आत्मकथा भाग-1 अंश-33

वह दिन हमारे पृक्टीकल का था। इन्स्टीट्यूट में पानी नहीं था और हम प्यासे ही पृक्टीकल करते जा रहे थे। पृक्टीकल साढ़े चार बजे समाप्त होता था। पृक्टीकल समाप्त करके हम चलने लगे। कल्पना का घर दूसरी तरफ था। अतः वह जल्दी चली। तभी मेरे पास से एल.यू. विजयकुमार गुजरा। मैंने उससे पूछा कि क्या यहाँ आसपास कहीं पीने का पानी है। उसने कहा कि है। तब मैंने कल्पना को आवाज देकर रोका। उसने कहा- ‘क्या है?’। मैंने पूछा- ‘पानी पीओगी?’ उसने समझा कि मैं उससे मजाक कर रहा हूँ। अतः कुछ गुस्से में बोली- ‘तुम्हारा दिमाग खराब है।’ उसका चेहरा प्यास के कारण एकदम लाल पड़ गया था और वह बहुत प्यासी लग रही थी। मैंने कहा- ‘गुस्सा मत करो, एल.यू. कह रहा है कि बगल वाले इन्स्टीट्यूट में पानी है।’
उसे मेरी बात का विश्वास नहीं आया। फिर शायद उसने सोचा कि देख लेने में कोई हर्ज नहीं है। अतः हम तीनों उस संस्थान में गये। वहाँ मैंने कूलर की टोंटी दबाई और पानी निकलने पर कल्पना ने हाथ लगाकर देखा कि पानी ठंडा है। तुरन्त उसने अपना हैंड बैग और किताबें मुझे पकड़ायीं और पानी पीने लगी। जी भरकर उसने पानी पिया। उसका चेहरा, जो प्यास के कारण एकदम लाल हो गया था, अब काफी सौम्य लग रहा था। उस समय मुझे जितनी खुशी हुई उसे शब्दों में नहीं बता सकता। फिर मैंने भी खूब पानी पिया और अन्त में एल.यू. ने पिया। तब हम अपने अपने रास्ते चले गये।
कल्पना के साथ मेरा एक अन्य अनुभव बहुत विलक्षण रहा, जो हालांकि मुझे लिखना नहीं चाहिए, लेकिन मैं लिखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। हुआ यह कि एक दिन हम कक्षा में लहरी साहब का इन्तजार कर रहे थे। तभी कल्पना ने हमसे कहा कि आज क्लास छोड़ दो। दानी तुरन्त तैयार हो गया, लेकिन मैंने मना कर दिया। कल्पना ने फिर कहा और मैंने फिर मना कर दिया। तो उसने कुछ गुस्से में और कुछ शरारत से मेरी तरफ आँखें निकालकर देखा। उसका इरादा शायद मुझे नर्वस करने का था। मैंने भी उसकी आँखों में आँखें डाल दीं। कल्पना उस समय धीमे-धीमे कुछ शरारत से और कुछ प्यार से मुस्करा रही थी और कुछ गुस्से में मेरी आँखों में देख रही थी। मुझे उस समय ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी आँखों में सारी दुनिया समा गयी हो। हम एक दूसरे की आँखों में आँखें डालकर लगभग 2 मिनट तक खड़े रहे। उस समय दानी चला गया था, केवल एल.यू. पास में खड़ा था।
कल्पना मुझे डराकर मेरी नजरें झुकाना चाहती थी। लेकिन मैंने भी तय कर लिया था कि नजरें झुकानी नहीं हैं, क्योंकि मुझे उसकी आँखों में देखने में बहुत आनन्द आ रहा था। आखिर उसी को अपनी नजरें झुका लेनी पड़ी और फिर वह तुरन्त चली गयी। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी सारी ताकत समाप्त हो गयी हो। लहरी साहब तब तक आये नहीं थे। मेरा मन अब पढ़ने में लगने का प्रश्न ही नहीं था। अतः मैं भी उसी समय घर चला गया।
