आत्मकथा भाग-1 अंश-23

अध्याय-6: मौजमस्ती के दिन
मिले तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबाँ।
भूले तो यूँ कि गोया कभी आशना न थे।।
इन्टर पास करने के बाद मैं अपनी जिन्दगी के एक चौराहे पर खड़ा था। जब तक आप इन्टर में पढ़ते रहते हैं, तब तक भविष्य की इतनी चिन्ता नहीं होती और प्रायः सोचा करते हैं कि भविष्य के बारे में इन्टर करने के बाद सोचा जायेगा। लेकिन इन्टर करने के बाद आपको निर्णय लेने के लिए बाध्य होना ही पड़ता है। आप अपनी क्षमताओं ओर अक्षमताओं का अपने हिसाब से विश्लेषण करते हैं और उसके आधार पर अपना रास्ता निश्चित करते हैं। कभी-कभी ऐसा निर्णय लेना बहुत मुश्किल हो जाता है, यहाँ तक कि आप जाने-अनजाने किसी एक रास्ते की ओर धकेल दिये जाते हैं।
मैं भी उस बिन्दु पर पहुँच चुका था। मेरे सामने कई रास्ते खुले हुए थे, लेकिन बढ़ती हुई बेरोजगारी और अपनी सुनने की असमर्थता को देखते हुए मुझे ऐसा निर्णय लेना था, जो मेरे भविष्य को बनाने में समर्थ हो सके। उस बिन्दु पर लिया गया कोई भी गलत निर्णय मेरे भविष्य को घोर अंधकारमय बना सकता था। कई ऐसे क्षण उपस्थित भी हुए, लेकिन मैं ईश्वर को धन्यवाद देना चाहूँगा कि उसने मुझे अंधकार में भटकने से बचा लिया।
मैं अपने भविष्य की संभावनाओं पर पहले भी कई बार विचार कर चुका था और मेरी महत्वाकांक्षा साहित्यकार या कार्टूनिस्ट बनने की थी। लेकिन जब मैंने गहराई से विचार किया तो पाया कि ये व्यवसाय मुझे दिखावटी प्रतिष्ठा तो दे सकते थे, लेकिन पेट के लिए पर्याप्त रोटी देने में असमर्थ ही रहते। अतः मैंने तय किया कि मुझे सबसे पहले अपनी आर्थिक निश्चिन्तता का उपाय करना चाहिए। इधर से निश्चिन्त होने पर ही साहित्य के बारे में सोचा जा सकता है। मैं उन दिनों काफी उग्र सरकार विरोधी विचारों का था और देश में इमर्जेन्सी भी लगी हुई थी, अतः मैं किसी भी हालत में सरकारी नौकरी में नहीं जाना चाहता था। मैं सोचता था कि अपना स्वाभिमान खोकर नौकरी करने से अच्छा है कि मैं मजदूरी करके अपना पेट भरूँ। मैं कपड़े सिलने का अच्छा जानकार था, हालांकि कटिंग करना नहीं जानता था, पर वह सीखा जा सकता था। अतः मेरा निश्चय था कि अगर मैं सब तरह से अच्छी आजीविका प्राप्त करने में असफल हो गया, तो भी मैं कपड़े सिलकर अपने खर्च लायक पर्याप्त धन कमा सकता हूँ।
लेकिन मेरी हार्दिक इच्छा अपना कोई स्वतंत्र व्यवसाय करने की थी। काफी विचार करने के बाद मैंने तय किया था कि मैं पढ़ाई पूरी करने पर कोई छोटा-मोटा कारखाना शुरू करूँगा। मोमबत्ती बनाने से लेकर प्लास्टिक के खिलौने बनाने तक की संभावनाओं पर मैंने विचार कर लिया था। लेकिन कोई कारखाना लगाने के लिए धन के अतिरिक्त मुझे पर्याप्त तकनीकी जानकारी होना आवश्यक था। अतः मेरी इच्छा मैकेनिकल या केमीकल इंजीनियरिंग का कोर्स करने की थी। मैं उस वर्ष आई.आई.टी. की प्रवेश परीक्षा में नहीं बैठ सका, क्योंकि मेरा विचार था कि अपनी सुनने की असमर्थता के कारण मुझे इस कोर्स के लिए नहीं चुना जायेगा। कई लड़कों ने कहा भी था कि इसे करने के लिए शारीरिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है। अतः मैंने आई.आई.टी. जाने का विचार त्याग दिया।
तब मैंने विचार बनाया कि मुझे दयाल बाग के इंजीनियरिंग कालेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग का कोर्स करना चाहिए। लेकिन मुझे आशंका थी कि कानों की वजह से शायद मुझे उसमें प्रवेश नहीं दिया जायेगा। आगे चलकर मेरी आशंका सही निकली। मेरे भाईसाहब श्री राम मूर्ति सिंघल, जो उन दिनों एम.बी.बी.एस. कर रहे थे, उस कालेज के प्रिंसीपल से मिलने गये और उनसे मेरे प्रवेश की संभावनाओं के बारे में पूछा। प्रिंसीपल साहब ने उनसे साफ शब्दों में मना कर दिया। अतः इंजीनियरिंग करने का विचार भी मुझे छोड़ देना पड़ा।
अब मेरे सामने इसके सिवा और कोई चारा नहीं था कि मैं बी.एससी. में दाखिला लेकर अपनी पढ़ाई जारी रखता और एम.एससी. करने के बाद ही किसी नौकरी आदि की तलाश करता। आगरा में तीन कालेज हैं जहाँ बी.एससी. की पढ़ाई की जाती है। उनमें सबसे बड़ा और पुराना कालेज है आगरा कालेज, जिसने बड़े-बड़े महापुरुष दिये हैं। लेकिन उस समय यह कालेज छात्रों की उच्छृंखलता और अनुशासनहीनता का पर्याय बन गया था, हिंसक वारदातें भी होती रहती थी, अतः मैं इसमें दाखिला लेने का अनिच्छुक था। एक और काॅलेज था राजा बलबन्त सिंह काॅलेज, लेकिन इसका शिक्षा स्तर अच्छा नहीं माना जाता था, अतः मैं इसमें भी नहीं पढ़ना चाहता था। इस प्रकार मेरे लिए तीसरा कालेज, जिसका नाम है सेंट जाॅह्न्स कालेज, ही उपयुक्त समझा गया, क्योंकि एक तो इसका स्तर भी अच्छा था, दूसरे इसमें अनुशासनहीनता नाममात्र को भी नहीं थी।
नियत समय पर मैंने अपना फार्म भरकर जमा कर दिया और प्रधानाचार्य जी ने मेरी सुनने की असमर्थता जानते हुए भी मुझे सहर्ष दाखिला दे दिया। कुछ इसलिए भी कि मैं 57 प्रतिशत अंकों से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण करके आया था, वह भी एक अच्छे और सामान्य इंटर कालेज से। उस समय सेंट जाॅह्न्स कालेज के प्रधानाचार्य थे श्री पी.आर. इट्यौरा, जिन्हें लड़के गलती से ‘इटारिया’ कहा करते थे। वे काफी सज्जन, सहृदय और अनुशासनप्रिय थे। उनके समय में जहाँ तक मुझे याद है किसी प्रकार की अनुशासनहीनता का मामला पैदा नहीं हुआ था।
इन्टर काॅलेज के एकदम विपरीत इस काॅलेज का वातावरण बहुत उन्मुक्त था। पहले जहाँ हमारी कक्षा में केवल लड़के ही लड़के थे, वहाँ इस कालेज में लड़कियों की भरमार थी। शुरू-शुरू में मैं तथा दूसरे साथी लड़के भी बहुत शर्मीले थे और लड़कियों के सामने बातें करने में झेंपते थे। लेकिन पीठ-पीछे तरह-तरह की टिप्पणियाँ जड़कर अपने मन की भड़ास निकाला करते थे। उस उम्र में इस प्रकार की हरकतें आश्चर्यजनक नहीं हैं, क्योंकि लगभग हर नवयुवक में इस प्रकार की कुंठाएँ होती हैं। लेकिन इससे आप यह न समझें कि मैं ऐसी हरकतों से सहमत था। सत्य तो यह है कि मुझे यह सब बहुत बुरा लगता था और मैं स्वयं किसी लड़की पर कोई गलत टिप्पणी नहीं करता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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