आत्मकथा भाग-1 अंश-22
मेरी ममेरी बहिन आरती उन दिनों कक्षा सात या आठ में पढ़ती थी। प्रायः मैं उसे हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, संस्कृत आदि विषय पढ़ाया करता था। हमारा घर भी मामाजी के घर के पास ही लोहामंडी के नयाबाँस मौहल्ले में था। उसी मौहल्ले में आरती की एक सहेली थी, जिसका नाम सुविधा के लिए हम ‘नीता’ रख लेते हैं। उसका असली नाम बताना मैं उचित नहीं समझता। वह काफी सुन्दर है और एक अच्छे ब्राह्मण परिवार से है। आरती के साथ ही मैं कभी-कभी उसे भी पढ़ाया करता था। जब मैं इण्टर में पहुँचा तो क्या हुआ, कब हुआ और कैसे हुआ, यह तो मुझे मालूम नहीं, लेकिन मैं उसकी तरफ आकर्षित हो गया। आरती से मैं प्रायः उसके बारे में बातें किया करता था और उसकी प्रशंसा करता था। कभी-कभी मैं उससे बातें करने की भी कोशिश करता था, लेकिन शायद वह मेरी नजरों में आये परिवर्तन को पहचान गयी और मुझसे कन्नी काटने लगी।
कहावत है कि इस तरह की बातें छुपाने से भी नहीं छुपती हैं। अतः एक दिन यह बात सब पर प्रकट हो गयी कि मैं उससे बातें करने की कोशिश करता हूँ। मुझे काफी डाँट पड़ी, लेकिन क्योंकि मैंने प्रत्यक्षतः कुछ नहीं किया था। अतः मुझे कोई सजा नहीं दी गयी, हालांकि उसकी धमकियाँ काफी दी गयी थीं। लेकिन इन धमकियों से लड़के प्रायः नहीं डरते और ज्यादा ढीठ हो जाते हैं। मेरे मामले में भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ। प्रत्यक्षतः मैंने आरती से उसके बारे में बातें करनी बंद कर दीं, लेकिन मन ही मन मैं उसे और ज्यादा चाहने लगा था। ‘नीता’ का नाम हर समय मेरे दिमाग में घूमता रहता था, लेकिन अपनी प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए मैं कोई ऐसी-वैसी हरकत नहीं करना चाहता था या कहिये कि मुझमें ऐसा करने की हिम्मत नहीं थी।
(पादटीप- मेरी ममेरी बहिन आरती का कम उम्र में ही कैंसर से देहान्त हो चुका है।)
(पादटीप- मेरी ममेरी बहिन आरती का कम उम्र में ही कैंसर से देहान्त हो चुका है।)
मुझे अपनी छात्रवृत्ति बचाने की और इण्टर में प्रथम श्रेणी लाने की भी चिन्ता थी, अतः मैंने अपना ध्यान पढ़ाई में लगाना तय किया। मेरी बोर्ड की परीक्षाएं पास थीं। इसलिए मैं प्रतिदिन एक-दो घंटे घर पर पढ़ने लगा। हालांकि यह समय ज्यादा नहीं है, क्योंकि प्रायः यह माना जाता है कि यदि बोर्ड की परीक्षाओं की तैयारी रात-रात भर जागकर भी की जाये, तो भी कम है। लेकिन मेरे लिए एक-दो घंटे पढ़ना भी बहुत ज्यादा था, क्योंकि इससे पहले मैंने कभी प्रतिदिन एक घंटा भी पढ़ाई नहीं की थी, चाहे मेरी बोर्ड की परीक्षाएं ही क्यों न हों। इसके विपरीत मैं परीक्षाओं के दिनों में भी मानसिक आराम के लिए वाचनालयों में जाता रहता था और नित्य अखबार भी पढ़ा करता था। वह आदत इस बार भी बनी हुई थी, लेकिन अन्तर सिर्फ इतना था कि इस बार मैं 1-2 घंटे प्रतिदिन पढ़ाई भी कर रहा था।