मुझे उस अनुभव में इतना आनन्द आया था कि मेरी इच्छा होती थी कि उसकी आँखों में आँखें डालकर ही बैठा रहूँ। बाद में कई बार जब हम दोनों में मामूली सी भी बहस हो जाती थी तो मैं उससे आँखें मिलाने की कोशिश करता था, लेकिन वह तुरन्त अपनी नजरें हटा लेती थी। बाद में मुझे वैसा मौका कभी नहीं मिला। लेकिन कल्पना मुझे तंग करने और मेरा मजाक बनाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देती थी। ऐसे ही एक दिन जब उसकी शरारतों से तंग आकर मैंने कहा था- ‘कल्पना, अब तुम बहुत शरारतें करने लगी हो’, तो वह आँखें नचाती हुई बोली थी- ‘संगत का असर है।’
इसी तरह के खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ हमारा समय गुजर रहा था। अब हमारा एम.स्टेट. का कोर्स पूरा होने को था। मुझे चिन्ता होती थी कि कल्पना का साथ छूट जाने पर मेरा मन कैसे लगेगा। एक बार मैंने उससे कहा- ‘कल्पना, चलो इस बार हम दोनों फेल हो जायें, जिससे हम एक साल और साथ-साथ पढ़ लेंगे।’ लेकिन उसने इसे बकवास बताकर मना कर दिया।
कल्पना से मैं आखिरी बार तब मिला था, जब हम अपनी प्रोजेक्ट की मौखिक परीक्षा देने गये थे। उस दिन मैंने उसे दो गुलाब के फूल दिये थे, जिन्हें उसने शायद मेरा मन रखने के लिए स्वीकार कर लिया था। मेरी मौखिक परीक्षा सबके बाद थी, फिर भी वे दोनों बैठे रहे थे। परीक्षा समाप्त होने के बाद ही हम अपने-अपने घर गये थे।
उसके बाद मैं दिल्ली पढ़ने चला गया। वहाँ से मैंने उसे एक पत्र लिखा था जिसमें मैंने उससे उसके कुल अंक पूछे थे और कुछ सामान्य बातें भी लिखी थीं। मेरे विचार से उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसे आपत्तिजनक कहा जा सके। लेकिन जाने क्यों उसने जबाब देना तो दूर रहा, मेरे पत्र को ही ज्यों का त्यों वापस कर दिया। उसके इस कार्य से मुझे काफी दुःख हुआ, फिर भी मैंने उसे सहन कर लिया। इस घटना के बाद कल्पना मुझे एक-दो बार आगरा में दिखाई पड़ी। लेकिन मैंने जानबूझकर उससे बातें नहीं कीं। मैं जानता था कि मैं उसके प्रति अन्याय कर रहा हूँ। लेकिन मैं नाराज इसलिए था कि उसने मुझे गलत समझा। बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि उसने किसी व्यापारी लड़के से शादी कर ली है। आजकल वह शायद आगरा में ही है। मुझे अभी भी उसकी बहुत याद आती है। वह मेरी समस्त सहपाठिनियों में अकेली थी, जिसकी मैं सच्चे दिल से इज्जत करता था और शायद प्यार भी करता था। दिल्ली में पढ़ते हुए मैंने उसके ऊपर एक कविता भी लिखी थी, जिसे यहाँ देने से स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूँ-
तुम एक कुड़ी थीं
फिर भी तुम कुड़ियों से कितनी अलग थीं।
तुम वह तालाब नहीं
जिसमें
कोई भी जाकर डुबकी लगा लेता है,
जो तुम्हारे दिल की
गहराइयों की थाह पा सके,
ऐसा कोई गोताखोर नहीं।
तुम्हारे चेहरे की एक झलक और
मोती से दाँतों की चमक से घायल होकर
मैं
तुम्हारी खनकती हुई हँसी में डूबता चला गया।
लेकिन
समय के तूफान ने
मुझे किनारे पर लाकर पटक दिया
तुमसे दूर - बहुत दूर -
जहाँ से लौटना बहुत मुश्किल है!!
कल्पना जैसी सहपाठिनी को पाकर मैं स्वयं को बहुत भाग्यशाली मानता था, क्योंकि उसी इंस्टीट्यूट में बहुत से लड़के उसके मुँह से दो शब्द सुनने के लिए भी तरसा करते थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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