आत्मकथा भाग-1 अंश-9
अध्याय-3: अक्ल का पुतला
यादे माज़ी अज़ाब है या रब।
छीन ले मुझसे हाफिजा मेरा।।
जूनियर हाईस्कूल दघेंटा तीन गाँवों के बीचों-बीच स्थित है और उसमें तीनों गाँवों के छात्र पढ़ते हैं। वहाँ कक्षा 8 तक की पढ़ाई होती है। जब मैं कक्षा 5 में ही था, तो मुझसे एक साल आगे पढ़ने वाले लड़कों ने, जो तब तक दूसरे विद्यालय में पहुँच चुके थे, वहाँ के अध्यापकों को पहले ही बता दिया था कि अगले वर्ष यहाँ एक बहुत होशियार (प्रतिभाशाली के लिए गाँव में यही शब्द प्रयुक्त होता है) लड़का आने वाला है। अध्यापकों की प्रतिक्रिया क्या रही, यह तो पता नहीं, लेकिन इस होशियार लड़के का पहले दिन उस विद्यालय में पधारना काफी विलक्षण रहा।
हुआ यह कि विद्यालय खुलने तक मेरे सिर के बाल काफी बढ़ गये थे। अतः पिताजी ने सोचा कि अब इसका मुंडन करा दिया जाय। कई बार बाल कटवाने की सोची गयी, लेकिन कभी नाई नहीं मिलता था और कभी कोई और समस्या। आखिर विद्यालय जाने से ठीक एक दिन पहले एक नाई पकड़ में आ ही गया। मुझे उम्मीद थी कि वह सदा की तरह बाल काटने की मशीन से सिर के बाल साफ कर देगा। मैं सिर झुका कर बैठा ही था कि जाने कब नाई ने अपना उस्तरा निकाल लिया और मेरी आशा के विपरीत उसने मशीन के बजाय उस्तरे से मेरे सिर के बीच से कुछ बाल साफ कर दिये। उस्तरे के स्पर्श का ज्ञान होते ही मेरा पारा सातवें आसमान पर। मैं बहुत रोया-धोया मगर बेकार। नाई झूठ ही कहने लगा कि उसके पास मशीन नहीं है। पिताजी ने कहा- अब क्या हो सकता है? सारे बाल उस्तरे से ही साफ कराने होंगे। मजाक में कुछ लोगों ने बाल इसी तरह छोड़ देने की राय भी दी, लेकिन वह और ज्यादा बुरा होता। मरता क्या न करता? आखिर मुझे सारे बाल उस्तरे से ही साफ कराने पड़े। नाई ने पीछे एक लम्बी चोटी, जो मेरे हिन्दुत्व की पहचान थी, छोड़कर सारा सिर सफाचट कर दिया।
अगले दिन मैं अपना टी.सी. (स्थानान्तरण प्रमाण पत्र) लेकर जूनियर हाईस्कूल में पधारा। उस समय मेरी छटा देखने लायक थी। घुटा हुआ सिर और उस पर लम्बी चोटी, बड़े-बड़े बाहर निकले हुए दाँत, छोटा कद, दुबला-पतला शरीर, बुशशर्ट और नेकर, नंगे पैर - यह था मेरा हुलिया। जो भी परिचित या अपरिचित मुझे देखता, एक बार तो हँस ही देता। कुछ मनचले लड़के तो सिर पर टोला (उँगली की हड्डी) मारकर भी भाग जाते थे, यह कहते हुए कि देख लूँ कच्चा है कि पक्का। दाखिले की औपचारिकता पूरी होने के बाद मैं वहीं एक तरफ पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया।
उस समय मेरे बड़े भाई श्री गोविन्द स्वरूप कक्षा आठ में थे। उनके दो सहपाठी श्री रतन सिंह उर्फ रतनी और श्री भगत सिंह उर्फ भगती, जो काफी लम्बे थे तथा स्कूल के दादा माने जाते थे, मुझे देखकर काफी हँसे। उन्हें खेलने के लिए एक नया खिलौना जो मिल गया था। उन्होंने मुझे तरह-तरह से तंग करना और मजाक उड़ाना शुरू किया। घुटे सिर के कारण मैं हीनभावना से ग्रस्त था ही, परेशान किये जाने पर मैं रोने लगा। तुरन्त बात अध्यापकों तक पहुँची। एक अध्यापक श्री बल्लेराम जी मुझे तंग करने वाले दोनों लड़कों को प्रधानाध्यापक जी के पास ले गये और बोले- ”पंडितजी, देखौ, कहाँ तौ जे ऊँट और कहाँ जि बकरी कौ बच्चा। ये ऊँट जायै परेशान कर रए ऐं और जि रोबे लग गयौ ऐ।“
