आत्मकथा भाग-1अंश-6
पुजारी जी ने मुझे कई नाटकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिकाएं दीं। उन्हें नाटक आदि कराने में बहुत रुचि थी। लगभग प्रतिमाह वे एक नया नाटक तैयार करते थे, कभी पुस्तकों से और कभी स्वयं लिखकर। फिर कुछ रिहर्सलों के बाद वे उसे पूरे विद्यालय के सामने कराते थे। कक्षा दो में खेले गये एक नाटक की मुझे अच्छी तरह याद है। वह रामायण पर आधारित था। प्रसंग था हुनमान का समुद्र लाँघना और सीता के पास राम की अँगूठी पहुँचाना। मैं उसमें सीता बना था, क्योंकि मेरी आवाज लड़कियों जैसी थी और मैं गीत गाने में भी निपुण था। इस नाटक में जब हनुमान ने सीता के पास अँगूठी गिराई, तो सीता ने एक गीत गाया था, जिसकी कुछ पंक्तियाँ निम्न प्रकार हैं-
मुदरिया मोइ साँचु बताइदै, रामु कहाँ आयी छोड़ि?
न छोड़े तैंने पम्पापुर दरम्यान
काटि लये सूपणखाँ के कान
मुदरिया मोइ साँचु बताइदै, रामु कहाँ आयी छोड़ि?
न छोड़े तैंने पम्पापुर दरम्यान
काटि लये सूपणखाँ के कान
मुदरिया मोइ साँचु बताइदै, रामु कहाँ आयी छोड़ि?
यह गीत पुजारी जी ने खुद लिखा था और इसकी तर्ज भी ऐसी दर्द भरी बनाई थी कि सुनने वालों की आँखों में आँसू आये बिना नहीं रहते थे। बड़े परिश्रम से मैंने इसे गाना सीखा और जब प्रस्तुत किया तो काफी सफलता मिली और शाबासी भी।
कक्षा दो में मेरी सांस्कृतिक गतिविधियाँ ज्यादातर कक्षा तक ही सीमित रहीं, क्योंकि गाँव वालों के सामने प्रस्तुत करने के लिए मैं अभी काफी छोटा था। दूसरी बात यह थी कि आगे की कक्षाओं में कई दूसरे छात्र थे, जो सांस्कृतिक प्रतिभा में मुझसे किसी तरह भी कम नहीं थे।
जब मैं कक्षा तीन में आया, तो मेरे बड़े भाई श्री गोविन्द स्वरूप कक्षा 5 में पहुँच चुके थे। उनकी कक्षा के श्री चन्द्रभान आदि कई छात्र भी सांस्कृतिक प्रतिभा सम्पन्न थे। हमारे प्रधानाध्यापक श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा भी नाटक आदि खिलाने में काफी रुचि लेते थे। मुझे याद है कि उन्होंने एक बार एक बड़ा ऐतिहासिक नाटक तैयार किया था, जो कई रिहर्सलों के बाद गाँव के लोगों के सामने खेला गया था। उस नाटक में मुझे कोई भूमिका नहीं मिली, क्योंकि मैं अभी काफी छोटा था। लेकिन मेरी अच्छी आवाज के कारण श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा ने मुझे एक सामूहिक गीत गाने वाली टोली में शामिल कर लिया था। यह गीत भी नाटक के अन्तर्गत था और शुरू में ही गाया जाता था। मेरे बड़े भाई श्री गोविन्द की भूमिका उसमें एक ऐसे बालक की थी जो अपनी माता के मर जाने पर करुण विलाप करता है। भाईसाहब का विलाप इतना शानदार रहा कि उनका नाम गाँव भर में प्रसिद्ध हो गया। यहाँ तक कि हम दोनों के चेहरों की समानता के कारण कई लोग गलती से मुझे भी ‘गोविन्दा’ कहकर बुलाने लगे थे।
जब इस नाटक में सामूहिक गीत गाने का अवसर आया, तो मैं सामान्य कपड़ों में ही गीत गाने वाली टोली के साथ जाकर खड़ा हो गया। उस समय काफी जाड़ा पड़ रहा था। शायद दिसम्बर का महीना था। गलती से मैंने अपने कानों पर कोई मफलर आदि नहीं बाँध रखा था। स्वाभाविक ही व्यवस्थापकों को चिन्ता हुई कि कहीं मुझे सर्दी न लग जाये। मेरा घर हालांकि उस स्थान से, जिसे ‘गाँधी चबूतरा’ कहते थे, ज्यादा दूर नहीं था। लेकिन घर जाने और मफलर लाने का समय नहीं बचा था। समस्या का समाधान किया हमारे परिवार के ही एक व्यक्ति श्री श्याम बिहारी ने, जो बर्फ बेचने का कार्य किया करते थे। उन्होंने अपने सिर पर बँधी हुई एक चादर मेरे सिर पर इस तरह बाँध दी जैसे सिख लोग सिर पर पगड़ी बांधा करते हैं। मैने कुछ विरोध भी किया, लेकिन सर्दी का भय दिखाकर उन्होंने मुझे उसे बाँधे रखने पर मजबूर कर दिया। लिहाजा मैं उसे बाँधे हुए ही मंच पर जा खड़ा हुआ।
मुझे अपने आकार के अनुपात में असामान्य रूप से बड़ी पगड़ी बांधे देखकर दर्शकों में हंसी की लहर दौड़ गयी। मैं बहुत शर्मिन्दा हुआ और चाहा कि इसे उतारकर फैंक दूँ, लेकिन बाँधने वाले ने फिर डपट दिया। खैर, गाने के लिए आदेश मिलते ही मैंने अपनी टोली के साथ गाना शुरू कर दिया-
प्यारा हिन्दुस्तान है, गोपालों की शान है
वीरों का मैदान जिसमें भक्तों के भगवान हैं
यहीं के हनुमान थे, अर्जुन से बलवान थे
महाराणा प्रताप जिसमें शिवाजी की शान है
प्यारा हिन्दुस्तान है...
