे दूर हैं और ज्यादातर के बारे में मुझे यह भी पता नहीं कि आजकल वे कहाँ हैं। हो सकता है कि बहुतों के मैं नाम भी भूल गया होऊँ।
शुरू से ही शुरू करूँ, तो मेरी स्मृति में ऐसे कई चेहरे आते हैं, जिनके साथ मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ा करता था। उनमें ज्यादातर के नाम भी मैं भूल गया हूँ। सिर्फ एक नाम मुझे याद है- राम प्रसाद। वह हमारे गाँव का ही जाटव जाति का लड़का था। यह जाति हरिजनों में गिनी जाती है। लेकिन हमारी मित्रता पर जातिभेद का कोई प्रभाव नहीं था। यद्यपि हम एक दूसरे के घर नहीं आते जाते थे, परन्तु कक्षा में हम सदा साथ रहते थे। मैं पढ़ने में तेज था, लेकिन अन्य मामलों में बहुत लापरवाह था। बहुत बार मैं कलम, स्याही या खड़िया भूल जाता था। ऐसे समय में रामप्रसाद ही मेरे काम आता था। उसका हस्तलेख कक्षा में सबसे अच्छा था, जबकि मेरा हस्तलेख इसके ठीक विपरीत था। उसका स्वभाव भी बहुत अच्छा था। हमारी मित्रता कक्षा 5 तक चली। वह यद्यपि पढ़ने में बहुत होशियार नहीं था, फिर भी पास होने लायक अंक ले आता था। कक्षा 5 पास करने के बाद वह पढ़ने से बैठ गया था, जैसा कि प्रायः सभी गरीब छात्रों को करना पड़ता है। बाद में वह गाँव में ही मजदूरी करने लगा था और आजकल भी यही कार्य करता है। गाँव जाने पर कभी-कभी उससे मुलाकात होती है। लेकिन हम उस तरह मिलजुल नहीं पाते, जिसे अंग्रेजी में फ्रेंक कहा जाता है। हमारी सामाजिक स्थितियों का अन्तर ही इसका कारण है।
प्राइमरी में मेरे दो-तीन मित्र और थे- निहाल सिंह, देवेन्द्र सिंह और रमेश चन्द्र। निहाल सिंह और रमेश चन्द्र किसानों के लड़के थे और देवेन्द्र सिंह एक वैद्य जी का। हम चारों तथा एक दो अन्य लड़कों को मिला कर कक्षा का वह समूह बनता था, जिसे अंग्रेजी में फ्रंट लाइनर्स अर्थात् आगे की सीटों पर बैठने वाले कहा जाता है। हमारा समूह पढ़ने में तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में सबसे आगे रहता था। हम प्रायः स्कूल से एक साथ ही खेतों की तरफ घूमने जाया करते थे, जब कक्षा में कोई खास काम नहीं होता था। मेरी तरह देवेन्द्र सिंह भी पढ़ने में काफी तेज था और हम दोनों प्रायः बराबर कद काठी के थे। हमारी मित्रता आदर्श मानी जाती थी। केवल एक बार हम दोनों में गंभीर रूप से झगड़ा हुआ। बात शायद मामूली थी। लेकिन तीन-चार दिन तक हम एक दूसरे से खिंचे खिंचे रहे। फिर हमारे सम्बन्ध शीघ्र ही पहले जैसे हो गये। मगर मुझे दुःख है कि जूनियर हाईस्कूल में पहुँचने पर कुछ अन्य व्यक्तियों के कारण इन तीनों और मेरे बीच में कुछ गलतफहमी हो गयी और हमारे संबन्ध उस श्रेणी के नहीं रह गये। यद्यपि व्यक्तिगत रूप में हमारे बीच में कोई समस्या नहीं थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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