पंडित जी कुछ ऊँचा सुनते थे, अतः यह बात उन्होंने रुक-रुक कर और जरा जोर से कही थी। शीघ्र ही सारे लड़के आस-पास इकट्ठे हो गये थे। पंडित जी की समझ में कुछ आया, कुछ न आया। लेकिन इतना जरूर आ गया होगा कि ये बड़े लड़के इस छोटे बच्चे को परेशान कर रहे हैं। लिहाजा उन्होंने दोनों ऊँटों के कान ऐंठे और डाँटा। बकरी के बच्चे का रोना तब तक कम हो गया था। खैर बात समाप्त हुई और मैं उस दिन तुरन्त घर लौट आया।
इस तरह शुरूआत हुई मेरी पढ़ाई की उस स्कूल में जहाँ मैं आगे चलकर काफी प्रसिद्ध और लोकप्रिय हुआ। लेकिन यह प्रसिद्धि अनायास ही नहीं आ गयी थी और न इसके लिए मुझे कुछ खास प्रयत्न ही करना पड़ा था। कक्षा में घटी एक घटना के कारण मैं अपने एक अध्यापक की निगाह में पहली बार आया। वह घटना यों है।
हमें विद्यालय में आये मुश्किल से पन्द्रह दिन ही हुए थे। अध्यापक हम सब लड़कों को (लड़कियों को भी) अबोध ही मानते थे, अतः विषय के अलावा तरह-तरह के लैक्चर पिलाया करते थे। उनका मुख्य जोर प्रायः इस बात पर होता था कि पुराने स्कूल की गन्दी आदतें वहीं पर छोड़ आइये। एक बार विज्ञान के अध्यापक श्री राम खिलाड़ी जी हमें कुछ ‘जीवनोपयोगी’ बातें बता रहे थे। बीच में वे बोले- ”भगवान बुद्ध ने कहा था - जियो और...।“ बोलते हुए उन्होंने कक्षा की तरफ इस आशा में देखा कि कोई इस वाक्य को पूरा करेगा। लेकिन सारे लड़के उनके मुँह की तरफ ताक ही रहे थे कि मैंने वाक्य पूरा कर दिया- ”...जीने दो।“ तुरन्त ही उनका ध्यान मेरी तरफ गया और आश्चर्य से देखने लगे कि यह घुटे सिर वाला, बड़े-बड़े दाँतों वाला और मरियल-सा बच्चा इतनी ऊँची बात कैसे कह सकता है। उनकी जिज्ञासा बढ़ी और कुछ पूछ-ताछ के बाद समझ गये कि कक्षा में कम से कम यह एक लड़का ऐसा है जो मिट्टी का माधो नहीं है।
आप आश्चर्य करेंगे कि मैने यह वाक्य कहाँ से सीख लिया था। इसका रहस्य यह है कि एक बार मैं पिताजी के साथ मथुरा शहर गया था। वहाँ दीवारों पर तरह-तरह की फिल्मों के पोस्टर चिपके ही रहते हैं। अपने जिज्ञासु स्वभाव के कारण मैं उन पोस्टरों पर मोटे-मोटे लिखे हुए शब्दों को पढ़ता रहा था। उन्हीं में ‘जियो और जीने दो’ नामक फिल्म के पोस्टर भी थे। उसी समय पढ़े हुए ये शब्द मेरे दिमाग के किसी कोने में कहीं जम गये होंगे (स्टोर हो गये होंगे), जो कक्षा में उस समय याद आ गये।
स्कूल के अन्य अध्यापकों की निगाह में मैं कैसे आया इसकी कहानी दूसरी है। हुआ यह कि सत्र की शुरुआत में (शायद अगस्त के महीने में), हमारे विद्यालय में छात्रसंघ के पदाधिकारी चुने जाने थे। निश्चित दिन छात्रों की सभा हुई। चुनने का तरीका यह था कि किसी पद के लिए कोई छात्र किसी दूसरे छात्र का नाम उम्मीदवारी के लिए प्रस्तावित करता था और कोई अन्य छात्र उसका अनुमोदन (समर्थन) करता था, तो वह छात्र उस पद के लिए उम्मीदवार मान लिया जाता था। अगर किसी पद के लिए एक से ज्यादा उम्मीदवार होते थे, तो हाथ उठाकर वोट दिये जाते थे, अन्यथा एक मात्र उम्मीदवार को निर्विरोध चुन लिया जाता था। इस प्रकार मेरे बड़े भाई श्री गोविन्द स्वरूप निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिये गये थे। अब महामंत्री पद का चुनाव होना था। उसके लिए एक छात्र ने श्री चन्द्रभान, जो मेरे भाई के सहपाठी थे, का नाम प्रस्तावित किया और अध्यक्ष चुन लिए गये मेरे भाई ने उनका समर्थन करना चाहा।
इसी बात पर अध्यापकों और छात्रों में विवाद हो गया। अध्यापकों का कहना था कि किसी पद के लिए चुन लिया गया कोई व्यक्ति किसी दूसरे पद के लिए कोई नाम प्रस्तावित या उसका समर्थन नहीं कर सकता, जबकि छात्रों का कहना था कि कर सकता है। यह व्यर्थ का वाद-विवाद मुझे बहुत अप्रिय लग रहा था। उनमें बहस चल ही रही थी कि मैंने पीछे से चिल्लाकर कहा- ”मैं इसका समर्थन करता हूँ“ और बहस वहीं समाप्त हो गयी। अध्यापकों ने मेरी त्वरित बुद्धि की सराहना की और जिज्ञासा व्यक्त की कि यह कौन है। तब किसी ने बताया कि ‘गोविन्दा कौ भैया ऐ’। तब अध्यापकों ने और भी ज्यादा प्रशंसा की कि दोनों भाई बहुत तेज और बुद्धिमान हैं। इस एक घटना से ही मैं पूरे विद्यालय में प्रसिद्ध हो गया, हालांकि मुझे वहाँ आये मुश्किल से एक-डेढ़ माह ही हुए थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
यादे माज़ी अज़ाब है या रब।
छीन ले मुझसे हाफिजा मेरा।।
जूनियर हाईस्कूल दघेंटा तीन गाँवों के बीचों-बीच स्थित है और उसमें तीनों गाँवों के छात्र पढ़ते हैं। वहाँ कक्षा 8 तक की पढ़ाई होती है। जब मैं कक्षा 5 में ही था, तो मुझसे एक साल आगे पढ़ने वाले लड़कों ने, जो तब तक दूसरे विद्यालय में पहुँच चुके थे, वहाँ के अध्यापकों को पहले ही बता दिया था कि अगले वर्ष यहाँ एक बहुत होशियार (प्रतिभाशाली के लिए गाँव में यही शब्द प्रयुक्त होता है) लड़का आने वाला है। अध्यापकों की प्रतिक्रिया क्या रही, यह तो पता नहीं, लेकिन इस होशियार लड़के का पहले दिन उस विद्यालय में पधारना काफी विलक्षण रहा।
हुआ यह कि विद्यालय खुलने तक मेरे सिर के बाल काफी बढ़ गये थे। अतः पिताजी ने सोचा कि अब इसका मुंडन करा दिया जाय। कई बार बाल कटवाने की सोची गयी, लेकिन कभी नाई नहीं मिलता था और कभी कोई और समस्या। आखिर विद्यालय जाने से ठीक एक दिन पहले एक नाई पकड़ में आ ही गया। मुझे उम्मीद थी कि वह सदा की तरह बाल काटने की मशीन से सिर के बाल साफ कर देगा। मैं सिर झुका कर बैठा ही था कि जाने कब नाई ने अपना उस्तरा निकाल लिया और मेरी आशा के विपरीत उसने मशीन के बजाय उस्तरे से मेरे सिर के बीच से कुछ बाल साफ कर दिये। उस्तरे के स्पर्श का ज्ञान होते ही मेरा पारा सातवें आसमान पर। मैं बहुत रोया-धोया मगर बेकार। नाई झूठ ही कहने लगा कि उसके पास मशीन नहीं है। पिताजी ने कहा- अब क्या हो सकता है? सारे बाल उस्तरे से ही साफ कराने होंगे। मजाक में कुछ लोगों ने बाल इसी तरह छोड़ देने की राय भी दी, लेकिन वह और ज्यादा बुरा होता। मरता क्या न करता? आखिर मुझे सारे बाल उस्तरे से ही साफ कराने पड़े। नाई ने पीछे एक लम्बी चोटी, जो मेरे हिन्दुत्व की पहचान थी, छोड़कर सारा सिर सफाचट कर दिया।
