आत्मकथा भाग-1अंश-4

यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे ऐसे परिवार में जन्म मिला, जहाँ शिक्षा का वातावरण था। मेरे पिताजी खुद शिक्षित थे तथा माताजी भी गाँव की किसी भी औरत से ज्यादा पढ़ी थीं। इससे बढ़कर या शायद इसी कारण से मेरे तीनों बड़े भाइयों की भी पढ़ने में काफी रुचि थी। स्वभावतः मेरी भी पढ़ाई में रुचि जागृत हो गयी थी। जिज्ञासु होना सदा से मेरा गुण (या अवगुण) रहा है। इसी जिज्ञासा का परिणाम था कि जिस उम्र में बच्चे अपनी माताओं की गोद में दुबके रहते हैं, उस उम्र में मैं गिनती, पहाड़े, वर्णमाला आदि जान गया था और घर वालों के नाम हिन्दी में लिख लिया करता था।
यहाँ आपको यह बात बता दूँ कि पढ़ना मेरा नियम कभी नहीं रहा। जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ कि नियमों में बँधना मेरा स्वभाव अस्वीकार करता है। यों मैंने पढ़ने का कार्यक्रम (टाइम-टेबल) कई बार बनाया, मगर उसका पालन कभी नहीं किया। यह आश्चर्य ही है कि जब मैं कक्षा एक का विद्यार्थी था तब भी और जब शोध छात्र था तब भी नियमानुसार पढ़ना मुझे नापंसद रहा है। जब मैं शैशवावस्था में था, तो घर पर खूब खेलता था, ऊधम करता था, पिटता था और प्यार भी पाता था। जब घर से बाहर जाने लगा, तो कुछ फूटे हुए कच्चे घरों में मिट्टी में दिनभर खेला करता था। भूख लगती थी तो आकर खाना खा जाता था और फिर अपने हम उम्र बच्चों के साथ धूल में लोटना, मारपीट करना आदि।
ऐसे में आप आश्चर्य करेंगे कि मुझे अक्षर ज्ञान कैसे हुआ और कब हुआ। इसका एक मात्र जबाब है मेरी जिज्ञासा। जब मैं बड़े भाइयों को पढ़ते हुए देखता था, तो खुद भी अक्षर पहचानना सीखता था। खड़िया से अक्षर बनाया करता था, चीजें गिना करता था जैसे अन्य बच्चे करते हैं। फलतः बिना किसी नियमित पढ़ाई या कोचिंग के मुझे अच्छा ज्ञान हो गया। जब मैं करीब चार-साढ़े चार साल का था तो हिन्दी अच्छी तरह पढ़ लेता था। जोड़, घटाव तथा छोटे-छोटे गुणा भाग भी कर लेता था। मेरे एक ताऊ श्री राम नारायण जी प्रायः कहा करते थे कि यह ‘अभिमन्यु शिक्षा’ है, जिसमें पेट में ही सब सिखा दिया जाता है। ये ताऊजी मुझे बहुत प्यार करते थे।
अपने माताजी और पिताजी से एक और गुण मुझे विरासत में मिला है, वह है धन के प्रति लोभ का अभाव। बचपन में जहाँ दूसरे बच्चे गुल्लकों में बड़ी फिक्र और कंजूसी से पैसे इकट्ठे किया करते हैं, वह गुण मुझमें नहीं रहा। यों गुल्लकें कई बार खरीदीं और उनमें दो चार दिन सिक्के डाले भी, पर एक दो रुपये से ज्यादा कभी इकट्ठे नहीं हो पाये। पता नहीं क्या बात है कि मेरे पास पैसे ज्यादा देर तक अब भी नहीं टिकते। एक दिन आते हैं और दूसरे ही दिन ऐसे चले जाते हैं कि पता ही नहीं चलता। यह हाल सिर्फ मेरा नहीं बल्कि हमारे घर में लगभग सबका है, केवल मेरी दो छोटी बहनों को छोड़कर जो रुपये जोड़ने में इतनी कंजूस हैं कि अपने पास 100 रुपये भी रखे रहेंगे, पर हम भाइयों से किसी न किसी बहाने एक-एक रुपया लेने के लिए गिड़गिड़ायेंगी, यहाँ तक कि अगर चवन्नी भी आती दिखी, तो ’भागते भूत की लँगोटी ही सही’ की मुद्रा में उसे भी लपक लेने में संकोच नहीं करेंगी।
जब हम बहुत छोटे थे, तो पिताजी रोज सवेरे पाँच पैसे या एक आना दिया करते थे, जिन्हें हम तुरन्त ही मूँगफली या किसी और चीज में बदलकर उदरस्थ कर लिया करते थे। दूसरी चीजें शाम को चाचाजी पेंठ से लौटते हुए लाया करते थे, उन्हें भी खूब खाते थे। हमें पैसों की कभी विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती थी, क्योंकि घर में किसी भी चीज की कमी नहीं थी। हालांकि मुझे पैसों का लोभ नहीं था, पर पैसे वसूलने में कभी-कभी चालाकी भी कर जाता था। जैसे एक बार अकेले में पिताजी से ले लिये और दूसरी बाद जब चाचाजी अकेले होते तो उनसे भी ले लिये। कभी-कभी यह चालाकी पकड़ भी ली जाती थी, पर मामूली चिल्लाने या डाँट-डपट के सिवा कुछ नहीं होता था।
पैसों के लिए चोरी करने की हमें आदत नहीं थी, बल्कि कहिये कि चोरी करना और फिर झूठ बोलना मुझे सबसे ज्यादा नापसन्द था, क्योंकि हम सोचते थे कि अगर झूठ पकड़ लिया गया तो कितनी बदनामी होगी। यही कारण था कि बचपन में सब हमें बहुत प्यार करते थे और हमारे ऊपर विश्वास करते थे। कई बार भारी शरारतें करने पर भी मुझे सिर्फ इसलिए मामूली सजा देकर छोड़ दिया जाता था कि मैं झूठ नहीं बोलता था।
मेरी माताजी की एक और आदत थी कि घर में कोई विशेष चीज बनाती थीं, तो पहले पड़ोसियों और ब्राह्मण के घर जरूर भिजवाती थीं। हमारे परिवार के दूसरे लोगों को स्वभावतः यह बुरा लगता था। कई बार झगड़ा भी हुआ, मगर माताजी ने लेने-देने में उदारता बरतना बंद नहीं किया। माताजी का कहना था कि हमें ईश्वर देता है और आगे भी ईश्वर ही देता रहेगा। सोचता हूँ माताजी का यह विश्वास कितना सुदृढ़ तथा सत्य था कि विषम से विषम परिस्थिति में भी नहीं डिगा। उदारता का यह गुण मुझे भी माताजी से ही मिला है। मेरा विचार है कि हमारी माताजी सच्चे अर्थो में समाजवादी हैं। मुझे इस बात का गर्व है कि हमारी माताजी गाँव मुहल्ले के गरीब घरों की सहायता करने में कभी पीछे नहीं रहती थीं। सबके लिए हमारे घर के दरवाजे खुले रहते थे। बाँटकर खाने की यह प्रवृत्ति मुझमें भी स्वभावतः पैदा हुई। जो भी चीजें हम लाते थे, बाँटकर खाते थे। आज भी मुझे कोई चीज अकेले-अकेले खाना बहुत बुरा लगता है। कई बार चाय पीने की तीव्र इच्छा होते हुए भी मुझे सिर्फ इसलिए स्थगित कर देनी पड़ती है कि कोई साथ (कम्पनी) देने वाला नहीं होता।
अपने परिवार के बौद्धिक, उदार और आदर्श वातावरण का मेरे व्यक्तित्व पर बहुत प्रभाव पड़ा है, खासतौर से माताजी का। वैसे मैं बचपन जितना धार्मिक अब नहीं हूँ, मतलब पूजा-पाठ वगैरह नहीं करता, परन्तु ईश्वरीय सत्ता में मेरा अभी भी दृढ़ विश्वास है। इस विश्वास का श्रेय मैं माताजी के सिवा और किसको दे सकता हूँ? पिताजी को भी नहीं, क्योंकि शुरू में पिताजी बहुत उदासीन थे इन मामलों में। हालांकि वे धार्मिक कार्यों में नियमित भाग लेते थे तथा होली-दिवाली पर पूजा भी किया करते थे, परन्तु माताजी की तरह नित्य पूजा करते मैंने उन्हें कभी नहीं देखा। इसका कारण यह हो सकता है कि उन्हें दुकान के काम से समय नहीं मिलता था। सुबह 7 बजे से लेकर रात 8 बजे तक दुकान पर कपड़े काटना उनका काम था। दोपहर को खाना खाने की छुट्टी ले लेते थे और बीच-बीच में हम भाइयों को पढ़ने में भी सहायता किया करते थे।
कभी-कभी मैं भी अपनी पट्टी और बुद्दिका (यह एक तरह की दवात होती है जिसमें खड़िया घोली जाती है) लेकर उनके पास बैठकर अक्षरों का अभ्यास किया करता था। यह उन दिनों की बात है जब मैंने स्कूल जाना शुरू नहीं किया था, क्योंकि मैं छोटा था। इस तरह घर ही मेरी पहली पाठशाला बना और उस समय के संस्कार मेरे स्वभाव में अभी भी इतने प्रबल हैं कि खुद मुझे भी आश्चर्य होता है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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