आत्मकथा भाग-1 अंश-29
डा. जोशी के बाद जिनसे मैं अत्यधिक प्रभावित था और हूँ, वे थे डा. विनोद करण सेठी (संक्षेप में डा. वी.के. सेठी), जिन्होंने प्रवेश के समय मेरा इन्टरव्यू लिया था। अपने विषयों में उनका ज्ञान अथाह था। लड़के कहते थे कि वे पूरी दुनिया में दूसरे सबसे अच्छे सैम्पलिस्ट हैं अर्थात् सैम्पलिंग के उनसे अच्छे विद्वान उस समय सिर्फ एक ही थे डाॅ. मूर्ति। उनका पढ़ाने का तरीका भी बहुत अच्छा था। जब तक छात्र संतुष्ट नहीं हो जाते थे, तब तक वे एक ही बात को बार-बार विभिन्न तरीकों से समझाते रहते थे। वे छात्रों पर काफी मेहनत करते थे और अपनी तरफ से कभी किसी तरह की लापरवाही नहीं करते थे।
एक अच्छे प्रोफेसर होने के साथ ही वे बहुत अच्छे इंसान भी थे। हमें अच्छे प्रोफेसर मिल सकते हैं, अच्छे इंसान भी मिल जायेंगे, लेकिन जिनमें ये दोनों गुण प्रचुर मात्रा में हों ऐसे व्यक्ति दुर्लभ ही होते हैं। डा. सेठी में ये दोनों ही गुण थे। कई बार किसी छात्र का प्रदर्शन अत्यधिक निराशाजनक होते हुए भी उन्होंने उसे अपनी तरफ से कभी हतोत्साहित नहीं किया, बल्कि हमेशा प्रोत्साहित ही करते थे। उनमें एक और विशेषता थी कि अपनी कक्षा होने या न होने पर भी वे प्रातः 10 बजे से सायंकाल साढ़े चार बजे तक संस्थान में अवश्य ही उपस्थित रहते थे, जबकि अन्य ज्यादातर अध्यापक मौका मिलते ही घर चले जाते थे और कक्षाओं के समय के अलावा उनको पा जाना लगभग असम्भव ही होता था। डा. सेठी अपने खाली समय में अन्य अध्यापकों के साथ प्रायः चाइनीज चैकर खेलते रहते थे।
मुझसे वे बहुत खुश रहते थे क्योंकि उनकी आशा के अनुरूप मैं कक्षा में बहुत आगे रहता था। आम रट्टू छात्रों के विपरीत मैं विषय की गहराई में जाने की कोशिश करता था और कई बार प्रतिप्रश्न भी पूछा करता था। मेरे परिचितों से वे प्रायः मेरी योग्यता की प्रशंसा किया करते थे। आपकी सूचना के लिए बता दूँ कि ये डाॅ वी.के. सेठी ‘जयपुर फुट’ के लिए विश्वविख्यात डाॅ पी.के. सेठी के सगे भाई थे।
हमारे एक और प्राध्यापक थे डाॅ. टी.बी.एम. सिंह। डा. जोशी के बाद जिन अध्यापकों का सर्वतोमुखी ज्ञान अधिकतम था, उनमें डा. सिंह का पहला नाम था। डा. जोशी की तरह ही उनके ज्ञान की थाह पाना हमारे लिए तो असंभव था। हालांकि वे कक्षा के बाहर हमसे ज्यादा सम्बन्ध नहीं रखते थे, लेकिन कक्षा में वे पूर्ण रुचि के साथ हमें पढ़ाया करते थे और हमें संतुष्ट करने की पूरी कोशिश करते थे।
उनके पढ़ाने का तरीका अद्वितीय था। अन्य अध्यापकों की परम्परा के विपरीत वे नये-नये प्रश्नों को छात्रों द्वारा ही हल कराने की कोशिश करते थे ताकि हम परम्परागत ज्ञान के बजाय कुछ मौलिक चिन्तन भी कर सकें। उनका परीक्षा लेने का तरीका भी अपने आप में अद्वितीय होता था। वे छात्रों को कोई कठिन सा प्रश्न देते थे, जो किसी भी पुस्तक में हल किया हुआ नहीं होता था। वे हमें किसी भी किताब को देखने की छूट देते थे (जिसे ओपन बुक परीक्षा कहा जाता है) और साथ ही यह भी छूट देते थे कि हम चाहें तो आपस में भी सलाह या चर्चा कर सकते हैं। उनका यह तरीका मुझे बहुत पसंद आता था। मैं उनके टैस्ट के लिए प्रायः कोई तैयारी नहीं करता था, क्योंकि उससे कुछ फायदा भी नहीं था।
उनके इस पढ़ाने के तरीके से हमारा विषय ज्ञान इतना गहरा हो गया था कि हम कठिन से कठिन प्रश्नों को भी हल कर डालते थे और प्रायः अधिक कठिन प्रश्नों की तलाश में रहते थे। उन्होंने हमें प्रायिकता (प्रोबेबिलिटी), बहुचर विश्लेषण (मल्टीवेरियेट एनालाइसिस), सदिश व्योम (वेक्टर स्पेस) तथा मार्कोव शृंखलाएं (मार्कोव चेन्स) जैसे कठिन विषयों की शिक्षा दी थी। इन विषयों में आज भी मेरा ज्ञान ऐसा है कि मामूली तैयारी के बाद इन विषयों को मैं एम.एससी. को भी पढ़ा सकता हूँ।
एम.स्टेट. चार सत्रों (सेमिस्टरों) का कोर्स था, जिसमें प्रत्येक सत्र छः माह का था। प्रथम सेमिस्टर में हमें प्रतिदर्श संकलन विज्ञान (सैंपलिंग) पढ़ाते थे श्री बी.के. लहरी। उस समय हम उन्हें कोई महत्व नहीं देते थे। इसके तीन कारण थे पहला तो यह कि हम सेंट जाॅह्न्स कालेज से नये-नये आये थे, जहाँ स्वच्छंदता की हद तक स्वतंत्र रहते थे और प्रायः अनुशासन में बँधना पसन्द नहीं करते थे। दूसरा कारण यह था कि उस समय तक श्री लहरी पी.एच.डी. नहीं थे। अतः हम समझते थे कि उनका ज्ञान और पढ़ाने का तरीका बेकार था। तीसरा कारण यह था कि श्री लहरी स्वयं भी कुछ शान्त प्रकृति के थे और प्रायः अन्य अध्यापकों और छात्रों से दूर-दूर ही रहते थे। इन सब कारणों की वजह से हम उनकी प्रायः उपेक्षा करते थे। यह हमें बाद में समझ में आया कि हम कितनी बड़ी गलती पर थे।
उन्हीं दिनों हमारा बी.एससी. का परीक्षाफल आया। आशा के अनुरूप मैं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण था। मेरे सहपाठी अरुण पाल दानी भी प्रथम श्रेणी में पास थे, लेकिन कु. कल्पना की भौतिक विज्ञान में सप्लीमेन्टरी आयी थी, जिस पर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। बी.एससी. में प्रथम श्रेणी आने से मेरा आत्मविश्वास (या कहिए घमंड) कुछ और बढ़ गया तथा मैं कुछ और लापरवाह हो गया।
एक बार की बात है। हम लोग पढ़ने के मूड में नहीं थे और श्री लहरी का घंटा था। अतः हममें से कुछ ने उनसे प्रार्थना की कि आज कक्षा छोड़ दें, क्योंकि हमारा पढ़ने का मूड नहीं है। लेकिन श्री लहरी ने तुरन्त इन्कार कर दिया और कक्षा में घुस गये। हमने इशारों में ही तय किया कि कोई भी कक्षा में नहीं जायेगा। अतः सब वहाँ से चुपचाप खिसक गये। श्री लहरी शायद थोड़ी देर वहाँ बैठे कि कोई पढ़ने आयेगा, लेकिन किसी को न आता देखकर गुस्से में चले गये।
दूसरे दिन अपनी कक्षा के समय वे तेजी से घुसे और अंग्रेजी में कहा- आप सबने कल मेरे साथ दुर्व्यवहार किया था, जिसके कारण मैं एक सप्ताह तक कक्षा नहीं लूँगा और इन दो अध्यायों को नहीं पढ़ाऊँगा। इतना कहकर उन्होंने दो अध्यायों के नाम बोर्ड पर लिखे और कक्षा से बाहर हो गये।
उनके इस कार्य से हम स्तब्ध रह गये। हमें आशा नहीं थी कि बात इतना गंभीर रूप ले लेगी। डरते-डरते हम अपने निदेशक डा. जोशी के पास गये और उन्हें मामला बताया। डा. जोशी ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की उसे सुनकर हम सब काँप गये। उन्होंने कहा- ‘अगर श्री लहरी की जगह मैं होता, तो कभी नहीं पढ़ाता।’ इसे कहते हैं कि ‘छोटे मियाँ तो छोटे मियाँ, बड़े मियाँ सुभान अल्लाह’। हमारे लिए उस संस्थान में अनुशासनहीनता का यह पहला और आखिरी अवसर था। इसके बाद हम सब डर गये थे और समझ गये थे कि यह सेंट जाॅह्न्स कालेज नहीं है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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