अगले दिन मैं अपना टी.सी. (स्थानान्तरण प्रमाण पत्र) लेकर जूनियर हाईस्कूल में पधारा। उस समय मेरी छटा देखने लायक थी। घुटा हुआ सिर और उस पर लम्बी चोटी, बड़े-बड़े बाहर निकले हुए दाँत, छोटा कद, दुबला-पतला शरीर, बुशशर्ट और नेकर, नंगे पैर - यह था मेरा हुलिया। जो भी परिचित या अपरिचित मुझे देखता, एक बार तो हँस ही देता। कुछ मनचले लड़के तो सिर पर टोला (उँगली की हड्डी) मारकर भी भाग जाते थे, यह कहते हुए कि देख लूँ कच्चा है कि पक्का। दाखिले की औपचारिकता पूरी होने के बाद मैं वहीं एक तरफ पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया।
उस समय मेरे बड़े भाई श्री गोविन्द स्वरूप कक्षा आठ में थे। उनके दो सहपाठी श्री रतन सिंह उर्फ रतनी और श्री भगत सिंह उर्फ भगती, जो काफी लम्बे थे तथा स्कूल के दादा माने जाते थे, मुझे देखकर काफी हँसे। उन्हें खेलने के लिए एक नया खिलौना जो मिल गया था। उन्होंने मुझे तरह-तरह से तंग करना और मजाक उड़ाना शुरू किया। घुटे सिर के कारण मैं हीनभावना से ग्रस्त था ही, परेशान किये जाने पर मैं रोने लगा। तुरन्त बात अध्यापकों तक पहुँची। एक अध्यापक श्री बल्लेराम जी मुझे तंग करने वाले दोनों लड़कों को प्रधानाध्यापक जी के पास ले गये और बोले- ”पंडितजी, देखौ, कहाँ तौ जे ऊँट और कहाँ जि बकरी कौ बच्चा। ये ऊँट जायै परेशान कर रए ऐं और जि रोबे लग गयौ ऐ।“
पंडित जी कुछ ऊँचा सुनते थे, अतः यह बात उन्होंने रुक-रुक कर और जरा जोर से कही थी। शीघ्र ही सारे लड़के आस-पास इकट्ठे हो गये थे। पंडित जी की समझ में कुछ आया, कुछ न आया। लेकिन इतना जरूर आ गया होगा कि ये बड़े लड़के इस छोटे बच्चे को परेशान कर रहे हैं। लिहाजा उन्होंने दोनों ऊँटों के कान ऐंठे और डाँटा। बकरी के बच्चे का रोना तब तक कम हो गया था। खैर बात समाप्त हुई और मैं उस दिन तुरन्त घर लौट आया।
इस तरह शुरूआत हुई मेरी पढ़ाई की उस स्कूल में जहाँ मैं आगे चलकर काफी प्रसिद्ध और लोकप्रिय हुआ। लेकिन यह प्रसिद्धि अनायास ही नहीं आ गयी थी और न इसके लिए मुझे कुछ खास प्रयत्न ही करना पड़ा था। कक्षा में घटी एक घटना के कारण मैं अपने एक अध्यापक की निगाह में पहली बार आया। वह घटना यों है।
हमें विद्यालय में आये मुश्किल से पन्द्रह दिन ही हुए थे। अध्यापक हम सब लड़कों को (लड़कियों को भी) अबोध ही मानते थे, अतः विषय के अलावा तरह-तरह के लैक्चर पिलाया करते थे। उनका मुख्य जोर प्रायः इस बात पर होता था कि पुराने स्कूल की गन्दी आदतें वहीं पर छोड़ आइये। एक बार विज्ञान के अध्यापक श्री राम खिलाड़ी जी हमें कुछ ‘जीवनोपयोगी’ बातें बता रहे थे। बीच में वे बोले- ”भगवान बुद्ध ने कहा था - जियो और...।