आत्मकथा भाग-1अंश-8

उन दिनों हमें ट्यूबवैैलों पर नहाने का काफी शौक था। कुएँ पर बाल्टी से पानी खींचकर नहाना हमें पसन्द नहीं आता था। इसीलिए मैं कभी-कभी नहाना गोल कर जाता था। हम इतने छोटे भी नहीं रह गये थे कि माता जी नहला देतीं। अतः इसका हल हमने निकाला ट्यूबवैलों या रहटों पर नहाने का। हमारे घर से थोड़ी थोड़ी दूर पर कई ट्यूबवैल और दो रहट थे उनमें से प्रायः प्रतिदिन कोई न कोई चलता रहता था। बस हम अपने कपड़े आदि लेकर दौड़ जाते थे और नहाते थे। टयूबवैलों की कुंडी (टंकी) में हम देर तक नहाते रहते थे। लेकिन एक बार मैं एक कुंडी में डूबते-डूबते बचा। वह घटना इस प्रकार है।
मैं एक दिन ऐसी कुंडी में नहा रहा था, जिसका पानी हमारी गर्दन तक आता था। उसमें मैं बहुत बार नहा चुका था। उस कुंडी में काफी काई जमा हो गयी थी, जिससे पैर रपट जाता था। मेरे संगी-साथी नहाकर निकल चुके थे और थोड़ी दूर पर अपने कपड़े पहन रहे थे। कुंडी में उस समय मैं बिलकुल अकेला था। उस दिन अचानक मेरा पैर रपट गया और डूबने को हुआ लेकिन तुरन्त ही मैं संभाल कर उठा लेकिन मेरे दुर्भाग्य से मैं पानी की मोटी धार के नीचे आ गया। उसके जोर से मैं फिर नीचे चला गया। दूसरी बार मैंने उठने की कोशिश की, फिर धार के नीचे आ गया। तीसरी बार भी ऐसा ही हुआ। मेरी साँस रूकने को हो रही थी और मैं सोच रहा था कि आज नहीं बच सकूँगा। तभी मैंने चौथी बार और जोर लगाकर उठने की कोशिश की तथा धार से कुछ हट भी गया। सौभाग्य से इस बार मैं धार के नीचे नहीं आया और मैंने कुंडी की दीवार (रेलिंग) पकड़ ली तब मेरी जान में जान आयी।
अगर चौथी बार भी मेरे हाथ में रेलिंग न आती तो यह निश्चित था कि मैं पाँचवी बार कोशिश नहीं कर पाता और मेरी इह लीला वहीं समाप्त हो गयी होती। लेकिन कहावत है कि ‘हिम्मते मर्दां, मददे खुदा’, मैंने हिम्मत नहीं हारी, इसलिए शायद ईश्वर ने भी मेरी मदद की। शायद उसे मुझसे कुछ और काम लेना था, नहीं तो आज यह सब लिखने के लिए मैं जीवित नहीं रहता। मैंने इस घटना का जिक्र किसी से भी नहीं किया था। माताजी से भी नहीं, क्योंकि मैं सोचता था कि वह बेकार में रोयेगी। इस घटना के बाद मैं ट्यूबवैलों पर नहाते समय काफी सावधान रहने लगा था।
सदा की भांति कक्षा चार में भी मैं पूरी कक्षा में प्रथम रहकर कक्षा पाँच में आया। कक्षा पाँच में हमें प्रधानाध्यापक श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा, जिन्हें हम पंडितजी कहते थे, पढ़ाते थे। पंडित जी एक विलक्षण व्यक्ति थे। हम चारों भाई उनके ही प्रधानाध्यापकत्व में उसी विद्यालय में पढ़े थे। रिटायर होने तक वे उसी विद्यालय में रहे। उनको नाटक आदि कराने में काफी रुचि थी। लगभग प्रत्येक वर्ष वे एक बड़ा नाटक तैयार कराते थे, जिसका मंचन गाँव वालों के सामने होता था।
वे हारमोनियम पर भजन, गीत आदि गाने के विशेषज्ञ थे। उनकी आवाज और लहजा अपनी तरह का एक ही था। इसके अलावा वे जादू भी जानते थे। मुझे याद है कि उन्होंने एक बार एक बड़ा नाटक तैयार किया था (शायद कृष्ण-अर्जुन युद्ध) और उसके मंचन के दिन नाटक से पहले कई तरह के जादू दिखाये थे। जिनमें एक जादू था चित सोते हुए लड़के को ऊपर उठा देना और फिर नीचे उतार देना। यह काफी विलक्षण जादू था। कम से कम उस दिन तो मुझे ऐसा ही महसूस हुआ।
