आत्मकथा भाग-1 अंश-30

उन्हीं दिनों मुझे शतरंज खेलने का शौक लग गया था। इसकी शुरूआत ऐसे हुई थी कि जब मैं हाईस्कूल और इंटर में पढ़ता था और राजकीय इंटर कालेज पचकुइयां से लौटते हुए अपने घर लोहामंडी आता था, तो प्रायः रास्ते में पुनियापाड़े में पेड़ों के नीचे कई लोग शतरंज खेलते हुए दिखाई देते थे। यह मेरे लिए एक नया खेल था, क्योंकि हमारे सामने हमारे गाँव में यह खेल नहीं खेला जाता था। पिताजी बताते थे कि पहले हमारे गाँव में शतरंज बहुत खेला जाता था, परन्तु उसके मोहरे और बिसात बहुत कम लोगों के पास थे। जब उनमें से कोई मोहरा खो जाता था, तो वे नया लाने की कोशिश नहीं करते थे। धीरे-धीरे सारी बिसातें खत्म हो गयीं और गाँव से यह खेल लुप्त हो गया।
लेकिन लोहामंडी में इसे देखकर मेरी इसमें रुचि जाग्रत हुई। परन्तु मैं उस समय शतरंज का कखग भी नहीं जानता था। तभी संयोग से एक बाल पत्रिका में शतरंज पर एक लम्बा लेख पढ़ने को मिला, जिसमें बिसात लगाने की विधि और सभी प्रकार के मोहरों की चालों का परिचय दिया गया था। इससे मुझे शतरंज की कुछ चालें समझ में आने लगीं और मैं प्रायः उनका खेल देखता था। एक दिन उन्होंने मेरी रुचि देखकर मुझे भी खेलने बैठा लिया और मैं कुछ चालें चला भी। लेकिन बुरी तरह हार गया। मेरे तीनों बड़े भाइयों ने भी इसी तरह विभिन्न स्रोतों से यह खेल सीख लिया था। दिमागी खेल होने के कारण मेरी इसमें गहरी रुचि हो गयी। इसलिए हमने शतरंज का एक सस्ता सा बोर्ड खरीद लिया और आपस में खेलने लगे।
धीरे-धीरे मैं शतरंज में पारंगत हो गया। कई बार मैं अपने छोटे मामाजी श्री दाऊदयाल जी गोयल के साथ भी शतरंज खेलता था। हालांकि ज्यादातर हार जाता था, क्योंकि वे बहुत पुराने खिलाड़ी थे। यह तब की बात है जब मैं बीएससी पास कर चुका था और एम.स्टेट. कर रहा था। घर पर हम जो बाजियाँ खेलते थे, उनमें प्रायः मैं अकेला एक तरफ होता था, और मेरे दो या तीनों बड़े भाई दूसरी ओर होते थे। ऐसी बाजियों में प्रायः मैं जीत जाता था, क्योंकि उनमें आपस में खींचतान होती थी कि कौन सी चाल अच्छी रहेगी।
लेकिन यदि उनमें से कोई एक ही मेरे खिलाफ खेल रहा होता था, तो मेरा जीतना कठिन होता था और कभी-कभी मैं हार भी जाता था।
शतरंज के साथ ही चाइनीज चैकर में भी मेरी रुचि तब जाग्रत हुई, जब मैं अपने संस्थान में अध्यापकों को खेलते देखता था। चाइनीज चैकर अपेक्षाकृत सरल होता है, क्योंकि उसके नियम बहुत साधारण हैं, हालांकि उसमें भी जीतने के लिए बुद्धि का बहुत व्यायाम हो जाता है।
इनके अलावा हम प्रायः ताश के खेल खेला करते थे, जिनमें मैं अपने गाँव में ही पारंगत हो गया था। हमारे गाँव में ताश के कई खेल खेले जाते थे, जिनमें प्रमुख हैं- डबल हाथ (दुपत्ती), कोर्टपीस (सात हाथ), बास्या पकड़, चार सौ बीस, टंकी, छकड़ी, चाँदस, लाद, तीन-दो-पाँच, सात-आठ आदि। इनमें तीन-दो-पाँच और सात-आठ बच्चों के खेल माने जाते थे। बड़े लोग प्रायः डबल-हाथ (दुपत्ती) ही खेलते थे, जो बहुत रोचक खेल है। गर्मी के दिनों में जब लोगों के पास लम्बी दोपहर काटने का कोई साधन नहीं होता था, तो यह खेल खेला जाता था। हम आगरा आने के बाद भी प्रायः यही खेलते थे, जिसमें हमारे पिताजी और माँ भी भाग लेती थीं। ताश के खेलों का शौकीन मैं आज भी हूँ और समय पाकर मैंने कई नये खेल सीखे थे, जिनकी चर्चा आगे करूँगा।
वर्षो की आदत छूटना आसान नहीं होता, अतः एम.स्टेट. के पहले सेमिस्टर में हमारा रवैया बहुत कुछ लापरवाही का ही रहा। यह हालत हमारी तब तक रही, जब तक कि हमारा प्रथम सेमिस्टर का परिणाम नहीं आ गया। प्रथम सत्र की परीक्षाओं के तुरन्त बाद हमारी द्वितीय सत्र की कक्षाएं शुरू हो गयीं थीं।
ऐसे ही एक दिन अचानक हमारा प्रथम सत्र का परीक्षाफल आ गया, जिसे देखकर सब आश्चर्यचकित रह गये। कक्षा के समस्त छात्रों में केवल मैं दोनों लिखित पर्चों तथा प्रक्टीकल में भी उत्तीर्ण था। बाकी में से केवल दो लोग एक तो कु. कल्पना कपूर तथा दूसरा थानाशेखर केवल एक-एक पर्चे में फेल थे और वह पर्चा लहरी साहब का था। लहरी साहब के पर्चे में केवल मैं उत्तीर्ण था, वह भी केवल 2 अंकों से, बाकी सब उनके पेपर में फेल थे। ज्यादातर लोग दो पर्चों में फेल थे और दो अभागे तो ऐसे थे जो दोनों पर्चो और प्रक्टीकल में भी अनुत्तीर्ण हो गये थे।
उस दिन मुझे पहली बार अपने भाग्य से ईर्ष्या हुई। साथ ही मुझे दुःख भी हुआ कि मेरे योग्य सहपाठी लहरी साहब के पर्चे में फेल हो गये थे। यहाँ मैं यह बता दूँ कि जब हमारी पढ़ाई नई-नई शुरू हुई थी, उस समय दक्षिण के श्री एल.यू. विजयकुमार तथा अन्य एक-दो छात्र कक्षा में बहुत मुखर थे। तब मैं सोचा करता था कि हममें अच्छी प्रतिस्पर्धा होगी। मैं कुछ शंकित भी था कि इनसे ज्यादा अच्छा सिद्ध हो सकूँगा या नहीं। लेकिन शीघ्र ही मुझ पर यह प्रकट हो गया कि ये लोग मात्र कागज के शेर हैं। इसलिए भी मैं कुछ लापरवाह हो गया था। लेकिन मुझे इस बात की आशंका नहीं थी कि मेरी लापरवाही का परिणाम इस हद तक भी जा सकता है। मैं फेल होते-होते बाल-बाल बचा था।
तुरन्त ही मैंने तय किया कि अब इस रवैये से काम नहीं चलेगा। और मैं पढ़ाई के प्रति गंभीर हो गया। सौभाग्य से द्वितीय सत्र में हमारे कोर्स और अध्यापक भी काफी अच्छे थे। अतः जो लोग प्रथम सत्र के एक या दो पेपरों में फेल हो गये थे, उन्हें इस बात की आशा थी कि द्वितीय सत्र के सभी पर्चों में पास होकर अगले सत्र में पढ़ने के अधिकारी हो जायेंगे, क्योंकि तृतीय सत्र में पहुँचने के लिए पहले दो सत्रों के कम से कम आधे कोर्सों में उत्तीर्ण होना आवश्यक था।
द्वितीय सत्र में हमने जमकर मेहनत की। जब हमारी परीक्षा हुई तो मैं काफी संतुष्ट था। मेरे सभी पर्चे तथा प्रक्टीकल आशा के अनुरूप ही हुए थे। गर्मी की छुट्टियों के बाद हमारी तृतीय सत्र की पढ़ाई भी शुरू हो गयी थी। हालांकि तब तक द्वितीय सत्र का परीक्षाफल नहीं आया था।
