आत्मकथा भाग-1 अंश-25
बी.एससी. में पढ़ने के हमारे वे दिन बहुत ही मौजमस्ती के दिन थे। हमेशा की तरह मैं पैदल ही काॅलेज जाता था, जो हमारे घर से मुश्किल से एक-सवा किलोमीटर दूर था। काॅलेज स्टूडेन्ट कहलाने का गर्व और काॅलेज का उन्मुक्त वातावरण हमें बरबस कालेज खींच लाता था। इसके अतिरिक्त पढ़ाई के अलावा अन्य गतिविधियों में भी मेरी रुचि थी। अपने साथियों में मैं काफी लोकप्रिय था और आश्चर्यजनक रूप से पिछली कक्षाओं के विपरीत यहाँ मेरा किसी से झगड़ा भी नहीं चलता था। इसका परिणाम यह हुआ कि पिछली कक्षाओं में मैं जहाँ दूसरों से अलग-थलग रहता था, वहाँ इन कक्षाओं में एक महत्वपूर्ण छात्र की तरह भाग लेता था। लड़के प्रायः मुझसे शेर सुनाने का आग्रह किया करते थे, जिस मैं पूरा करता था। कभी-कभी अपनी रची हुई कविताएं भी सुनाता था।
मुझे याद है, एक बार मेरे एक घनिष्ट मित्र और सहपाठी श्री रामेश्वर सिंह सोलंकी थे, जो बाद में गणित के एम.एससी. करने लगे थे, मेरी एक कापी में चुपचाप लिख दिया था-
मेंहदी रंग देती है सूख जाने के बाद।
यार तेरी याद आती है तेरे जाने के बाद।।
मेंहदी रंग देती है सूख जाने के बाद।
यार तेरी याद आती है तेरे जाने के बाद।।
हाँ, अपनी सहपाठिनियों के साथ मैं इतना घनिष्ट नहीं था। यों कभी-कभी काम पड़ने पर हम बातें कर लेते थे, लेकिन बाकी समय अलग-अलग ही बने रहते थे। कुछ लड़के, जो लड़कियों से घनिष्टता बनाना चाहते थे, हमारे समूह में व्यंग्य के पात्र समझे जाते थे।
हमारी कक्षा में पाँच लड़कियाँ थी, जो गणित तथा सांख्यिकी की कक्षा में हमारे साथ पढ़ती थीं। अर्थशास्त्र विषय उनके पास नहीं था, वे भौतिक विज्ञान की छात्राएं थीं। अर्थशास्त्र विषय के घंटों में अलग-अलग बैठती थीं। सेंट जाॅह्न्स काॅलेज आगरा की महात्मा गाँधी रोड (ठंडी सड़क) के दोनों तरफ बना हुआ है। एक तरफ की इमारतों में गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान तथा जीव विज्ञान की कक्षाएं लगती थीं तथा दूसरी ओर की इमारत में, जो कि मुख्य इमारत थी, अन्य सभी विषयों की कक्षाएं लगती थीं। अतः प्रायः हर घंटे के बाद हमें सड़क के इस ओर से उस ओर जाना पड़ता था। इसमें लगभग दो मिनट लगते थे, लेकिन इन्हीं दो मिनटों में हमारी सारी बोरियत दूर हो जाती थी और अगले घंटे में पढ़ने के लिए हम ताजा दम हो जाते थे।
हमारी सहपाठिनियों में सबसे तेज थी कु. नीलम खन्ना, जो पंजाबी थी, कुछ मोटी होने के कारण लड़कों द्वारा पीठ पीछे ‘मोटी’ कही जाती थी। वह काफी सुन्दर और स्मार्ट थी। उसका चेहरा लगभग तीन साल की बच्ची जैसा था। विशेष रूप से सांख्यिकी कक्षा में वह बहुत खिलखिलाया करती थी, जो हमें बहुत प्यारी लगती थी। उसकी मासूम खिलखिलाहट की मुझे आज भी बहुत याद आती है। वह काफी होशियार भी थी और गणित में उसके अंक मुझसे काफी ज्यादा थे। बी.एससी. करने के बाद वह गणित में एम.एससी. करने चली गयी थी और फिर वहीं से पी.एचडी. कर रही थी। आजकल वह कहाँ पर है यह मुझे ज्ञात नहीं है। लेकिन पता चला है कि किसी डाक्टर से विवाह करके बम्बई (अब मुम्बई) चली गयी है।
