आत्मकथा भाग-1 अंश-26
जब हम बी.एससी. प्रथम वर्ष में थे, हमें सेंट जाॅह्न्स काॅलेज की राष्ट्रीय सेवा योजना में शामिल होना था। उन दिनों राष्ट्रीय सेवा योजना के अन्तर्गत कई प्रकार की गतिविधियाँ होती थी, जिनमें प्रमुख थी- नगर के विभिन्न भागों में कई स्थानों पर सायंकालीन निःशुल्क शिक्षा केन्द्र चलाना। मैं भी ऐसे ही एक शिक्षा केन्द्र में जो राजकीय इन्टर काॅलेज के पास जूनियर ट्रेनिंग सेन्टर में लगता था, पढ़ाने जाता था। काफी दिनों तक मैं वहाँ जाता रहा। उसका हमने वार्षिकोत्सव भी किया था, जिसमें प्रधानाचार्य श्री इट्यैरा जी भी पधारे थे।
एक बार राष्ट्रीय सेवायोजना की तरफ से एक श्रमदान शिविर आगरा के पास के एक कस्बे खेरागढ़ (या किरावली?) में लगा था। हम सब लोग प्रातः एक रेल गाड़ी से अपनी-अपनी टिकट लेकर वहाँ पहुँचे और दोपहर तक एक गूल (सिंचाई की नाली) का निर्माण किया था। मैं प्रायः पूरे समय तक श्रमदान करने वालों के कपड़े लेकर खड़ा रहा था। फिर नाली पूर्ण हो जाने पर सबने वहाँ खड़े होकर फोटो खिंचवाया था।
उसके बाद हम सबने अपना-अपना खाना खाया और तत्पश्चात् शहर की सामाजिक स्थिति का सर्वे करने के लिए निकल पड़े। हमारी टोली में 6-7 लोग थे। हमने पन्द्रह-बीस घरों में जाकर पूछताछ की। वह समय इमर्जेन्सी का था। बहुत से गरीब लोगों ने अपनी-अपनी नसबन्दी करा रखी थी या करवानी पड़ी थी और वे अपने नसबन्दी सर्टीफिकेट को इस प्रकार दिखा रहे थे, जैसे वही उनकी अधिकतम योग्यता का प्रमाणपत्र हो। यह सब देखकर मुझे बहुत क्षोभ होता था।
नियमानुसार हमें राष्ट्रीय सेवा योजना से अपने-अपने योगदान के लिए प्रमाण पत्र मिलने चाहिए थे। हमारे साथ के लगभग सभी लड़कों ने सर्टीफिकेट ले भी लिये थे, परन्तु मुझे कोई सर्टीफिकेट नहीं मिला। मैंने वह लेने की कोशिश भी नहीं की, क्योंकि मैं सोचता था कि सर्टीफिकेटों से सेवा को नहीं नापा जा सकता। अगर हम सेवा के बदले में प्रमाणपत्र लेना चाहेंगे, तो वह सेवा नहीं व्यापार कहा जायेगा।
बी.एससी. में हम सांख्यिकी के छात्रों ने एक एसोसियेशन बना रखी थी जिसका नाम था ‘सांख्यिकी एसोसियेशन’। प्रथम वर्ष में मैं इसकी गतिविधियों में कोई भाग नहीं लेता था, लेकिन उसके द्वारा आयोजित एक निबन्ध प्रतियोगिता जिसका विषय था ‘मृत्यु वरदान है, अभिशाप नहीं’ में मुझे तृतीय पुरस्कार मिला था। हालांकि पुरस्कार के नाम पर मात्र एक प्रमाण पत्र दिया गया था। उसी वर्ष एसोसियेशन के वार्षिक समारोह में मैंने एक गीत सुनाया था, ‘सुनो मेरी सरकार, जमाना चमचों का’ जो बहुत पसन्द किया गया।
बी.एससी. में मेरे अंक लगभग 64 प्रतिशत थे और मैं काफी संतुष्ट था। मुझे याद आता है कि एक बार प्रधानाचार्य जी ने अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं के बाद सभी छात्रों के प्रदर्शन की व्यक्तिगत रूप से समीक्षा करना तय किया था। अर्द्धवार्षिक परीक्षा में मेरे अंक 60 प्रतिशत से कुछ अधिक ही थे, जब मुझे समीक्षा के लिए बुलाया गया, तो वे अध्यापक लोग यह देखकर बहुत खुश हुए कि मेरे अंक 60 प्रतिशत से अधिक हैं। उन्होंने मुझसे अंग्रेजी में लिखकर कहा था- ‘बधाई, आगे सुधार करो।’ मैंने कहा था- ‘जी श्रीमान्’। मैंने सुधार करके दिखाया भी। उन्होंने उस समय मेरे चरित्र की भी परीक्षा ली थी। वह इस तरह कि उनमें से एक ने जिनके पास मैं खड़ा था जानबूझकर अपनी माचिस जमीन पर गिरा दी, लेकिन इस तरह जैसे वह असावधानीवश गिर पड़ी हो। वे यह देखना चाहते थे कि मैं कितना चौकन्ना रहता हूँ और मेरा चरित्र कैसा है। सौभाग्य से मैंने तुरन्त झुककर माचिस उठाकर दे दी थी। किसी योजनावश नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप से ही। शायद इस बात का प्रभाव भी उन पर पड़ा था और वे बहुत प्रसन्न हुए थे।