अपनी परीक्षाओं तक मैंने इतनी तैयारी कर ली थी कि मुझे विश्वास था कि कम से कम प्रथम श्रेणी के अंक तो आ ही जायेंगे। चाहे 70 प्रतिशत न आयें। यह बात और थी कि ‘नीता’ का नाम पढ़ते समय भी मेरे दिमाग पर चढ़ा रहता था और मैं पढ़ाई में उतना एकाग्र नहीं हो पाता था, जितना होना चाहिए था।
इण्टर का मेरा परीक्षा केन्द्र साकेत इण्टर कालेज, शाहगंज में था, जो कि लोहामंडी से मुश्किल से एक-डेढ़ किमी दूर है। अतः वहाँ आने-जाने के लिए मुझे किसी साइकिल वाले की जरूरत नहीं थी। यहाँ यह बता दूँ कि मैंने साइकिल चलाना मामूली तौर पर ही सीखा था, कभी-कभी चला भी लेता था, लेकिन मेरे भाई और माँ मुझे सड़क पर साइकिल चलाने की अनुमति नहीं देते थे। इसलिए मैं नित्य पैदल ही जाता था और उधर से भी प्रायः पैदल आता था, हालांकि कभी-कभी किसी सहपाठी की साइकिल पर भी बैठ लेता था। पर्चे मेरी आशा के अनुरूप नहीं हुए, फिर भी इतने सन्तोषजनक अवश्य हो गये थे कि मुझे प्रथम श्रेणी आने की पूरी उम्मीद थी। मुझे गणित से सबसे ज्यादा आशा थी।
लेकिन जब परिणाम आया तो मैं बहुत दुःखी हुआ, क्योंकि मात्र 15 अंकों से मेरी प्रथम श्रेणी रह गयी थी। गणित में मेरी आशा के सर्वथा विपरीत 100 में से मुझे कुल 65 अंक मिले थे, जबकि मैंने कम से कम 85 अंकों की उम्मीद की थी। अन्य विषयों में भी मेरे अंक आशा से कम थे लेकिन उतने नहीं। गणित में पड़े इन 20 अंकों के घाटे से ही मेरी प्रथम श्रेणी मारी गयी और अपनी जिन्दगी में पहली और अन्तिम बार मुझे मात्र द्वितीय श्रेणी से संतोष करना पड़ा। लेकिन सन्तोष की बात यह थी कि मैं छात्रवृत्ति पुन: प्रारम्भ होने का पात्र हो गया था।
मेरे परिणाम से मेरे परिवार वाले ज्यादा खुश तो नहीं थे, लेकिन दुःखी भी नहीं थे, क्योंकि मेरे अंकों का प्रतिशत 57 था, जो प्रथम श्रेणी से कुछ ही कम होता है। लेकिन मैं स्वयं इनसे संतुष्ट नहीं था। जब मैंने प्रथम श्रेणी प्राप्त करने में अपनी असफलता का विश्लेषण किया तो मुझे इसके कुछ कारण दिखाई पड़े। मेरे विचार से सबसे पहला कारण यह था कि हाईस्कूल की भारी सफलता के पश्चात् मुझमें अहंकार पैदा हो गया था। शायद ईश्वर ने उसी की सजा मुझे दी थी।
दूसरा कारण मुझे यह नजर आया कि मैं अपनी पढ़ाई पर उचित मात्रा में ध्यान नहीं दे सका। एक कहावत है- ‘असफलता केवल यही सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया।’ मेरे ऊपर यह कहावत बिल्कुल सही उतरी थी। मैं अपनी पढ़ाई में पूरी तरह एकाग्र शायद इसलिए नहीं हो सका कि मेरा ध्यान उन दिनों राजनीति पर तथा ‘नीता’ पर ज्यादा था। अतः यह आश्चर्यजनक नहीं था कि मेरे प्रयत्न अधूरे रह गये।
लेकिन तीसरा और शायद ज्यादा महत्वपूर्ण कारण मेरे विचार से यह था कि हमारे इण्टर के अध्यापक बहुत ही अयोग्य थे और उचित तरीके से पढ़ाने में असमर्थ थे। न तो वे खुद अच्छी तरह पढ़ा सके और न हमें स्वयं पढ़ने के लिए प्रेरित कर सके। अध्यापक के खराब या अच्छे होने का सीधा प्रभाव छात्रों की योग्यता और प्रदर्शन पर अवश्य पड़ता है। यह बात मेरे अनुभव से कई बार सिद्ध हो चुकी है।