मेरी दूसरी सहपाठिनी थी कु. सुनीता मल्होत्रा। वह भी पंजाबी थी और कक्षा में तथा कक्षा के बाहर नीलम के साथ ही रहा करती थी। इसके बावजूद वह नीलम से एकदम विपरीत बहुत शान्त स्वभाव की थी और बहुत जरूरत पड़ने पर ही हँसा करती थी। बी.एससी. के बाद वह अर्थशास्त्र में एम.ए. करने लगी थी, लेकिन एक साल बाद ही हमारे ही इन्स्टीट्यूट में एम.स्टेट. करने आ गयी थी। आजकल शायद वह कहीं टीचर है।
मेरी तीसरी और सबसे प्रिय सहपाठिनी थी कु. कल्पना कपूर। यह भी पंजाबी थी और सबसे ज्यादा सुन्दर थी। बी.एससी. में वह बहुत शान्त रहती थी और बहुत कम बोला करती थी। मुझे याद नहीं आता अगर मैंने कभी भी बी.एससी. में उससे एक शब्द भी बोला हो। लेकिन बाद में उसने मेरे ही साथ एम.स्टेट. में प्रवेश लिया था। एम.स्टेट. के दिनों में ही हम बहुत घनिष्ट हो गये थे और घंटों बातें करते रहते थे। इस बारे में मैं विस्तार से अगले अध्याय में लिखूँगा।
एक घटना मुझे याद आती है। एक बार अंसारी साहब कक्षा में ‘टेस्टिंग आॅफ हाइपोथीसिस’ पढ़ा रहे थे जिसका हिन्दी अनुवाद उन्होंने ‘परिकल्पना का परीक्षण’ किया। मैंने मजाक में कहा था- ‘सर, ‘परि’ क्यों लगा दी है? इसे हटा दीजिए।’ इस पर सारी कक्षा में जोरदार हँसी गूँज उठी थी और बेचारी कल्पना बहुत बुरी तरह शर्मा गयी थी। उसका शर्म से लाल पड़ गया चेहरा, उस समय मुझे बहुत प्यारा लगा था।
हमारी चौथी सहपाठिनी थी कु. माधवी बनर्जी। वह बंगाली थी और सुन्दर होने के बावजूद बुढ़िया सी लगती थी। वह कक्षा में और बाहर भी चुप-चुप रहती थी, लेकिन पढ़ने में काफी तेज थी और खाली समय में अंग्रेजी उपन्यास पढ़ा करती थी।
आप यह जानकर आश्चर्य करेंगे कि उन दिनों मैं अंग्रेजी से बहुत चिढ़ता था। इसका कारण मेरा हिन्दी समर्थक होना तो था ही, शायद यह भी था कि मैं अंग्रेजी बोलने और तेज गति से पढ़ने में असमर्थ था। बी.एससी. के दिनों में ही मैंने अंग्रेजी समाचार पत्र कुछ-कुछ पढ़ना शुरू किया था और फिर समाचार पढ़कर अच्छी तरह समझ लेता था। लेकिन अंग्रेजी की साहित्यिक किताबों और उपन्यासों आदि से मेरी अरुचि बराबर बनी हुई थी। इस स्थिति में अंग्रेजी के उपन्यास पढ़ने वाली एक लड़की हमारे लिए आश्चर्य का विषय थी। अंग्रेजी पुस्तकों के प्रति मेरी विरक्ति किस तरह समाप्त हुई और मैंने किस तरह फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना सीखा, इसका उल्लेख अगले अध्याय में करूँगा।
हमारी कक्षा में एक लड़की और थी- कु. निरुपमा अग्रवाल। वह भी बहुत सुन्दर थी, पर कक्षाओं में कम आती थी और दूसरी लड़कियों से भी उसकी घनिष्टता नहीं थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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