आत्मकथा भाग-1 अंश-27
भरतपुर यात्रा में हमारे साथ अंसारी साहब और सक्सेना साहब भी थे, अतः हम बहुत ज्यादा आजादी नहीं ले सके थे। इसलिए अगली बार हमने स्वयं ही फतेहपुर सीकरी जाने की योजना बनायी। इस यात्रा में हमारे साथ कोई लड़की भी नहीं थी, अतः हम पूर्ण स्वच्छन्द होकर मनचाही जगह पर घूम फिर सके। हमने काफी चित्र भी खींचे थे। फतेहपुर सीकरी जाने का मेरा यह प्रथम अवसर था। वहाँ की इमारतों की बनावट और सौन्दर्य देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ था।
उस वर्ष का वार्षिक समारोह हमारी एक और सफलता थी। मैंने उस समारोह के लिए श्यामपट पर रंगीन चाॅक से अपनी एसोसियेशन का नाम बहुत सुन्दर अक्षरों में कलात्मक ढंग से लिखा था तथा अपनी चित्रकला का नमूना भी दिखाया था। साथ ही मैंने दो कविताएं भी सुनायी थीं। उस समय समारोह पर मैं ही मैं छाया हुआ था। श्री अंसारी साहब ने मेरी प्रशंसा करते हुए टिप्पणी की थी- ‘मल्टी टेलेन्टेड बाॅय है’ अर्थात् बहुमुखी प्रतिभाशाली लड़का है। अपनी इस प्रशंसा को मैं सैकड़ों प्रमाणपत्रों से भी अधिक मूल्यवान मानता हूँ।
बी.एससी. अन्तिम वर्ष में सांख्यिकी की प्रयोगात्मक परीक्षा मेरी एक और स्वर्णिम सफलता थी। मैंने अपने दोनों प्रयोग सफलतापूर्वक किये थे। लेकिन यह इतना महत्वपूर्ण नहीं था। महत्वपूर्ण थी मेरी मौखिक परीक्षा। परीक्षक महोदय ने मुझसे जो भी प्रश्न पूछे थे, मैंने उनका जबाव काफी सही-सही दिया था। उसने मुझे ऋतुज परिवर्तनों (Seasonal Variations) का एक उदाहरण पूछा था। सामान्यतः दिये जाने वाले उदाहरणों के विपरीत मैंने उदाहरण दिया था- किसी सड़क पर एक दिन में होने वाले यातायात का। इस उदाहरण से वह इतने खुश हुए कि प्रयोगात्मक परीक्षा में मुझे 50 में से पूरे 50 अंक दे दिये।
सांख्यिकी में इस बार 150 में से 136 अंक लेकर मैं प्रथम स्थान पर था। लेकिन अर्थशास्त्र के कम अंकों के कारण मेरे कुल अंक थे केवल 64 प्रतिशत। फिर भी मैं बहुत प्रसन्न था कि मैंने प्रथम श्रेणी प्राप्त कर ली थी। मेरी इस सफलता का एक बड़ा श्रेय सांख्यिकी के अध्यापकों, खास तौर से श्री अंसारी साहब, को जाता है। अगर गणित में मुझे अंसारी साहब जैसा एक भी अध्यापक मिला होता, तो मैं उसमें भी 65 के बजाय 85 से 90 प्रतिशत अंक लाकर दिखा सकता था।
उसी वर्ष मेरे सबसे बड़े भाईसाहब श्री महावीर प्रसाद का शुभ विवाह सम्पन्न हुआ। हमारी भाभीजी श्रीमती सरला अग्रवाल अलीगढ़ की हैं और काफी सुन्दर, सुशील एवं हँसमुख हैं। भाईसाहब की शादी में मैं बहुत खुश था और देर तक नाचता रहा था। नाचते हुए मैंने अपने फोटू भी खिंचाये थे जो आज भी सुरक्षित हैं।
यहाँ एक मजेदार घटना का उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ। जिस दिन हमारी भाभीजी पहली बार विदा होकर हमारे घर आयी थीं, उसी दिन की बात है। उन्हें आये हुए मुश्किल से दो घंटे हुए होंगे कि भाभीजी ने रोना शुरू कर दिया। पता चलते ही सब लोग घबरा गये कि जाने क्या बात हो गयी। सारी औरतें उन्हें चुप कराने में जुट गयीं और बार-बार पूछने लगीं ‘क्या बात है? क्यों रो रही हो?’ करीब घंटे भर रोने के बाद भाभीजी ने बताया कि ‘मम्मी की याद आ रही है।’ यह सुनते ही सब जोर से हँस पड़े। मेरा ठहाका सबसे ऊँचा था। मैंने मजाक में कहा- ‘भाभीजी, मम्मी को अपने साथ ही ले आतीं।’ यह सुनकर सब लोग तो हँसने लगे और भाभीजी मुझसे कुछ नाराज हो गयीं। करीब दो-तीन दिन बाद उनकी नाराजी दूर हुई।