प्यारा हिन्दुस्तान है, गोपालों की शान है
वीरों का मैदान जिसमें भक्तों के भगवान हैं
यहीं के हनुमान थे, अर्जुन से बलवान थे
महाराणा प्रताप जिसमें शिवाजी की शान है
प्यारा हिन्दुस्तान है...
गीत काफी लम्बा था, लेकिन इससे आगे अब मुझे याद नहीं है। गीत पूरा करते ही मैं तालियों की प्रतीक्षा किये बिना मंच के पीछे भागा और सबसे पहला काम यह किया कि सिर की पगड़ी उतारकर बांधने वाले व्यक्ति (श्री श्याम बिहारी) को पकड़ा दी और इसके साथ ही घर की तरफ भाग खड़ा हुआ, क्योंकि अब वहाँ मेरा कोई काम नहीं था।
कक्षा तीन में मैंने और भी कई नाटक खेले थे, जिनमें से एक की मुझे अच्छी तरह याद है। वह नाटक शकुन्तला और दुष्यन्त का था। सामान्यतया मुझे नारी पात्रों की भूमिका दी जाती थी, क्योंकि मेरी आवाज लड़कियों जैसी थी, लेकिन इस नाटक में मुझे दुष्यन्त की भूमिका मिली, क्योंकि शकुन्तला को कुछ करना नहीं था और दुष्यन्त को एक गीत भी गाना था। जब राजा दुष्यन्त शिकार खेलते हुए आते हैं और कण्व ऋषि के आश्रम में शकुन्तला को देखते हैं, तो उस पर मोहित होकर एक गीत गाते हैं। वह गीत मुझे गाना था। गीत के बोल क्या थे, यह तो मुझे अब याद नहीं है, क्योंकि ज्यादातर मैं बिना मर्म समझे ही गीतों को गाया करता था और संवाद बोला करता था। लेकिन मेरा अनुमान है कि गीत के बोल कुछ इसी प्रकार के होंगे-
चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो,
जो भी हो तुम किन्तु लाजवाब हो।
चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो,
जो भी हो तुम किन्तु लाजवाब हो।
इतना मुझे अवश्य याद है कि जब भी कोई गणमान्य व्यक्ति विद्यालय में पधारता था तो उनके सामने मेरा वह गीत गवाया जाता था। इस नाटक में शकुन्तला का पार्ट मेरे ही एक सहपाठी और मित्र श्री देवेन्द्र सिंह ने किया था, जिसे मैं काफी दिनों तक ‘रानी’ कहकर चिढ़ाता रहा था।
पुजारीजी ने मुझे और देवेन्द्र को एक स्वागत गान भी रटा रखा था। जब भी कोई प्रमुख व्यक्ति विद्यालय में आता था, तो उसके स्वागत में हमें यह गीत गाना होता था। अब तक मेरी गायन प्रतिभा काफी मशहूर हो गयी थी। अतः पुरस्कारस्वरूप मुझे दो-तीन लड़कों की उस टोली में शामिल कर लिया गया, जो प्रातःकाल की सामूहिक प्रार्थना कराया करती थी। उसके बाद जब तक मैं उस विद्यालय में रहा उस टोली का प्रमुख सदस्य रहा और एक दिन को छोड़कर प्रतिदिन मैं ही सामूहिक प्रार्थना कराता रहा। उस एक दिन मैंने प्रार्थना क्यों नहीं करायी इसकी कथा मैं आगे लिखूंगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें