आत्मकथा भाग-1अंश-7

हमारे कक्षाध्यापक पुजारीजी यों तो काफी रुचियों वाले थे, लेकिन उनका एक प्रमुख मनोरंजन था कुछ लड़कों का नियमित मजाक बनाना और उन्हें पूरी कक्षा के सामने शर्मिन्दा करना। प्रायः वे हमारे एक सहपाठी, जिसका नाम ‘दिनेश’ था, लेकिन सभी उसे ‘भुट्टा’ कहते थे, का मजाक बनवाते थे, क्योंकि वह कुछ तुतलाता था। पुजारी जी उसे ‘जुल्फिकार अली भुट्टो’ कहा करते थे। जब भी उनका मूड़ होता था, जो कि प्रायः प्रतिदिन ही होता था, तो वे भुट्टा को खड़ा कर लेते थे और उससे कहलवाते थे- ‘बच्चो चुप हो जाओ’। भुट्टा इस वाक्य को इस प्रकार कहता था- ‘बट्टो, टुप हो डाओ’। इसके साथ ही सारी कक्षा हँस पड़ती थी। कई बार वह ‘बट्टो’ पर आकर रुक जाता था। तब पुजारी जी कक्षा पाँच से हमारे ताऊ जी के लड़के श्री बृज मोहन को बुलवाते थे, जिसका उपनाम ‘बट्टो’ था, और उससे कहते थे कि तुम्हें भुट्टा बुला रहा है। इस सबसे बेचारा भुट्टा बहुत हीनभावना से ग्रस्त हो गया था, यहाँ तक कि वह कक्षा 5 से आगे नहीं पढ़ पाया। आज-कल वह गाँव में ही परचूनी की दुकान करता है।
पुजारी जी का दूसरा मनोरंजन था- लड़कों को मुर्गा बनाना। हर गलती की सजा उनके पास थी- मुर्गा बनना। कई बार वे सारी कक्षा से कहते थे कि मुर्गा बनने से हाथ-पैरों में बहुत मजबूती आती है, अतः तुम चाहो तो मुर्गा बन लो। सारी कक्षा स्वयं को मजबूत साबित करने के लिए तुरन्त मुर्गा बन जाती थी। थक जाने पर भी हमें मुर्गा बना रहना पड़ता था, क्योंकि हम स्वयं को कमजोर साबित नहीं करना चाहते थे। अन्त में जब पुजारी जी स्वयं कहते थे, तब लड़के पुनः मुर्गे से आदमी बन जाते थे।
सदा की तरह कक्षा तीन में भी मैं पढ़ने लिखने में सबसे आगे था। अपनी पढ़ाई की चिन्ता मैंने कभी नहीं की, क्योंकि मैं अपने पाठ्यक्रम से भी दो अध्याय आगे रहता था। अतः विद्यालय के समय के बाद मैं अन्य लड़कों के साथ खेलने निकल जाता था। इधर उधर पेड़ों पर या रास्ते में हम तरह-तरह के खेल खेला करते थे। कभी-कभी कंचे-गोलियाँ भी खेलते थे। कंचों पर मैंने कभी पैसे खर्च नहीं किये, क्योंकि यह मुझे अपव्यय मालूम होता था। लेकिन मैं कंचे खेलने में काफी तेज था, अतः प्रायः जीतकर ही आता था। कभी-कभी ऐसा भी होता था कि मैं घर से कोई कंचा लेकर नहीं चला, विरोधी से दो कंचे उधार लिये और जीतने पर उसके तो दोनों लौटाये ही, कई जीतकर भी ले आया। गुल्ली-डंडा, कबड्डी, गिट्टी-फोड़ (पिड्डू) तथा कौआ-हाड़ मेरे प्रिय खेल थे। खेल के दौरान प्रायः रोज ही किसी न किसी के साथ मारपीट हो जाती थी, क्योंकि मैं किसी से दबता नहीं था। लेकिन सारी मारपीट बाहर ही रहती थी, घर तक शिकायतें बहुत कम आती थीं।
कक्षा तीन उत्तीर्ण करने के बाद मैं कक्षा चार में आया जहाँ मेरे अध्यापक हुए पचावर गाँव के निवासी श्री चरण सिंह जी, जिन्हें सभी ‘मुंशी जी’ कहकर पुकारते थे। वे बहुत ही सज्जन व्यक्ति थे और गाँव-इलाके में बहुत लोकप्रिय थे। सांस्कृतिक गतिविधियों में उनकी रुचि हालांकि कम थी, लेकिन वे पढ़ाते बहुत अच्छा थे। कई बुद्धू लड़के उनकी कक्षा में आते ही काफी कुछ सीख जाते थे। लोग मजाक में कहा करते थे कि उनकी कक्षा में आते ही रेंगने वाला लड़का चलने लग जाता है और चलने वाला दौड़ने।
कक्षा चार में मेरी सांस्कृतिक गतिविधियाँ प्रायः शून्य रहीं। मुंशी जी का ज्यादा जोर नाटकों और गानों के बजाय बोलने पर था। मुझे याद है कि एक बार बाल सभा में मुझे सफाई पर बोलने के लिए कहा गया था। मैं सफलतापूर्वक बोला भी, लेकिन मजेदार बात यह थी कि मैं स्वयं अपनी सफाई के प्रति काफी लापरवाह था। मेरे सारे कपड़े और हाथ-पैर स्याही से रंगे रहते थे और खेलने-कूदने से धूल में काफी गन्दा हो जाता था। सफाई के प्रति मेरी लापरवाही आज भी बनी हुई है।
