आत्मकथा भाग-1अंश-3

जब तक बाबा जीवित थे, तब तक अम्मा की हालत ठीक रहती थी। सब्जी काटना, दूध गर्म करना, छोटे बच्चों को रोटी खिलाना जैसे छोटे-मोटे काम अम्मा ही किया करती थी। साथ ही जब बाबा गुस्सा होते थे, तो उन्हें मनाने का दायित्व भी वही उठाती थी। बाबा के मरने के बाद वह बहुत बीमार रहने लगी थी। आँखों से कम दिखाई पड़ने लगा था, सुनाई भी कम पड़ता था तथा उनका दिमाग भी गड़बड़ा गया था। बात-बात पर गुस्सा करती थी तथा घर से भागने के मौके तलाशा करती थी। इसलिए हमारी माताजी को रात को बहुत सावधान रहना पड़ता था। रात को सोते समय घर के मुख्य दरवाजे पर अन्दर से ताला लगा लिया जाता था तथा पेशाब वगैरह के लिए निकलने पर माताजी उनके साथ जाती थीं।
लेकिन एक दिन वही हुआ जिसका डर था। भीषण जाड़ों के दिन थे। एक रात को अम्मा पेशाब करने उठी। हमारी माता जी ने दरवाजा खोल दिया तथा अम्मा पेशाब करने के लिए बाहर चबूतरे पर बैठ गयी। तभी माता जी को नींद आने लगी तो वह भीतर आकर लेट गयी। थोड़ी देर बाद उसे अम्मा का ध्यान आया, तो अम्मा के खटोले पर देखा। खटोला खाली था। फिर उसने बाहर देखा वहाँ भी नहीं थी। तब घबराकर माताजी ने पिताजी और चाचाजी को आवाज लगायी, जो पास में कपड़े की कच्ची दुकान पर सोते थे। वे तथा सब मुहल्लेवाले इकट्ठे होकर अम्मा को ढूँढ़ने लगे। आस-पास के खेतों में लालटेन लेकर खोज की गयी, मगर अम्मा न मिली। सब सोचने लगे थे कि अब वह अगर मिलेगी भी तो जिन्दा शायद ही मिले, क्योंकि इतने भयंकर जाड़े में दो घंटे तक वह बीमार बुढ़िया जिन्दा कैसे बची होगी।
वास्तव में हुआ यह था कि हमारे घर से थोड़ी दूर पर एक कुम्हार का अवा (एक बड़ा सा गड्ढा, जिसमें मिट्टी के बर्तन पकाये जाते हैं) था। अम्मा उसमें जाकर बैठ गयी थी। वह एक दो बार खाँसी तो कुम्हार की नींद खुल गयी। डरकर वह बार-बार पूछने लगा- ‘को ऐ तू?’ अम्मा ने काफी देर बाद जबाब दिया- ‘बौहरे की माँ ऊँ।’ पर कुम्हार उसे नहीं पहचान पाया, क्योंकि अँधेरा बहुत था। थोड़ी देर बाद एक दूसरे कुम्हार ने उसे पहचान लिया। तब उसने हमें आवाज लगायी और तब पिताजी उसे उठाकर लाये। अम्मा जाड़े से काँप रही थी तथा गुस्से में भी थी। हमारे एक चाचाजी श्री हीरा लाल ने पूछा- ‘मौसी, तू कहाँ भाजि गयी?’, तो जबाब में मौसी ने उनके गाल पर थप्पड़ जड़ दिया। सब हमारी अम्मा को ‘मौसी’ कहते थे, क्योंकि उनकी बड़ी बहिन का विवाह हमारे बाबा के बड़े भाई श्री शंकर लाल, जो बाद में स्वामी शंकरानन्द जी सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए, के साथ हुआ था। हमारे पिताजी तथा दोनों चाचाजी भी अम्मा को मौसी ही कहते थे।
इस घटना के बाद हम सब बहुत सावधान हो गये थे, मगर सौभाग्य से अम्मा का दिमाग भी सुधर गया। इसके बाद वह तीन साल तक और जिन्दा रहीं। मुझे अम्मा बहुत प्यार करती थीं। कभी माताजी मुझे पीटती थीं तो अम्मा ही बचाया करती थी। सबेरे-सबेरे जब हम सोती, उनींदी, जागती सी हालत में होते थे, तो अम्मा एक गीत गुनगुनाया करती थी-
जागौ रे मेरे कृस्न कन्हैया
गइया ऊ जागी, बछड़ा ऊ जागे, जागे रे गइयन के दुहैया।।
जसोदा ऊ जागी, नन्द बाबा ऊ जागे, जागे रे बलदाऊ भैया।।
जागो रे मेरे कृस्न कन्हैया।
यह गीत मुझे बहुत अच्छा लगता था, इसलिए मैं प्रायः अम्मा से इसे गाने के लिए कहा करता था।
मेरे पिताजी श्री छेदा लाल अग्रवाल हैं, जो परिवार में ‘छिद्दा’ नाम से जाने जाते हैं। उन्होंने कभी कहीं पर (शायद राया कस्बे में) हिसाब-किताब लिखने का काम किया था अर्थात् मुनीमगीरी की थी, इसलिए वे गाँव में ‘मुनीम जी’ उपनाम से विख्यात हैं। पिताजी को हम सब पहले भैया कहकर पुकारते थे। भैया पुराने जमाने के कक्षा 8 पास हैं, जो कि उन दिनों काफी ऊँची समझी जाती थी। अगर वे चाहते तो आसानी से मास्टर हो सकते थे और कालान्तर में हैड मास्टर भी, मगर पता नहीं क्या सोचकर उन्होेंने ‘मास्टरी’ के बजाय ‘मुनीमगीरी’ को ही पसन्द किया। वे उर्दू और अंकगणित के अच्छे जानकार हैं। मैंने भी उनसे उर्दू सीखी है।
पिताजी ने बाद में मुनीमगीरी छोड़कर अपने दोनों छोटे भाइयों के साथ रेडीमेड कपड़े की दुकान कर ली, जो कि बहुत सफल रही। वे कटपीस और थान मँगाया करते थे और खुद काटकर और अपनी दुकान पर कारीगरों से सिलवाकर थोक तथा खेरीज (यानी फुटकर) में बेचा करते थे। हमारे बड़े चाचाजी श्री रामजी लाल और छोटे चाचाजी श्री शिवनन्दन लाल सिले हुए कपड़े साइकिल पर लादकर आसपास के गाँवों की साप्ताहिक पेंठों (हाटों) में ले जाकर बेचा करते थे। एक जमाने में हमारे यहाँ आठ सिलाई मशीनें तक चलती थीं तथा रोजाना सिले हुए कपड़ों का एक बड़ा गट्ठर बिक जाता था। प्रारम्भ में पेंठों में कपड़ा पहुँचाने के लिए हमारे यहाँ एक नौकर भी था, जिसका नाम था ‘जहाँगीर खाँ’, मगर कहते थे सब ‘झंगीरा’। वह नगाड़ा बजाने में बहुत निपुण था।
मेरी माता जी गाँव-मोहल्ले में ‘आगरेवारी’ के उपनाम से प्रसिद्ध हैं। हमारे यहाँ यह परम्परा है कि औरतों को उनके मायके के स्थान-नाम में वारी (या वाली) लगाकर पुकारा जाता है। जैसे आगरेवारी, मथुरावारी, दाऊजीवारी वगैरह-वगैरह। वैसे वहाँ ऊपरवाली, नीचेवाली, सामनेवाली, गलीवाली या चक्कीवाली भी समान रूप से उपयोगी हैं, मगर नानऊवाली, विसावलीवाली या अछनेरेवाली ज्यादा चलते हैं। कहने का मतलब यह कि हमारी माता जी का मायका आगरा में होने के कारण वे आगरेवारी के नामे से मशहूर हैं। वैसे हमारे लिए वे भाभी हैं (यानी हम सब उन्हें भाभी कहते हैं) और गाँव के लोगों के लिए ‘सेठानी’। मेरी माता जी काफी धार्मिक महिला हैं। गाँव में एक वही ऐसी थीं, जो नियमित रूप से रामायण बाँचती थीं। परिवार में होने वाले ब्याह शादी में गीतों का मोर्चा भी उसे सँभालना होता था। कुल मिलाकर गाँव-मुहल्ले में उसकी काफी इज्जत थी और है।