(पादटीप- कुछ वर्ष पूर्व हमारी बड़ी भाभीजी का देहान्त हो चुका है।)
(पादटीप- कुछ वर्ष पूर्व हमारी बड़ी भाभीजी का देहान्त हो चुका है।)
उन दिनों हम नयाबाँस लोहामंडी में ही मकान नम्बर 25/199 में रहा करते थे। यह घर हमारे पहले के घरों से कुछ अच्छा था और उसमें कई अन्य किरायेदार भी रहते थे, जिनके साथ हमारी पर्याप्त घनिष्टता थी। उनमें से प्रमुख थे श्री श्रीनिवास जी गोयल, जो हमारे दूर के रिश्ते से मामाजी लगते हैं। वे बीड़ी-सिगरेट के थोक व्यापारी हैं, इसलिए हम सब उन्हें बीड़ी वाले मामाजी ही कहते हैं। हम दोनों के बीच प्रायः ताश और अठारह गोटी की बाजियाँ हुआ करती थी। ताश के खेल में कभी-कभी मैं बुरी तरह हार जाता था, लेकिन ज्यादातर उन्हें हरा दिया करता था, परन्तु अठारह गोटी के खेल में मैं उनसे पूरी जिन्दगी में केवल एक बार हारा था। वह भी तब जब मैं सोकर उठा था और शुरू में कई चालें लापरवाही से चल गया था। लेकिन उसी दिन मैंने उन्हें दो बार हराकर अपनी एक मात्र हार का बदला ले लिया था। आज भी जब कभी मैं बीड़ी वाले मामाजी से मिलता हूँ, तो पुराने दिनों की याद हरी हो जाती है। मामाजी प्रायः मुझे ‘अपनी भाभी का चमचा’ कहकर मजाक किया करते थे।
बी.एससी. उत्तीर्ण करने के बाद मैंने श्री सक्सेना साहब की प्रेरणा से एम.स्टेट में प्रवेश लेना तय किया। यह बड़े साहस की बात थी, क्योंकि उस समय छात्रों पर एम.स्टेट का आतंक सा छाया हुआ था और सामान्यतया लड़के एम.स्टेट. की बजाय आगरा कालेज से सांख्यिकी में एम.एससी. करना पसन्द करते थे और ज्यादातर सांख्यिकी के बजाय गणित में एम.एससी. कर लिया करते थे। मेरे बी.एससी. के समस्त सहपाठियों में केवल कु. कल्पना कपूर और श्री अरुण पाल दानी ने मेरे साथ एम.स्टेट. में एडमीशन लिया था और बाकी सब इधर-उधर बिखर गये थे। आजकल वे सब लोग कहाँ है, मुझे कुछ भी पता नहीं है। कभी-कभी भूले भटके कोई मिल जाता है, तो सबके बारे में जानकारी लेने की कोशिश करता हूँ, लेकिन वह स्वयं भी उसी अंधकार में भटक रहा होता है, जिसमें मैं भटक रहा हूँ।
यह दुनिया एक ऐसा महासागर है जिसमें असंख्य बूँदें अपना अस्तित्व खो देती हैं। उनमें से बहुत कम ही हैं जो ‘मोती’ के रूप में अपनी पहचान बना पाती हैं, अन्यथा बूँद का स्वयं का कोई अलग अस्तित्व नहीं होता। इस जिन्दगी की उपमा विद्वानों एक यात्रा की तरह दी है, जिसमें असंख्य सहयात्री अलग-अलग स्थानों पर मिला करते हैं और कुछ दूर तक साथ देकर पुनः दुनिया की भीड़ में गुम हो जाते हैं। किसी ने कहा है-
जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछुड़ जाने को।
और दे जाते हैं यादें तन्हाई में तड़पाने को।।
जब कभी मैं अपने उन भूले-बिसरे साथियों को याद करने बैठता हूँ, तो दिल में एक गहरी उदासी छा जाती है। कितनी इच्छा होती है कि काश मेरे वे क्षण कुछ समय के लिए फिर मिल जायें, लेकिन क्या यह सम्भव है? शायद कभी नहीं।
जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछुड़ जाने को।
और दे जाते हैं यादें तन्हाई में तड़पाने को।।
जब कभी मैं अपने उन भूले-बिसरे साथियों को याद करने बैठता हूँ, तो दिल में एक गहरी उदासी छा जाती है। कितनी इच्छा होती है कि काश मेरे वे क्षण कुछ समय के लिए फिर मिल जायें, लेकिन क्या यह सम्भव है? शायद कभी नहीं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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