आत्मकथा भाग-1 अंश-32
तीसरे और चौथे सत्र में हमें एक परियोजना (प्रोजेक्ट) पर काम करना था, जिसका उद्देश्य था अभिवृत्ति (Attitude) अर्थात धारणा मापकों का निर्माण। इसमें किसी विषय के बारे में सैकड़ों संभावित प्रश्नों में से एक विशेष तकनीक से कुछ प्रश्नों को छाँटकर एक प्रश्नावली तैयार की जाती है। उस प्रश्नावली के उत्तर किसी व्यक्ति से माँगे जाते हैं, जिसकी अभिवृत्ति को मापना होता है। उसके उत्तरों से यह पता लगाया जाता है कि वह व्यक्ति उस वस्तु या विषय के प्रति कैसी धारणा रखता है- सकारात्मक या नकारात्मक।
कल्पना, दानी और मैं- तीनों ने मिलकर यह प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक किया। हालांकि हमने इस पर ज्यादा मेहनत नहीं की थी। लेकिन यह डा. सेठी के मार्गदर्शन का ही परिणाम था कि कुल मिलाकर हमारा प्रोजेक्ट अच्छा रहा। कल्पना और दानी दोनों ने अपनी-अपनी रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखीं। मैं प्रारम्भ से ही अंग्रेजी विरोधी और हिन्दी समर्थक रहा हूँ। अतः मैंने एक नया कार्य करने के इरादे से अपनी रिपोर्ट हिन्दी में ही लिखने की इच्छा व्यक्त की। उस संस्थान में यह बड़े साहस, बल्कि दुस्साहस की बात थी कि सांख्यिकी जैसी विषयों की प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिन्दी में लिखी जाय। लेकिन मेरे सौभाग्य से डा. सेठी ने मुझे इसकी इजाजत दे दी और मैंने हिन्दी में लिखकर अपनी परियोजना का प्रतिवेदन जमा भी कर दिया।
तीसरे और चौथे सत्र में भी हमारा प्रदर्शन काफी अच्छा रहा, लेकिन कल्पना कुछ अंकों से ही प्रथम श्रेणी लाने से रह गयीं। कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में मेरे अंक 150 में से 124 थे जो कि उस समय तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। मुझे मालूम नहीं यदि किसी ने अब यह रिकार्ड तोड़ दिया हो।
एम.स्टेट. में मेरे कुल अंक थे 71.5 प्रतिशत, जो कि काफी संतोषजनक हैं। यद्यपि ये बहुत ज्यादा नहीं है और न इनसे किसी की सही योग्यता का पता चलता है। हाँ कभी-कभी हम अंकों से कुछ अनुमान अवश्य लगा सकते हैं, यद्यपि अनुमान सही होने की कोई गारन्टी नहीं है।
वास्तव में मैंने यह अनुभव किया है कि परीक्षा में प्राप्त किये गये अंक किसी को योग्यता का सही परिचायक नहीं होते। कई बार मैंने यह देखा है कि एक छात्र जो परीक्षा में औसत या औसत से कुछ ऊपर रहता है, बुद्धि और योग्यता में औसत से काफी अधिक होता है। उनमें मौलिक सूझबूझ और समस्याओं को हल करने का गुण (जिसे अंग्रेजी में कहते हैं- Trouble shooting) बहुत अधिक मात्रा में होता है। इसके विपरीत, कई छात्र जो परीक्षाओं में बहुत अधिक अंक लाया करते थे, वास्तव में बहुत औसत दर्जे के थे। उनमें मौलिक चिन्तन नाम मात्र को भी नहीं था और वे केवल पढ़ाये हुए को रटने में श्रेष्ठ थे। ऐसे लोगों को हम प्रायः ‘रट्टू तोता’ कहा करते थे। कक्षा में वे शायद ही कभी वाद-विवाद में भाग लेते होंगे। लेकिन उनकी याददाश्त काफी अच्छी होती थी। कहने का मतलब यही है कि परीक्षा के अंक किसी की योग्यता का सही परिचय नहीं देते। बुद्धि और ज्ञान में बहुत अन्तर है। हमारी शिक्षा और परीक्षा प्रणाली की यह एक बिडम्बना है कि हम छात्रों की बुद्धि के बजाय उनके ज्ञान की ही परीक्षा लेते हैं।