इतने पर भी मैं कहूँगा कि इस मामूली झटके को मैंने एक चेतावनी के रूप में ग्रहण किया और भविष्य के लिए मैंने यह निश्चय कर लिया कि राजनीति या किसी अन्य विषय में अपनी रुचि का या किसी लड़की को प्यार करने या न करने का कोई प्रभाव मैं अपनी पढ़ाई पर नहीं पड़ने दूँगा। मैंने अपने इस निश्चय का दृढ़तापूर्वक पालन किया और उससे आगे चलकर मुझे बहुत लाभ हुआ, हालांकि मैं अतिरिक्त गतिविधियों में और ज्यादा व्यस्त रहने लगा था।
उन दिनों मेरी रुचि शेरो-शायरी की तरफ भी हो गयी थी। इसकी शुरूआत इस तरह हुई कि जब मैं कानपुर में था, तो वहाँ भाईसाहब के पास महात्मा आनन्द स्वामी सरस्वती द्वारा रचित एक पुस्तक ‘भक्त और भगवान’ थी, जिसमें आध्यात्मिक बातों को सरलतम उदाहरणों और उर्दू-फारसी के शेरों के साथ प्रस्तुत किया गया था। उर्दू शायरी की इस गहराई और माधुर्य से मैं चमत्कृत था, क्योंकि अब तक मैं उर्दू शायरी को मात्र शराब और इश्कबाज़ी का वर्णन मानता था। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मेरी रुचि उर्दू शायरी में पूरी तरह जागृत हो गयी। हालांकि तब मैं उर्दू को केवल देवनागरी लिपि में ही पढ़ पाता था, अरबी लिपि मैंने बाद में अपने पिताजी से सीखी थी।
कानपुर वाले सूरज भाईसाहब ने चलते समय मुझे एक डायरी उपहार में दी थी, जिसका सर्वप्रथम उपयोग मैंने शेरों को नोट करने में किया। मैं रोज वाचनालय जाता ही था। जब भी किसी जगह कोई अच्छा सा शेर छपा या लिखा देखता, तो तुरन्त उसे नोट कर लेता। कभी-कभी रिक्शों के पीछे भी अच्छे-अच्छे शेर लिखे हुए मिलते थे, उन्हें भी मैं लिख लेता था। रिक्शों पर से शेर लिखने के लिए कई बार मुझे रिक्शों के पीछे दौड़ना पड़ता था। कभी-कभी रिक्शों पर काफी मनोरंजक शब्द या वाक्य लिखे रहते थे, जिनको मैं याद कर लेता था और अपने मित्रों को सुनाया करता था। कुछ मनोरंजक शब्द और वाक्य ये हैं - ‘फिर वही दिल लाया हूँ’, ‘बचके निकल जा’, ‘एक बार जरूर मिलूँगा’, ‘चमचों से सावधान’, ‘पहिए के संग मत लग, पहिया छोड़ देगा पीछे’, ‘सड़क-सड़क के राजा, लम्बे रोड पे आजा’ इत्यादि- इत्यादि।
चित्र बनाने में मेरी रुचि बचपन से ही थी। जब भी मेरा मन होता था तब मैं कागज रबड़ पेंसिल लेकर किसी एकान्त स्थान पर बैठ जाता था और तरह-तरह के चित्र बनाया करता था। कई बार मैंने रंगीन चित्र भी बनाये थे। कार्टून बनाना मेरा शौक था, लेकिन उचित प्रोत्साहन न मिलने से वह समाप्त हो गया। मेरा केवल एक कार्टून अब तक प्रकाशित हुआ है, जो ‘बाल भारती’ पत्रिका में छपा था और जिसके पारिश्रमिक स्वरूप मुझे 20 रुपये भी प्राप्त हुए थे।
वाचनालय में उन दिनों नेशनल हैराल्ड नामक अंग्रेजी अखबार आया करता था, जिसमें हर रविवार को पत्र-मित्र बनाना चाहने वालों के पते छपा करते थे। मैंने भी पत्र-मित्र बनाने के लिए अपना पता उस कालम में तीन बार छपवाया था। मेरे कई मित्र बने भी और उनमें कई मेरे घनिष्ट मित्र बन गये। इनके बारे में आगे लिखूँगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें