आत्मकथा भाग-1 अंश-31
अब हमारी कक्षा में केवल तीन व्यक्ति रह गये थे- मैं, अरुणपाल दानी और कल्पना कपूर। वैसे एक चौथे श्रीमान् भी थे- श्री मलिक, जो हमसे एक साल सीनियर थे। उनका नियम एक साल में एक सेमिस्टर उत्तीर्ण करने का था। हमारे चले आने के दो साल बाद ही वे ‘सज्जन’ एम.स्टेट. पूर्ण कर पाये। लेकिन आजकल वे एक बहुत अच्छी पोस्ट पर हैं।
तृतीय सेमिस्टर में हमारा एक विषय तो नाॅन-पैरामीट्रिक स्टेटिस्टिक्स था, जिसे श्री एम.पी. गौतम पढ़ाते थे। दूसरा विषय हमारे लिए ऐच्छिक था और उसका चुनाव हमें स्वयं करना था। उस समय हमारे सामने दो विकल्प थे- ‘आपरेशन्स रिसर्च’ तथा ‘कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग’, जिन्हें क्रमशः डाॅ. सेठी और श्री लहरी पढ़ाते थे। हम बहुत ही दुविधा में थे कि कौन सा विषय लिया जाये। एक दिन हमने दोनों से निवेदन किया कि वे अपने-अपने कोर्सों के बारे में बतायें। डाॅ. सेठी ने बताया कि आपरेशन्स रिसर्च काफी सरल विषय है और हम चाहें तो स्वयं किताबें पढ़कर समझ सकते हैं। श्री लहरी ने बताया कि कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भी सरल है, लेकिन उसमें कौशल (एप्टीट्यूड) की आवश्यकता होती है तथा नौकरी आदि के लिए भी यह बेहतर है।
स्वाभाविक रूप से मेरी इच्छा कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग लेने की ही थी, लेकिन मैं डर इसलिए रहा था कि पिछले साल जो सात लड़के इस विषय को पढ़ रहे थे, वे सबके सब इसमें फेल हो गये थे। मैं सोच रहा था कि यह न जाने क्या बला है। अन्ततः मैंने यही विषय लेना तय किया, क्योंकि चुनौतियों को स्वीकार करना मेरी आदत ही नहीं, शौक भी है। मेरे साथ केवल दानी ने ही यह विषय लिया और कल्पना के साथ पिछले साल के फेल होने वाले छात्रों ने भी आपरेशन्स रिसर्च को पसन्द किया।
शीघ्र ही मेरे सामने यह स्पष्ट हो गया कि कम्प्यूटर का जो हौवा छात्रों के मन में बैठा हुआ था, वह निराधार था। मैंने उसे बहुत मजेदार चीज पाया, क्योंकि इसके द्वारा हम अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी कार्य करा सकते थे। सौभाग्य से श्री लहरी के रूप में एक अच्छा शिक्षक और दानी के रूप में एक अच्छा साथी भी मुझे प्राप्त हुआ, जिसके कारण मुझे कभी कठिनाई महसूस नहीं हुई।
अब तक हमारे मन में श्री लहरी की छवि कोई बहुत अच्छी नहीं थी। लेकिन इस कोर्स के दौरान हम उनके अत्यधिक नजदीक आ गये। मैं पढ़ने में तेज सदा से रहा ही हूँ, इसके अलावा लहरी साहब ने मुझमें मौलिक चिन्तन और समस्या को हल करने का गुण भी देखा, जिसकी कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में अत्यधिक आवश्यकता होती है। मेरी बुद्धि के पैनेपन से वे इतने खुश रहते थे कि प्रोग्रामिंग कला की जितनी भी बारीकियाँ वे जानते थे, सारी की सारी मुझे सिखा दीं।
दो-तीन बार हम अलीगढ़ विश्वविद्यालय के कम्प्यूटर केन्द्र पर भी गये थे, क्योंकि हमारे पास कोई कम्प्यूटर नहीं था। लहरी साहब भी हमारे साथ जाते थे। इस विषय में मेरा प्रदर्शन काफी अच्छा रहा और मैं स्वयं बहुत संतुष्ट था। कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की जो नींव लहरी साहब ने उस समय फाॅट्र्रान भाषा के माध्यम से मेरे दिमाग में डाली, वह इतनी मजबूत है कि उसके बाद अन्य कई कम्प्यूटर की भाषाएँ मैं स्वयं सीख गया और मेरे आसपास के लोग मुझे सबसे अच्छा प्रोग्रामर कहा करते थे (और हैं)।
मैं अंग्रेजी में अभी भी परिपक्व नहीं था, क्योंकि अंग्रेजी पढ़ने की मेरी गति काफी कम थी। अतः मैं ज्यादातर हिन्दी की पुस्तकें ही पढ़ा करता था। मुझे मुख्यतः कहानी और राजनैतिक चिन्तन की पुस्तकें पसन्द हैं। एक दिन लहरी साहब ने राजनीति पर कोई हिन्दी की किताब मेरे हाथ में देख ली, जिसे मैं आगरा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय से लाया था। उन्होंने जिज्ञासावश पूछा कि मैं किस विषय की पुस्तकें पढ़ता हूँं। जब मैंने बताया, तो उन्होंने फिर पूछा कि हिन्दी में ही क्यों पढ़ते हो। मैंने कहा कि अंग्रेजी में पढ़ने की मेरी स्पीड काफी कम है, अतः हिन्दी की ही पढ़ता हूँ। तो उन्होंने कहा कि अंग्रेजी पढ़ने की अपनी स्पीड बढ़ाने के लिए जेम्स हैडली चेज के उपन्यास पढ़ा करो। मैंने कहा कि ठीक है पढूँगा।
मेरे जान पहचान के व्यक्तियों में उन दिनों कल्पना कपूर ही अंग्रेजी के उपन्यास पढ़ा करती थी। मैंने उससे पूछा कि क्या आगरा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में जेम्स हैडली चेज के उपन्यास मिल जायेंगे? उसने बताया कि एक या दो उपन्यास शायद हैं। ढूँढ़ने पर मुझे दो उपन्यास मिल गये और मैंने पढ़ना शुरू किया। अंग्रेजी का उपन्यास पढ़ने का मेरा यह पहला अवसर था। पहले उपन्यास को मैं 5-6 दिन में ही पूरा पढ़ सका, लेकिन शीघ्र ही मैंने महसूस किया कि अंग्रेजी पढ़ने की मेरी गति काफी बढ़ गयी है। हालांकि तब तक वह ऊँचे स्तर तक नहीं आ पायी थी।
इसके बाद मैंने जेम्स हैडली चेज के ही अंग्रेजी के एक दो उपन्यास और पढ़े, जिससे मेरी गति में और वृद्धि हुई। तब से मैं अंग्रेजी के सैकड़ों उपन्यास पढ़ चुका हूँं। हिन्दी के तो और भी ज्यादा पढ़े होंगे। लेकिन सच कहूँ तो मुझे अंग्रेजी के उपन्यासों में ऐसा कुछ नहीं मिला जो हिन्दी के उपन्यासों में न हो। हाँ, इयान फ्लेमिंग, हैराल्ड रौबिन्स, अगाथा क्रिस्टी, जेम्स हैडली चेज जैसे कुछ उपन्यासकारों की कोटि के जासूसी उपन्यासकार हिन्दी में अभी नहीं हुए हैं।
मैं अंग्रेजी का कट्टर विरोधी और हिन्दी का प्रबल समर्थक रहा हूँ और हूँ, फिर भी मैं इस बात का विरोधी नहीं हूँ कि आवश्यकता पढ़ने पर अंग्रेजी साहित्य का लाभ उठाया जाय। अंग्रेजी उपन्यास पढ़ने से मेरे मन में अंग्रेजी के प्रति जो कुरुचि थी, वह समाप्त हो गयी और यह गुण बाद में अर्थात् आगे की पढ़ाई में मेरे बहुत काम आया, जब मुझे सैकड़ों अंग्रेजी पुस्तकों में से अपने मतलब की चीजें निकालनी पड़ती थीं। इसके लिए मैं लहरी साहब का सदा कृतज्ञ रहूँगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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