कक्षा चार के दौरान एक बार मैं जान-बूझकर प्रातःकालीन प्रार्थना बोलने नहीं गया। वह घटना इस प्रकार थी। एक बार मैं अपने मामाजी की लड़की की शादी में माताजी के साथ आगरा चला गया। तीन दिन बाद जब मैं लौटा और विद्यालय गया तो हमारे प्रधानाध्यापक श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा ने जाने क्या सोचकर मुझसे कहा कि तुम्हारा नाम कट गया है, क्योंकि कोई तीन दिन तक बिना सूचना के गैर हाजिर रहे, तो उसका नाम कट जाता है। मैंने तर्क किया कि तीन दिन में नाम काटने का कोई नियम नहीं है, लेकिन उन्होंने कहा कि है। मैं सदा से ही स्वाभिमानी रहा हूँ मुझे लगा कि मेरे स्वाभिमान पर चोट की जा रही है, अतः मैंने कह दिया कि अब मैं इस स्कूल में नहीं पढ़ूँगा बल्कि आगरा ही पढ़़ँूगा। प्रधानाध्यापक जी ने मुझसे कहा कि पहले मैं प्रार्थना बोलूँ, बाद में बात करेंगे लेकिन उस समय मेरा विवेक नष्ट हो गया था, अतः मैं प्रार्थना बोलने नहीं गया और कक्षा में बैठा-बैठा रोता रहा। मजबूरन उन्होंने एक अन्य लड़के को टोली में बुलाकर प्रार्थना बुलवायी।
प्रार्थना के बाद वे मुझसे पूछने लगे कि मैं क्यों रो रहा हूँ। मैंने बताया कि मैं उनसे बहुत नाराज हूँ और अब मैं यहाँ नहीं पढ़ूँगा। उन्होंने मुझे काफी समझाया, लेकिन मेरी बुद्धि में कोई बात नहीं समायी। तब उन्होंने मेरे पिताजी को बुलवाया। पिताजी ने डाँटकर मुझसे पूछा कि मैं क्यों रो रहा हूँ और इनसे क्यों नाराज हूँ। मैंने बताया कि तीन दिन गैर हाजिर रहने पर ही मेरा नाम काट दिया गया है, अतः यहाँ कैसे पढ़ सकता हूँ। तब मुंशी जी ने मुझे कक्षा का रजिस्टर लाकर दिखाया कि देखो तीन दिन के बजाय केवल एक दिन की अनुपस्थिति लगाई गयी है और नाम काटने का तो सवाल ही नहीं उठता। तब मैं बहुत शर्मिन्दा हुआ। पिताजी ने मुझमें एक थप्पड़ भी मारा और प्रधानाध्यापकजी से पैर छूकर माफी माँगने के लिए कहा। मैं मुँह से तो कुछ नहीं बोला, लेकिन पैर छूकर माफी माँग ली।
जब मैं खाना खाने की छुट्टी में घर लौटा, तब तक माँ को भी सारी बात मालूम पड़ चुकी थी। उन्होंने भी मुझसे कहा कि मैं जाकर पंडित जी से माफी माँगू, तब खाना मिलेगा। तभी किसी ने बताया कि यह पहले ही माफी माँग चुका है, तब उन्होंने मुझे खाना दिया। मैं इसे प्रधानाध्यापक जी की महानता ही कहूँगा कि उन्होंने मुझे न केवल माफ कर दिया, बल्कि पहले से ज्यादा प्यार दिया, जिसका बदला मैं कभी नहीं चुका सकता।
जब मैं कक्षा चार में ही था, हमारे विद्यालय में एक नये अध्यापक आये जिनका नाम था श्री जगदीश प्रसाद गुप्ता। वे दाऊजी के पास पटलोनी गाँव के रहने वाले थे। हम सब उन्हें गुप्ता जी कहकर पुकारते थे, वे नये पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़े हुए थे, अतः अन्य विषयों के साथ अंग्रेजी और बीजगणित का भी उन्हें ज्ञान था। उससे ज्यादा उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्रामों के बारे में विशेष ज्ञान था। मैं और देवेन्द्र प्रायः स्वतंत्रता संग्रामों पर उनसे प्रश्न पूछा करते थे। हम जिज्ञासु तो थे ही, अतः अपनी बुद्धि के अनुसार कठिन से कठिन प्रश्न पूछा करते थे, क्योंकि हम सोचते थे कि अध्यापक को तो सारी बातें मालूम होती है और होनी चाहिए। लेकिन एक दिन कोई प्रश्न पूछने पर गुप्ता जी ने बताया कि कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं होता, सबके ज्ञान की कोई न कोई सीमा होती है। बात हमारी समझ में आ गयी और हमने फालतू प्रश्न पूछना बन्द कर दिया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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