एम.स्टेट के दौरान के दो वर्ष मेरी जिन्दगी के सर्वश्रेष्ठ वर्षों में से हैं। उन दिनों मैं हवा में उड़ा करता था। अपनी सफलताओं के कारण मुझमें अत्यधिक आत्मविश्वास और कुछ मात्रा में घमंड भी पैदा हो गया था। बी.एससी. के विपरीत एम.स्टेट में हमारी सहपाठिनी कल्पना कपूर मुझसे खूब बातें किया करती थी। खास तौर से तीसरे और चौथे सत्र में हम बहुत नजदीक आ गये थे। हम केवल तीन व्यक्ति कक्षा में थे, अतः बातें करने का मौका भी खूब मिला करता था।
खाली समय में हम घंटों बातें किया करते थे। जिनका विषय राजनीति से लेकर शेरो-शायरी तक होता था। मेरा सामान्य ज्ञान अच्छा था ही, सौभाग्य से कल्पना का सामान्य ज्ञान भी बहुत विस्तृत था। मुझे शेरो-शायरी में काफी रुचि बचपन से ही है। हजारों शेर मुझे याद रहते हैं। कल्पना को शेर सुनना बहुत पसन्द था। कई बार वह मुझसे शेर सुनाने का आग्रह किया करती थी और पसन्द आने पर ‘वाह! वाह!!’ करने लगती थी।
राजनीति में हमारा प्रायः मतभेद रहता था। मैं राष्ट्रवादी विचारधारा का होने के कारण जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थक था, जबकि वह कांग्रेस समर्थक थी। फिर भी हमारी बहस में कटुता नहीं आ पाती थी। केवल एक बार ऐसा हुआ जब मुझे कल्पना पर बहुत क्रोध आया था। उस समय श्री जय प्रकाश नारायण की चर्चा चल रही थी। शायद उन्हीं दिनों उनका देहान्त हुआ था। मैं जय प्रकाश जी में बहुत श्रद्धा रखता था, जबकि कल्पना उनकी आलोचना करती थी। एक बार उसने आलोचना करते-करते कहा कि जे.पी. पैसे खाता है। इसी बात पर मुझे बहुत गुस्सा आया। जय प्रकाश जी जैसे त्यागी महापुरुषों के बारे में ऐसा सोचना तक पाप है।
यह हमारे लिये पहला और आखिरी मौका था, जब मुझे वास्तव में उसके ऊपर गुस्सा आया था। वैसे मामूली बातों पर नोंक-झोंक चलती रहती थी, जो तुरन्त ही समाप्त भी हो जाती थी। उसके संग की वजह से मेरा मन उस संस्थान में खूब लगता था और इच्छा होती थी कि बस यहीं बैठे उससे बातें करता रहूँ। लेकिन तमाम खुलेपन के बाबजूद कल्पना हमसे सदा एक तरह की दूरी बनाये रखती थी। उसने कभी भी हमारे साथ किसी दिन चाय तक नहीं पी। जब कभी भी मैंने उससे चाय पीने का प्रस्ताव किया, उसने इन्कार कर दिया। केवल एक बार उसने चाय पीने का मेरा प्रस्ताव स्वीकार किया था। उस दिन जब हम आखिरी बार मिले थे और हम प्रोजेक्ट की मौखिक परीक्षा दे रहे थे। मगर मेरा दुर्भाग्य कि उस दिन चाय की दुकान बन्द थी। हाँ उस दिन कल्पना ने मेरे हाथ से गुलाब के दो फूल अवश्य ले लिये थे। हुआ यह था कि मौखिक परीक्षा से पहले मैं किसी कार्यवश यूनीवर्सिटी के होस्टल गया था। वहाँ से आदतन मैं गुलाब के दो अच्छे-अच्छे फूल तोड़ लाया था। इससे पहले जब कभी मैंने कल्पना को फूल देने की कोशिश की थी, उसने साफ मना कर दिया था। लेकिन उस दिन उसने मेरे हाथ से फूल ले लिया। शायद मुझे संतुष्ट करने के लिए, क्योंकि वह जान गयी थी कि आज हमारे मिलने का आखिरी दिन है। उस दिन मुझे काफी खुशी हुई थी।
कल्पना ने हमारे साथ चाय भले ही कभी न पी हो, लेकिन पानी हम रोज ही साथ-साथ पिया करते थे। मेरे संतोष के लिए वही काफी था। उन दिनों हमेशा की तरह गर्मियों में पानी की किल्लत हो गयी थी। कई बार ऐसा हुआ कि इंस्टीट्यूट में एक बूँद भी पानी नहीं मिलता था और हमें घंटों प्यासे रह जाना पड़ता था। हम प्रायः पास की किसी कैन्टीन में जाकर प्यास बुझा लेते थे, लेकिन कल्पना को कैन्टीन के नाम से ही चिढ़ थी। शायद इसीलिए वह हमारे साथ कभी चाय पीने नहीं गयी। अतः उसके पीने लायक पानी की खोज मुझे करनी पड़ती थी। उसकी प्यास बुझाकर मुझे बहुत खुशी होती थी। ऐसा ही एक दिन था जब मुझे अत्यधिक संतोष हुआ था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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