आत्मकथा भाग-1 अंश-20

अध्याय-5: दिल ही तो है
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो।
न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाये।।
कानपुर से वापस आने के बाद मैं इण्टर में दाखिला लेने अपने विद्यालय राजकीय इण्टर काॅलेज, आगरा गया और मुझे बिना किसी परेशानी के प्रवेश मिल भी गया, हालांकि मैं दो दिन देरी से पहुंचा था। हमारा हाईस्कूल का अध्यापक वर्ग जहाँ एकाध अपवादों को छोड़कर काफी सहृदय था, वहाँ इण्टर का अध्यापक वर्ग उसके ठीक विपरीत था, यहाँ भी एकाध अपवादों को छोड़कर।
हमारे अंग्रेजी के अध्यापक थे श्री प्रेम नाथ सूद, जो अत्यन्त सहृदय और शालीन थे। वे मुझे बहुत प्यार करते थे और काफी प्रोत्साहन देते थे। वे केवल एक वर्ष तक हमें पढ़ा सके। उसके बाद वे किसी दूसरे इण्टर काॅलेज के प्रधानाचार्य होकर चले गये थे। उनके जाने के बाद जो महानुभाव पधारे थे, वे बहुत ही अनुपयोगी साबित हुए। हिन्दी के हमारे शिक्षक थे श्री चतुरी प्रसाद शर्मा। वे भी काफी अच्छे अध्यापक थे और कुल मिलाकर उनका व्यवहार भी मेरे प्रति काफी अच्छा था। वे हमारे कक्षा अध्यापक भी थे।
इन दो अपवादों को छोड़कर हमारे बाकी समस्त अध्यापक काफी आत्म संतुष्ट और दूर-दूर रहने वाले थे, हालांकि अपने कुछ चमचों पर उनकी बड़ी कृपा दृष्टि रहती थी। हमारे भौतिक विज्ञान के शिक्षक थे श्री मथुरेश कुमार उपाध्याय, जो संयोग से हमारे ही गाँव के निकट के गाँव नगला विधी के थे। इसके बावजूद मैं उनसे काफी डरता था और दूर-दूर ही बना रहता था, क्योंकि वे बहुत कठोर और अनुशासनप्रिय अध्यापक माने जाते थे। वे छात्रों को छोटी-छोटी गलतियों पर भी बड़ी सजा देते थे। पढ़ाई के बीच में यदि कोई उनसे प्रश्न पूछने की हिम्मत करता था, तो वे पहले उसके कान खींचते थे, तब जबाव देते थे। इसलिए कोई उनसे प्रश्न पूछने की जुर्रत नहीं करता था। वे इतने कठोर थे कि चाॅक के बचे हुए छोटे-छोटे टुकड़ों को भी पैर से मसलकर चूरा बना डालते थे, ताकि कोई कलाप्रेमी छात्र अपनी कला का नमूना श्यामपट (ब्लैक बोर्ड) पर न दिखा दे।
गणित के हमारे शिक्षक श्री भगवत स्वरूप शर्मा थे, जिन्हें लड़के मजाक में ‘भस्सू’ कहा करते थे। वे बहुत ही विनोदी स्वभाव के थे, इसलिए लड़के उनके साथ काफी स्वच्छन्द हो जाते थे। वैसे उनका गणित का ज्ञान भी औसत दर्जे का था और कई बार वे मामूली से कठिन प्रश्नों को भी हल नहीं कर पाते थे, जिन्हें प्रायः मैं हल कर दिया करता था। लेकिन यह आश्चर्य की ही बात थी कि इसके बावजूद मैं उनकी प्रशंसा या शाबासी का पात्र कभी न बन सका। इसलिए मैंने यह नियम बना लिया था कि यदि कोई सवाल वे न कर सके और मैं कर लेता था, तो भी उनको बताता नहीं था। उनकी कृपा दृष्टि अपने उन चमचों पर ज्यादा रहती थी, जो प्रायः फेल होते रहते थे। बीच में कुछ समय के लिए उनका स्थानान्तरण कहीं दूसरी जगह हो गया था और हम गणित के शिक्षक के बिना रह गये थे। उस जगह को भरने के लिए एक नये अध्यापक आये थे, जो स्वयं ज्यादा समय न रह सके। अन्त में, श्री भगवत स्वरूप शर्मा किसी तरह जुगाड़ लगाकर पुनः वापस आये थे।
