आत्मकथा भाग-1 अंश-21
जैसा कि मैं पहले लिख चुका हूँ, हाईस्कूल में मेरे अंक 71.2 प्रतिशत थे अर्थात् 70 प्रतिशत से अधिक। अतः मैं राष्ट्रीय योग्यता छात्रवृत्ति का पात्र था। सौभाग्य से मुझे इसके लिए कुछ नहीं करना पड़ा और मेरे लिए छात्रवृत्ति स्वतः स्वीकृत होकर आ गयी। उसकी राशि थी 50 रुपया प्रति माह जो कि उस समय मेरे लिए बहुत अधिक थी। अब तक हमारी आर्थिक स्थिति भी कुछ सुधर गयी थी। फिर भी इस छात्रवृत्ति की मुझे बहुत आवश्यकता थी। कक्षा 11 का मेरा समय ज्यादातर अपना इलाज कराने के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाने में और बाकी अखबार पढ़ने में गुजर जाता था। अपनी कक्षाओं को मैं बहुत लापरवाही से लेता था। हाईस्कूल में अच्छे अंक आने के कारण मुझे कुछ घमंड भी था कि मैं इण्टर में भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो जाऊँगा।
एक तो खराब स्टाफ, दूसरा पढ़ाई में लापरवाही और तीसरा अहंकार या अतिआत्मविश्वास- इन तीनों कारणों को मिलाकर जो परिणाम होना चाहिए था, वही हुआ अर्थात् मैं कक्षा 11 की अर्द्धवार्षिक परीक्षा में मात्र 43 प्रतिशत अंक प्राप्त कर सका। मैं रसायन विज्ञान में फेल भी था और अपनी जिन्दगी में पहली बार किसी विषय में फेल हुआ था। अर्द्धवार्षिक परीक्षा का परिणाम आने पर मैं कुछ चेता, लेकिन लापरवाही की आदत छूटना मुश्किल था, क्योंकि वह समय बहुत राजनैतिक उथल-पुथल का था।
मुझे यह मालूम नहीं था कि राष्ट्रीय योग्यता छात्रवृत्ति को जारी रखने के लिए हर कक्षा में कम से कम 50 प्रतिशत अंक आने चाहिए। अगर यह मालूम होता तो शायद मैं दो महीने मेहनत कर भी लेता। लेकिन मैंने सोचा कि कक्षा 11 के अंकों का कोई महत्व नहीं है, अतः पास हो जाना काफी है। लेकिन अर्द्धवार्षिक परीक्षा का परिणाम देखकर मैं कुछ चौंका, क्योंकि इससे तो मेरी प्रतिष्ठा ही धूल में मिली जा रही थी। अतः अब मैंने पढ़ाई पर कुछ ध्यान देना शुरू किया, हालांकि कड़ी मेहनत अभी भी नहीं की। इसका मुझे फल भी मिला और कक्षा 11 की वार्षिक परीक्षा में मुझे 49 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए। मेरी उस वर्ष की हालत को देखते हुए यह काफी सुधार था लेकिन ये 50 प्रतिशत से अभी भी कम थे। यह तो मुझे बाद में पता चला कि 50 प्रतिशत अंक न आने पर मेरी छात्रवृत्ति रुक गयी थी।
वह सन् 1975 की मई की बात है, जब जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन चरम सीमा पर था। मेरे कानों में कोई लाभ दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था। अतः मुझे इलाज के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली ले जाने का निश्चय किया गया। वहाँ कई बार मुझे अपने बड़े भाईसाहब श्री महावीर प्रसाद के साथ जाना पड़ा। वहीं मेरे गले का भी छोटा सा आपरेशन भी किया गया (क्यों यह पता नहीं), जिससे मेरी आवाज कुछ खुल गयी, लेकिन कानों में फिर भी कोई लाभ दृष्टिगोचर नहीं हुआ। अन्ततः वहाँ के डाक्टरों ने हार मानकर मुझे छुट्टी दे दी। आश्चर्य इस बात का है कि मैं अपने कानों का इलाज कराने दिल्ली गया था, लेकिन मेरा एक्सरे खिंचवाया गया नाक का और आपरेशन किया गया गले का। ऐलोपैथिक डाक्टरों की इस लीला को मैं आज तक भी नहीं समझ पाया हूँ। इतना तो मुझे मालूम है कि नाक-कान-गला ये तीनों अंग आपस में गहरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन किसी डाक्टर ने मुझे आज तक भी यह नहीं बताया है कि मेरे कानों में खराबी क्या है।
वह जमाना 1975-76 का था अर्थात् इमरजेन्सी का युग, जब श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश को आपात स्थिति के अंधकार में धकेल दिया था। श्रीमती इन्दिरा गाँधी का चुनाव रद्द होने का समाचार मुझे दिल्ली में ही मिला। इसके कुछ दिन बाद आपात स्थिति भी उस समय लगायी गयी थी, जब मैं दिल्ली से लौटकर आगरा आ गया था और अपनी कक्षाओं के शुरू होने का इन्तजार कर रहा था। आपात स्थिति की भयावहता का आभास उस समय मुझे नहीं था, लेकिन कुछ भूमिगत पत्र मेरे हाथ पड़ जाते थे, जिनसे यह सारी जानकारी मुझे मिली। मैं जन्मजात जनसंघी होने के कारण (क्योंकि मेरे पिताजी भी जनसंघी थे) कांग्रेस विरोधी था ही, इस हालत में मैं उग्र सरकार विरोधी हो गया। मेरे सभी सहपाठियों को मेरे विचारों की जानकारी थी, लेकिन साधारण छात्र होने के कारण मेरे विचारों को कोई गम्भीरता से नहीं लेता था।
मुझे याद है कि इमर्जेन्सी (26 जून 1975 को) लगने के बाद जो 15 अगस्त आयी उसके कार्यक्रम के लिए मैं एक बहुत उग्र कविता लिखकर ले गया था, जिसकी पहली दो पंक्तियाँ निम्न प्रकार थीं-
लोकतंत्र भारत को इन्दिरा ने जागीर बनाया है।
अब कूद पड़ो रत्नाकर में लहरों से निमंत्रण आया है।।
लोकतंत्र भारत को इन्दिरा ने जागीर बनाया है।
अब कूद पड़ो रत्नाकर में लहरों से निमंत्रण आया है।।
लेकिन न जाने क्यों, उस दिन केवल झंडारोहण हुआ और कुछ मिष्ठान्न बाँटने के बाद छात्रों को भगा दिया गया। अगर उस दिन सदा की तरह सभा होती और छात्रों को बोलने का अवसर मिलता, तो मैं अवश्य ही अपनी कविता सुनाता और फिर जो परिणाम होता उसको सोचकर ही कँपकँपी आ जाती है। बाद में जब पिताजी ने यह कविता देखी और मेरा उद्देश्य उन्हें पता चला, तो मुझे बहुत डाँटा कि मैं क्यों बेवकूफी करने जा रहा था और उन्होंने कविता फाड़कर फेंक दी।
बाद में मेरी समझ में आया कि विरोध प्रकट करने के लिए इस तरह की उग्र शब्दावली आवश्यक नहीं है और वह दूसरे शब्दों में भी प्रकट किया जा सकता है। अतः 26 जनवरी, 1976 को मैं एक अन्य कविता लिखकर ले गया जिसका शीर्षक था ‘आह्वान’ और पहली पंक्ति थी-
है लहरों पर प्रतिबन्ध लगा, तूफान कहाँ से आयेगा?
यह कविता मैंने सुनायी थी और शायद अध्यापकों को भी मेरा आशय समझ में आ गया था, क्योंकि उस सभा के बाद समस्त छात्र वक्ताओं को इनाम बाँटे गये थे, केवल एक मुझे छोड़कर। लेकिन मुझे खुशी है कि कई अध्यापकों ने मेरी पीठ थपथपायी और छात्रों ने देर तक तालियाँ बजायी थीं।
है लहरों पर प्रतिबन्ध लगा, तूफान कहाँ से आयेगा?
यह कविता मैंने सुनायी थी और शायद अध्यापकों को भी मेरा आशय समझ में आ गया था, क्योंकि उस सभा के बाद समस्त छात्र वक्ताओं को इनाम बाँटे गये थे, केवल एक मुझे छोड़कर। लेकिन मुझे खुशी है कि कई अध्यापकों ने मेरी पीठ थपथपायी और छात्रों ने देर तक तालियाँ बजायी थीं।
इसके बाद मेरे राजनैतिक विचारों और गतिविधियों पर विराम लग गया, क्योंकि मेरी इण्टर की बोर्ड की परीक्षाएं पास आ रही थीं। मैं इण्टर में प्रथम श्रेणी लाने के लिए कटिबद्ध था, क्योंकि इस पर ही मेरी छात्रवृत्ति पुनः प्रारम्भ हो सकती थी। लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है, बल्कि ज्यादातर ऐसा ही होता है, कि हम जो सोचते हैं वह किन्हीं कारणोंवश पूरा नहीं हो पाता और हम ईश्वर या भाग्य को दोष देकर चुप हो जाते हैं अथवा बाह्य कारणों की तलाश करते हैं। मेरे मामले में भी ऐसा ही हुआ।
उस समय मैं 16-17 वर्ष का था। यह उम्र ऐसी होती है, जब आप न तो बच्चों में गिने जाते हैं और न वयस्कों में। यह उम्र आवारागर्दी, लापरवाही और मौजमस्ती के लिए आदर्श होती है। लड़कियों के इतिहास, भूगोल और गणित में रुचि जाग्रत हो जाती है और आप अज्ञात बातों को जानने के लिए और कुछ साहस भरा कार्य करने के लिए व्यग्र हो जाते हैं। मैं भी इसका कोई अपवाद नहीं था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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