पढ़ाई शुरू हुए अभी सप्ताह भर भी नहीं हुआ था कि एक दिन डा. जोशी बदहवास से हमारी कक्षा में आये और उस दिन उन्होंने जो समाचार सुनाया उसे सुनकर हम सब स्तब्ध रह गये। उन्होंने कहा कि केवल तीन लोग विजय, दानी और कल्पना तृतीय सेमिस्टर में पहुँचे हैं, अतः बाकी लोगों को इस सेमिस्टर में पढ़ना बेकार है। यह समाचार हम सबके लिए वज्रपात के समान था। हालांकि मैं स्वयं उत्तीर्ण हो गया था, लेकिन मुझे इस बात का दुःख भी था कि मेरे कई घनिष्ट मित्रों का साथ छूट गया था। सबसे ज्यादा दुःख मुझे एल.यू. विजयकुमार के फेल होने का था। यद्यपि वह पढ़ने में लापरवाही करता था, लेकिन मुझे इस बात की आशंका नहीं थी कि वह इस बुरी तरह फेल हो जायेगा।
वैसे एल.यू. विजयकुमार बहुत योग्य और प्रतिभाशाली था। प्रथम तथा द्वितीय सत्रों के दौरान हम दोनों में काफी घनिष्टता थी। उसका गणित का ज्ञान तथा सांसारिक बातों का ज्ञान भी मुझसे काफी अच्छा था। अपने इंस्टीट्यूट तथा यूनीवर्सिटी के पुस्तकालयों का वह सबसे बड़ा पाठक था। मैं स्वयं बहुत कम पुस्तकालय जाता था और पुस्तकालयों से अधिक परिचित भी नहीं था। अतः जब भी मुझे किसी विशेष पुस्तक की आवश्यकता होती थी और मैं स्वयं उसे नहीं खोज पाता था, तो एल.यू. ही मेरे लिए वह पुस्तक ढूँढ़कर ला देता था।
प्रारम्भ में उसका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था। लेकिन वह जिस होस्टल में रहता था, वहाँ लगातार तीन महीने तक उसकी बुरी तरह रैगिंग की गयी थी, जिसके कारण उसे सिगरेट की लत लग गयी थी और कभी-कभी वह शराब भी पीने लगा था। इसका प्रभाव उसके स्वास्थ्य और मस्तिष्क पर पड़ना ही था। अतः एक साल में ही वह हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया था और उसकी खाल लटक सी गयी थी। फिर भी मैंने उसे सुधारने की बहुत कोशिश की। कई बार मैं उसे अपने सामने सिगरेट पीने से रोक देता था। हम दोनों काफी देर तक बातें किया करते थे।
मेरी सुनने की असमर्थता के कारण उसे सारी बातें लिखनी पड़ती थीं, लेकिन घंटों बातें करने के बाद भी वह थकता नहीं था और हम कभी तृप्त नहीं होते थे। उन्हीं दिनों मेरा अंग्रेजी का ज्ञान काफी बढ़ा और मेरा अंग्रेजी बोलने का अभ्यास भी उसी के साथ हुआ। इससे पहले मैं न तो अंग्रेजी बोल पाता था और न अंग्रेजी समाचारपत्र ही अच्छी तरह पढ़ पाता था। ज्यादातर केवल हैड लाइनें पढ़कर ही छोड़ देता था। लेकिन उन दिनों में अंग्रेजी अच्छी बोलने और पढ़ने लगा था। हालांकि मेरी अंग्रेजी पढ़ने की रफ्तार हिन्दी के मुकाबले अभी भी काफी कम थी। एल.यू. का साथ छूटने का मुझे बहुत दुःख हुआ, लेकिन शायद यही ईश्वर की इच्छा थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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