सबसे विचित्र स्थिति थी रसायन विज्ञान की। इस विषय के शिक्षण के लिए हमें तीन अध्यापकों को झेलना पड़ा। तीनों एक से बढ़कर एक नमूना थे। उनमें से एक का नाम श्री पाण्डे था। बाकी दो के नाम याद नहीं हैं। पाण्डेजी अपने में ही मस्त रहने वाले जीव थे। कक्षा में पढ़ाते थे तो इस तरह जैसे उनके मुँह से आवाज न निकलती हो और बोर्ड पर चित्र ऐसे बनाते थे जैसे हाथों में दम नहीं हो। उनसे कोई प्रश्न पूछने का अर्थ था ‘आ बैल मुझे मार’। अतः लड़के जितना समझ पाते थे उतने को ही पाण्डेजी का प्रसाद मानकर संतोष कर लेते थे। उनके जाने के बाद जो दो नये अध्यापक बारी-बारी से आये उनमें और पाण्डेजी में उतना ही अन्तर था, जितना नागनाथ और साँपनाथ में होता है, अर्थात् मात्र नाम का फर्क था।
यदि मैं अपने इण्टर की फैकल्टी को एक वाक्य में व्यक्त करूँ तो कहूँगा कि वह बहुत ही औसत दर्जे की थी और मैंने अपने जीवन में जितने भी अध्यापकों से शिक्षा प्राप्त की है उनमें ये सबसे घटिया कहे जा सकते हैं। ऐसे महान् गुरुवरों को पाकर हमारा ज्ञान जितना बढ़ सकता था उतना ही बढ़ा और जैसा परिणाम रह सकता था, वैसा ही रहा अर्थात् हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए ज्यादातर छात्रों को द्वितीय श्रेणी से संतोष करना पड़ा, जिनमें मैं भी था, और कई औसत दर्जे के मगर पास होने लायक छात्र फेल हो गये।
उन्हीं दिनों मेरी रुचि डाक टिकट और माचिस के लेबुल संग्रह करने में हो गयी थी। इस काम के लिए मैं अपना बहुत सा समय और कुछ पैसा भी खर्च करता था। कई बार मुझे किसी विशेष डाकटिकट के लिए आगरा के मुख्य डाकघर तक प्रतापपुरा भी जाना पड़ता था, जो कि हमारे मौहल्ले लोहामंडी से काफी दूर है। मैं प्रायः ऐसे मौकों पर पैदल ही आता जाता था। मैं मुख्य रूप से प्रसिद्ध व्यक्तियों के ऊपर जारी भारतीय टिकटों को संग्रहीत किया करता था। ऐसे डाक टिकटों का एक बहुमूल्य संग्रह अभी भी मेरे पास सुरक्षित है। मैंने लगभग 300 प्रकार की माचिसों के लेबुल भी एकत्रित किये थे। उन्हें मैंने बहुत दिनों तक सुरक्षित रखा, पर अब फेंक चुका हूँ।
उस समय देश में क्रिकेट का बुखार अपनी चरम सीमा पर था। भारतीय टीम चारों ओर दिग्विजय कर रही थी। स्वाभाविकतया भेड़िया धसान की तरह मेरी भी खेलों में रुचि जाग्रत हुई और छोटी-मोटी जानकारियाँ और आँकड़े इकट्ठे करने से ही मैं स्वयं को क्रिकेट का विशेषज्ञ समझने लगा था। सौभाग्य से मुझे ठीक समय पर आगरा से प्रकाशित होने वाली एक खेल पत्रिका के सम्पादक से प्रोत्साहन मिला और उन्होंने मेरे लगभग एक दर्जन लेख अपनी पत्रिका ‘खेल समाचार’ में प्रकाशित किये। लेकिन वे इसके बदले में मुझे कुछ देते नहीं थे तथा लेख लिखने और आँकड़े सुधारने में मेरा समय बहुत लग जाता था, अतः बाद में मैंने उनके लिए लिखना बंद कर दिया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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