वे मुझे बहुत प्यार करते थे, गलतियों पर मुझे मामूली सजा देते थे, जबकि उसी तरह की गलती पर दूसरों को ज्यादा सजा मिलती थी। मैं पढ़ने लिखने में तेज था ही, अतः पढ़ाई के पीछे कभी सजा नहीं मिली। सजा मिलती थी दूसरी तरह की गलतियों पर जैसे किताबें-कापी भूल आना या थोड़ी देर के लिए कहकर ज्यादा देर के लिए गायब हो जाना, मारपीट-गाली गलौज करना आदि।
जब मैं कक्षा पाँच में था, एक बार मैंने एक कविता लिखी। वह कुछ राष्ट्रीय भावनाओं से युक्त थी। 2 अक्टूबर के दिन महात्मा गांधी के जन्म दिन पर मैंने वह कविता सुनायी। जब पंडितजी को पता चला कि वह कविता मैंने स्वयं लिखी है तो उन्होंने मुझे बहुत शाबासी दी और बहुत खुश हुए। जब भी गाँव का कोई आदमी विद्यालय में आता था, तो वे यह जिक्र करना नहीं भूलते थे कि मैंने एक कविता लिखी है। अपनी जिन्दगी की वह पहली स्वरचित कविता अब मुझे याद नहीं है।
कक्षा पाँच की परीक्षा हमारे गांव के पास के एक अन्य गांव जुगसना में होनी थी। जाने से पहले पंडित जी ने विद्यालय में हवन कराया और सबकी सफलता के लिए प्रार्थनाएं की। दो दिन के लिए पूड़ी लड्डू आदि रखकर और अन्य आवश्यक सामान लेकर हम जुगसना के लिए चल पड़े। जुगसना वहाँ से करीब पांच किलोमीटर दूर है। अतः पैदल ही गये। साथ का सामान सिर पर और हाथ में लालटेन। आराम से चलते-चलते हम शाम को अंधेरा होने से पहले ही जुगसना पहुंच गये। और वहाँ के जूनियर हाईस्कूल में जाकर डेरा जमाया। गर्मी के दिन थे शायद मई का महीना था अतः रात को बाहर ही सोने में कोई मुश्किल नहीं थी। कुछ देर तक पढ़ने के बाद अर्थात पढ़ने का बहाना करने के बाद हम सो गये।
दूसरे दिन तथा तीसरे दिन दोपहर तक हमारे पर्चे थे अतः तीसरे दिन पर्चे समाप्त करके हम घर को रवाना हो गये। मेरे एक मित्र श्री निहाल सिंह ने मेरा सामान अपने ही सामान के साथ बांध लिया और सारे सामान को स्वयं सिर पर रखकर लाया। मैं रास्ते भर खाली हाथ हिलाता हुआ आया था। मुझे उम्मीद थी कि सदा की तरह कक्षा पाँच में भी मैं पूरी कक्षा में प्रथम रहूंगा, लेकिन मेरा अति आत्मविश्वास मुझे धोखा दे गया। मेरा एक सहपाठी श्री रमेश चन्द्र मुझसे कुछ अंक ज्यादा लेकर प्रथम आया। कारण शायद यह था कि मेरा हस्तलेख बहुत खराब था। लापरवाही से कापी पर इधर-उधर स्याही के धब्बे पड़ जाते थे। अतः सही लिखने पर भी इतिहास-भूगोल जैसे विषयों में अच्छे अंक नहीं मिलते थे। इसलिए अपनी जिन्दगी में पहली बार मुझे कक्षा में प्रथम स्थान नहीं मिल पाया।
उस समय तक मैं अपने गांव भर में गणित और पहेलियों के अच्छे जानकार के रूप में मशहूर हो गया था। आस पास के बड़े-बूढ़े लोग प्रायः मेरे पास आते थे और पुराने जमाने की गणित की पहेलियाँ आदि पूछा करते थे, जिनके बारे में उनका ख्याल था कि आजकल के एम.ए. पास भी उन पहेलियों का जबाब नहीं दे सकते। लेकिन वे बहुत चमत्कृत हो जाते थे, जब मैं कुछ देर सोचने के बाद ही उन्हें सही जबाब बता देता था। मुझे उनमें से कई पहेलियां आज भी याद हैं लेकिन बहुत सी भूल गया हूँ। मेरा यह शौक लम्बे समय तक बरकरार रहा और आज भी है।
कक्षा पाँच के बाद मुझे कक्षा छः में पढ़ने के लिए घर से करीब एक किलोमीटर दूर जूनियर हाईस्कूल दघेंटा में जाना था, जो कि एक नहर (बम्बा) के किनारे पर था। अतः हमने पंडित जी को दक्षिणा देकर अपना स्थानान्तरण प्रमाणपत्र ले लिया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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