“ बोलते हुए उन्होंने कक्षा की तरफ इस आशा में देखा कि कोई इस वाक्य को पूरा करेगा। लेकिन सारे लड़के उनके मुँह की तरफ ताक ही रहे थे कि मैंने वाक्य पूरा कर दिया- ”...जीने दो।“ तुरन्त ही उनका ध्यान मेरी तरफ गया और आश्चर्य से देखने लगे कि यह घुटे सिर वाला, बड़े-बड़े दाँतों वाला और मरियल-सा बच्चा इतनी ऊँची बात कैसे कह सकता है। उनकी जिज्ञासा बढ़ी और कुछ पूछ-ताछ के बाद समझ गये कि कक्षा में कम से कम यह एक लड़का ऐसा है जो मिट्टी का माधो नहीं है।
आप आश्चर्य करेंगे कि मैने यह वाक्य कहाँ से सीख लिया था। इसका रहस्य यह है कि एक बार मैं पिताजी के साथ मथुरा शहर गया था। वहाँ दीवारों पर तरह-तरह की फिल्मों के पोस्टर चिपके ही रहते हैं। अपने जिज्ञासु स्वभाव के कारण मैं उन पोस्टरों पर मोटे-मोटे लिखे हुए शब्दों को पढ़ता रहा था। उन्हीं में ‘जियो और जीने दो’ नामक फिल्म के पोस्टर भी थे। उसी समय पढ़े हुए ये शब्द मेरे दिमाग के किसी कोने में कहीं जम गये होंगे (स्टोर हो गये होंगे), जो कक्षा में उस समय याद आ गये।
स्कूल के अन्य अध्यापकों की निगाह में मैं कैसे आया इसकी कहानी दूसरी है। हुआ यह कि सत्र की शुरुआत में (शायद अगस्त के महीने में), हमारे विद्यालय में छात्रसंघ के पदाधिकारी चुने जाने थे। निश्चित दिन छात्रों की सभा हुई। चुनने का तरीका यह था कि किसी पद के लिए कोई छात्र किसी दूसरे छात्र का नाम उम्मीदवारी के लिए प्रस्तावित करता था और कोई अन्य छात्र उसका अनुमोदन (समर्थन) करता था, तो वह छात्र उस पद के लिए उम्मीदवार मान लिया जाता था। अगर किसी पद के लिए एक से ज्यादा उम्मीदवार होते थे, तो हाथ उठाकर वोट दिये जाते थे, अन्यथा एक मात्र उम्मीदवार को निर्विरोध चुन लिया जाता था। इस प्रकार मेरे बड़े भाई श्री गोविन्द स्वरूप निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिये गये थे। अब महामंत्री पद का चुनाव होना था। उसके लिए एक छात्र ने श्री चन्द्रभान, जो मेरे भाई के सहपाठी थे, का नाम प्रस्तावित किया और अध्यक्ष चुन लिए गये मेरे भाई ने उनका समर्थन करना चाहा।
इसी बात पर अध्यापकों और छात्रों में विवाद हो गया। अध्यापकों का कहना था कि किसी पद के लिए चुन लिया गया कोई व्यक्ति किसी दूसरे पद के लिए कोई नाम प्रस्तावित या उसका समर्थन नहीं कर सकता, जबकि छात्रों का कहना था कि कर सकता है। यह व्यर्थ का वाद-विवाद मुझे बहुत अप्रिय लग रहा था। उनमें बहस चल ही रही थी कि मैंने पीछे से चिल्लाकर कहा- ”मैं इसका समर्थन करता हूँ“ और बहस वहीं समाप्त हो गयी। अध्यापकों ने मेरी त्वरित बुद्धि की सराहना की और जिज्ञासा व्यक्त की कि यह कौन है। तब किसी ने बताया कि ‘गोविन्दा कौ भैया ऐ’। तब अध्यापकों ने और भी ज्यादा प्रशंसा की कि दोनों भाई बहुत तेज और बुद्धिमान हैं। इस एक घटना से ही मैं पूरे विद्यालय में प्रसिद्ध हो गया, हालांकि मुझे वहाँ आये मुश्किल से एक-डेढ़ माह ही हुए थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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