आत्मकथा भाग-1 अंश-28

अध्याय-7: हँसा हूँ हाल पर अपने
जिन्दगी यूँ भी गुजर ही जाती।
क्यों तेरा रह गुजर याद आया?
बी.एससी. की परीक्षा देने के बाद मुझे किसी विषय में एम.एससी. करनी थी। मेरे सामने गणित, सांख्यिकी और अर्थशास्त्र तीन विकल्प थे। गणित में स्वाभाविक रुचि होने के कारण मेरा झुकाव इधर ही था, लेकिन बी.एससी. में सांख्यिकी में भी गहरी रुचि जाग्रत हो चुकी थी और इसमें मेरे अंक भी काफी अच्छे आने की उम्मीद थी, अतः मैं सांख्यिकी में ही एम.एससी. करना चाहता था। एक बात यह भी थी कि हमारे शिक्षक श्री सक्सैना साहब ने मुझे एम.स्टेट (अर्थात् मास्टर ऑफ स्टेटिस्टिक्स अर्थात् सांख्यिकी में स्नातकोत्तर उपाधि) के बारे में बताकर कहा था कि यह कोर्स कठिन है, लेकिन तुम्हारे लिए ठीक है। मैंने इस चुनौती को स्वीकार किया और मुझे इस बात की खुशी है कि मैं इसमें सफल रहा।
मेरा बी.एससी. का परिणाम तब तक आया नहीं था और एम.स्टेट. में प्रवेश के लिए विज्ञापन निकल चुका था। आगरा विश्वविद्यालय परिसर में ही समाज विज्ञान संस्थान है, जहाँ एम.स्टेट की कक्षाएं लगती हैं। वहीं से प्रवेश के लिए आवेदन माँगे गये थे। अतः मैंने भी डा. भाईसाहब से कहकर एक आवेदन पत्र मँगा लिया और भरकर जमा भी करा दिया। कुछ दिनों बाद ही मेरे पास इन्टरव्यू के लिए पत्र आ गया। मैं भाईसाहब के साथ जाना चाहता था, लेकिन उन्हें कोई काम पड़ गया, इसलिए मैं अकेला ही चला गया। भाईसाहब ने कहा था कि वे जल्दी ही वहाँ पहुँच जायेंगे। इन्टरव्यू के लिए उस समय ज्यादा लोग नहीं थे। अतः शीघ्र ही मेरी बारी आ गयी।
इन्टरव्यू लेने के लिए वहाँ केवल दो शिक्षक बैठे हुए थे। एक थे डाॅ. वी.के. सेठी तथा दूसरे थे श्री एम.पी. गौतम। मैं अपनी सुनने की कठिनाई के बारे में आवेदन पत्र में लिख ही चुका था। अतः जब डाॅ. सेठी ने मुझसे कुछ पूछा, तो मैंने आवेदन पत्र दिखाते हुए बता दिया कि मैं सुनने में असमर्थ हूँ और केवल लिखकर बातें करता हूँ। तब उन्होंने मुझसे लिखकर कुछ प्रश्न किये। प्रारम्भ के प्रश्न मेरी बीमारी से सम्बन्धित थे, जिनका मैंने संतोषजनक जवाब दे दिया।
अगले प्रश्न गणित से सम्बन्धित थे। मेरे दुर्भाग्य से मैं उस समय तक बी.एससी. (प्रथम वर्ष) में पढ़े हुए गणित को लगभग भूल चुका था, अतः मैं उनके सरलतम प्रश्नों का भी उत्तर नहीं दे सका। लेकिन मैंने उन्हें स्पष्ट बता दिया कि मैं प्रीवियस का गणित भूल गया हूँ, लेकिन एक बार पढ़ने से सारा याद हो जायेगा। तब उन्होंने पूछा कि तुम्हें क्या याद है, तो मैंने बताया कि द्वितीय वर्ष का गणित और दोनों वर्षों की सांख्यिकी सारी याद है। तब उन्होंने मुझसे सांख्यिकी में कुछ प्रश्न किये, जिनका मैंने सही-सही जबाब दे दिया। तब तक डाॅ. भाई साहब भी आ गये थे। परिचय के बाद डाॅ. सेठी ने उनसे कहा कि यह बी.एससी. (प्रथम वर्ष) का गणित सारा भूल गया है। मैंने शर्माते हुए कहा कि मैं जल्दी ही केवल एक बार पढ़कर सारा याद कर लूँगा।
तब डाॅ. सेठी ने खुश होकर मुझे प्रवेश देना स्वीकार कर लिया। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और कार्यालय में जाकर प्रवेश के लिए आवश्यक फीस जमा कर दी। कक्षा के प्रथम दिन मुझे ज्ञात हुआ कि सेंट जाॅह्न्स कालेज से मैं अकेला नहीं हूँ, बल्कि मेरे तीन अन्य सहपाठी श्री रवीन्द्र पचैरी, श्री अरुण पाल दानी तथा कु. कल्पना कपूर भी मेरे साथ प्रवेश ले चुके थे। हालांकि उनका इन्टरव्यू मेरे सामने नहीं हुआ था। उनका साथ पाकर मुझे खुशी हुई, लेकिन कु. नीलम खन्ना और अन्य लड़कों का नाम न देखकर आश्चर्य भी हुआ। मालूम हुआ कि उनमें से ज्यादातर ने आगरा काॅलेज में गणित में एम.एससी. में प्रवेश लिया है या लेना चाहते हैं।
हमारी कक्षा में 20 छात्र-छात्राओं को प्रवेश दिया गया था, जिनमें से दो सर्वश्री एल.यू. विजयकुमार तथा आर. थानाशेखर दक्षिण के थे। लेकिन कक्षाएँ शुरू होते ही चार लड़के कोर्स छोड़कर चले गये अर्थात् केवल 16 छात्र रह गये। जिनमें दो लड़कियाँ थीं। कल्पना के अलावा दूसरी छात्रा थीं कु. अल्का जैन, जो आगरा कालेज से गणित में एम.एससी. करने के बाद वहाँ एम.स्टेट. करने आयी थीं। लेकिन एक महीने में ही 6 अन्य छात्र भी एम.स्टेट. छोड़कर चले गये। उनमें श्री रवीन्द्र पचैरी भी थे, जिन्होंने सेंट जाॅह्न्स में ही भौतिकी में एम.एससी. में प्रवेश ले लिया था। अब हमारी कक्षा में केवल 10 व्यक्ति रह गये थे।
एम.स्टेट. कोर्स की कठिनता हमारे सामने स्पष्ट हो चुकी थी तथा हम यह भी समझ गये थे कि इसमें काफीे कठिन परिश्रम की आवश्यकता होगी। लेकिन हम पूरी तरह निराश नहीं हुए थे, हालांकि कुछ शंकित अवश्य थे। हमारे सौभाग्य से इस संस्थान में हमारे सभी शिक्षक बहुत योग्य थे और पढ़ाने में पूरी रुचि लेते थे।
उस संस्थान के डायरेक्टर (निदेशक) थे डा. देवी दत्त जोशी (संक्षेप में डा. डी.डी. जोशी)। वे बहुत अनुशासन प्रिय, लेकिन कठोरता रहित थे। छात्रों के साथ वे काफी घुलमिल जाते थे। उनका ज्ञान का सागर अथाह था। अगर कोई अतिशयोक्ति न हो तो मैं कहूँगा कि पूरी दुनिया के नहीं, तो पूरे एशिया के सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ हैं। उनका पढ़ाने का तरीका इतना अच्छा था कि शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। हमारे दुर्भाग्य से हम उनसे ज्यादा विषय नहीं पढ़ सके, क्योंकि हमारे अधिकतर विषय दूसरे शिक्षकों में बाँट दिये गये थे। फिर भी हमने उनसे जितना भी पढ़ा, उतना पढ़ना भी हमारा सौभाग्य था। उनसे पढ़ते-पढ़ते हम कभी तृप्त नहीं होते थे।
उनमें एक ही आदत थी (जिसे मैं खराब कहने का दुस्साहस नहीं करूँगा) कि वे लगातार सिगरेट पीते रहते थे। अंग्रेजी में जिन्हें ‘चेन स्मोकर’ कहा जाता है, वे उसी किस्म के थे। कक्षा लेने के लिए आते समय वे अपने कमरे में ही नयी सिगरेट जला लेते थे और कक्षा में बैठकर उसे समाप्त करने के बाद ही पढ़ाना शुरू करते थे। लड़के कहते थे कि अगर वे कक्षा में शुरू में सिगरेट न पियें, तो कुछ पढ़ा ही नहीं सकेंगे। इस बात में कितनी सच्चाई है, कहा नहीं जा सकता।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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