अपने बचपन के प्रारम्भ में मेरे ऊपर सबसे ज्यादा प्रभाव अपनी माताजी का पड़ा था। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मैं करीब 2-3 वर्ष का था, तो मेरे पास लोहे की एक खंजरी थी। रोज शाम को उसे बजा-बजाकर मैं छत पर पिताजी तथा माताजी के सामने नाचा करता था। माताजी गीत गाया करती थीं। मुझे उसमें बहुत आनन्द आता था। एक खंजरी टूट जाने के बाद फौरन ही दूसरी खंजरी ला दी गयी थी। तभी अचानक यह सब बन्द हो गया, क्यों यह मुझे याद नहीं। माताजी का कहना है कि मुझे किसी की नजर लग गयी थी और मेरे पैरों को लकवा मारते-मारते बचा था। पहले मैंने इस बात पर विश्वास कर लिया था, पर अब नहीं होता। मेरे विचार से हुआ यह होगा कि नित्य 2-2 घंटे नृत्य करने के कारण पड़े दबाब को मेरे कमजोर पैर झेल न पाये होंगे, इसलिए बीमार पड़ गया होऊँगा। जो भी हो, यह सही है कि उसके बाद मेरा नृत्य बिल्कुल बन्द हो गया। यों मैं नृत्य का शौकीन आज भी हूँ और यदा-कदा अपनी भाभियों के सामने एक-आध ठुमका लगा दिया करता हूँ। होली पर नाचना तो मुझे हद से ज्यादा पसन्द है ही।
मैं अपने बचपन के प्रारम्भ में काफी धार्मिक था। मुझे माँ रोज रामायण, महाभारत और पुराणों की कहानियाँ सुनाया करती थी, जिन पर मैं आँख मूँदकर विश्वास कर लिया करता था। भक्त प्रहलाद और ध्रुव की कहानियाँ सुनकर मैं उनके समान ही भक्त बनने के सपने देखा करता था। कई भजन तथा प्रार्थनायें माँ ने मुझे याद करा दी थीं तथा उन्हें हम रात को सोते समय या सुबह जागने के बाद गाया करते थे। बाद में मैंने पूजा करना भी शुरू कर दिया और हनुमान चालीसा पढ़ने का भी नियम बनाया। यह बात अलग है कि मैं इनको ज्यादा दिनों तक जारी नहीं रख पाता था। कारण यह कि मैं स्वभाव से ही कुछ मनमौजी और आलसी किस्म का हूँ। नियमों में बँधने से मुझ अरुचि थी। हालांकि मैं किसी नियम का कुछ दिन तक पालन जरूर करता था। मगर यह अरुचि पहले ही दिन से शुरू हो जाती थी कि अब मुझे नियम में बँधना पड़ेगा। किसी तरह मैं उस कार्य (जैसे चालीसा पढ़ना) को जारी रखता और बीच-बीच में आलस की वजह से कभी-कभी छोड़ भी देता। जब कभी अरुचि ज्यादा बढ़ जाती तो उस काम को बिल्कुल बन्द कर देता था।
मेरे तीन बड़े भाई हैं। सबसे बड़े श्री महावीर प्रसाद अग्रवाल, पहले उ.प्र. गन्ना शोध संस्थान, शाहजहाँपुर और फिर मुजफ्फर नगर में सेवा करते थे। आजकल वे फरह मथुरा में बकरी शोध संस्थान में सेवारत हैं। दूसरे भाई श्री राममूर्ति सिंघल डाक्टर हैं। आगरा के सरोजिनी नायडू मेडीकल कालेज से एमबीबीएस करने के बाद वहीं से एनीस्थिसिया में एमडी की उपाधि प्राप्त की है और आजकल आगरा में ही रहकर प्राइवेट प्रेक्टिस करते हैं। तीसरे भाई श्री गोविन्द स्वरूप सिंघल एम.काॅम. कर चुके हैं और पंजाब नेशनल बैंक में अधिकारी हैं। वे अभी अविवाहित हैं। भाइयों में सबसे छोटा मैं हूँ। मेरी दो बहनें भी हैं- गीता और सुनीता, जो दोनों ही मुझसे छोटी हैं। अभी उन दोनों का भी विवाह नहीं हुआ है।
(पादटीप- अब हम सभी भाई-बहिन विवाहित ही नहीं बल्कि नाना-नानी या बाबा भी बन चुके हैं। सभी भाई अवकाश ग्रहण करके अलग-अलग घरों में आगरा में ही रहते हैं। हमारे माताजी-पिताजी का देहान्त हो चुका है।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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