बी.एससी. अन्तिम वर्ष में आने तक हमारी जो थोड़ी बहुत झिझक थी वह दूर हो चुकी थी। और हम अपनी सहपाठिनियों से भी निस्संकोच होकर बातें कर सकते थे। इस बार मैं एसोसियेशन में भी सक्रिय था। मेरे अंक बी.एससी. प्रथम वर्ष के अर्थशास्त्र के सभी छात्रों में सर्वाधिक थे, अतः मैं एसोसियेशन का कोषाध्यक्ष बन सकता था, लेकिन अंसारी साहब के कहने पर मैंने अपना दावा छोड़ दिया था तथा अपने सहपाठी श्री प्रशान्त कुमार सिंह को वह पद दिला दिया था। प्रशान्त कुमार सिंह मेरे अच्छे दोस्त थे और बहुत सज्जन थे, आजकल वे कहाँ पर हैं मुझे पता नहीं।
एसोसियेशन के अध्यक्ष थे मेरे सहपाठी श्री वत्सराज सिंह जो पढ़ने लिखने में भी सबसे आगे थे। देखने में काफी अच्छे लगते थे और काफी चरित्रवान भी थे। उनकी सज्जनता और विनयशीलता काफी प्रसिद्ध थी। उनके पिता जी उस समय मथुरा रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर थे। बी.एससी. के बाद वे घर बैठ कर आई.सी.डब्लू.ए. करने लगे थे। उसके बाद कहाँ गये, इसका पता नहीं चल सका। हमारी महासचिव थीं कु. नीलम खन्ना, जो एक अन्य छात्र द्वारा अपना दावा छोड़ देने पर महासचिव बनी थीं। संरक्षक श्री अंसारी थे ही और वरिष्ठ अध्यक्ष थे श्री मुकेश चन्द्र सक्सेना।
एसोसियेशन में किसी कार्यकारी पद पर न होते हुए भी मैं उसकी गतिविधियों में सबसे ज्यादा सक्रिय था। एसोसियेशन के अधिकतर पत्र, प्रतिवेदन आदि मैंने ही तैयार (ड्राफ्ट) किये थे। एक बार एसोसियेशन ने एक सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता आयोजित की थी, जिसमें मैं प्रथम रहा था। पुरस्कार में यहाँ भी वही प्रमाण-पत्र मात्र मिला।
एक बार एसोसियेशन की तरफ से बुद्धि परीक्षण प्रतियोगिता भी आयोजित की गयी थी, जिसमें भी मैं प्रथम रहा और मेरा बुद्धि मापांक (आईक्यू) था 135.5, जो बहुत अच्छा माना जाता है। मेरी इस सफलता और आईक्यू के लिए मुझे बहुत प्रशंसा और प्रसिद्धि मिली थी। श्री अंसारी जी ने इसके पुरस्कार स्वरूप मुझे अपने हाथ से लिखकर एक प्रमाणपत्र दिया था, जिसे मैं आज भी अपने जीवन की अमूल्य निधि मानता हूँ।
एक बार हम एसोसियेशन की तरफ से एक पिकनिक टूर ‘घना पक्षी विहार, भरतपुर’ ले गये थे। यात्रा हालांकि एक ही दिन की थी। लेकिन हमने इसे बहुत पसन्द किया था। पक्षी विहार जैसी प्राकृतिक सौन्दर्य की जगह पर जाकर मैं बहुत खुश हुआ था। हजारों तरह के रंगबिरंगे पक्षियों को देखना एक विलक्षण अनुभव था।
हमारी चारों सहपाठिनियाँ भी हमारे साथ यात्रा पर गयीं थीं। वहाँ कल्पना और सुनीता ने एक-एक गीत सुनाया था और मैंने अच्छी लय न होने पर भी दो गजलें सुनायी थीं। समय कम होने के कारण हम वहाँ ज्यादा नहीं घूम सके, लेकिन जितना भी देखा उसी से मन बहुत उल्लसित हो गया था। मुझे याद है कि वहाँ सड़क के दोनों तरफ बेर के काफी पेड़ थे। मैं बार-बार बेर इकट्ठे करके अपने सहपाठियों में बाँट रहा था। अपनी चारों सहपाठिनियों तथा एक कनिष्ठ छात्रा, जिसे मैं गुड़िया कह रहा था, को भी मैंने लाल-लाल बेर इकट्ठे करके दिये थे। स्वयं भी मैंने काफी बेर खाये थे। वह दिन मेरी जिन्दगी के सबसे अच्छे दिनों में से एक हैं, जब मुझे बेइन्तिहा खुशी प्राप्त हुई। किसी शायर ने कहा है-
पिलाने में पीने से ज्यादा खुशी है।
मेरे हाथ से आज साकी ने पी है।।
पिलाने में पीने से ज्यादा खुशी है।
मेरे हाथ से आज साकी ने पी है।।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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