आत्मकथा भाग-1 अंश-19
मेरी कक्षाओं के दिन पास आ रहे थे और मैं घोर निराशा की स्थिति में था। अपनी निराशा पर विजय पाने में मुझे कुछ समय लगा। मैं कल्पनाएं करता रहता था कि इस हालत में मैं किस तरह स्वाभिमान पूर्ण जीवन जी सकूँगा। साहित्यकार बनने से लेकर मजदूरी करने तक की संभावनाओं पर मैंने विचार कर डाला। मैंने यह भी सोच लिया था कि यदि मुझे कहीं कोई काम नहीं मिला, तो मैं कपड़े सिलकर भी अपना और अपने परिवार का पेट भर सकता हूँ। घर में रेडीमेड कपड़ों का काम होने के कारण मैं सिलाई मशीन अच्छी तरह चला लेता था और गाँव के लोगों द्वारा पहने जाने वाले सभी कपड़े सिल लेता था, हालांकि काटना नहीं आता था, जो सीखा जा सकता था। अन्त में, मैंने निश्चय किया कि सबसे पहले मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी चाहिए। इसके बाद ही भविष्य के बारे में विचार करना ठीक रहेगा।
उन दिनों मुझे ईश्वर पर कुछ अविश्वास सा हो गया था। मैं सोचने लगा था कि उसने जानबूझकर मेरी जिन्दगी खराब करने के लिए मुझे यह बीमारी दी है। मैं लगभग नास्तिक हो गया था। तभी मेरे सौभाग्य से मुझे अपने बाबा के बड़े भाई स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज, जिन्हें हम ‘लाल बाबा’ कहा करते थे, के माध्यम से स्वामी दयानन्द सरस्वती कृत ‘सत्यार्थ प्रकाश’ एवं कुछ अन्य पुस्तकें पढ़ने को मिलीं। उनमें कहा गया था कि ईश्वर बहुत न्यायकारी है, दयालु और कल्याणकारी है। तब मैंने अपनी हालत पर दूसरी दृष्टि से विचार किया, तो ईश्वर में मेरा विश्वास फिर जाग गया।
मैंने सोचा कि ईश्वर ने मुझे यह अवसर दिया है कि मैं कुछ करके दिखाऊँ और लोगों के सामने एक उदाहरण बन जाऊँ। यह विचार आते ही मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया और परमपिता द्वारा दी गई इस चुनौती को स्वीकार किया। मैं बचपन में प्रायः अपनी माताजी से कहा करता था कि मैं दुनिया में अपना नाम कर जाऊँगा। मेरा सपना कोई नयी वैज्ञानिक खोज करने का तथा नोबेल पुरस्कार जीतने का था और अभी भी है। तब मेरे मन में विचार आया कि अगर इस हालत में मैं अपना जीवन स्वाभिमानपूर्वक जी सका और विश्व में अपना ऊँचा स्थान बना सका, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बन जायेगा। इससे बड़ा पुरस्कार शायद कोई नहीं होता कि लोग किसी व्यक्ति का नाम आदरपूर्वक लें। यह विचार आने पर मैंने ईश्वर को बार-बार धन्यवाद दिया और नये संकल्प के साथ मैं अपनी जिन्दगी बनाने को तैयार हो गया।
मैं अपनी कक्षाओं में शामिल होने पिताजी के साथ आगरा आया और कक्षाध्यापक को अपनी स्थिति बतायी। कक्षाध्यापक ने अपने सहयोग का आश्वासन दिया और साथी लड़कों ने भी मुझसे सहानुभूति दिखायी। लेकिन मुझे सहानुभूति नहीं प्रेरणा चाहिए थी। तमाम सहानुभूति प्रकटकर्ताओं के बीच कुछ ऐसे हितैषी भी थे, जिन्होंने सहानुभूति दिखाने के साथ ही मेरा हौसला भी बढ़ाया। ज्यादातर लोग उसे ईश्वर की लीला बताकर सहानुभूति प्रकट करते थे और कुछ लोग अभी भी मेरे भविष्य के बारे में शंका करते थे, लेकिन मैं स्वयं इस सबसे हतोत्साहित नहीं होता था। मेरे सामने से निराशा का अन्धकार छँट चुका था और मैं स्वर्णिम भविष्य की किरणें अपने सामने देख रहा था।
पूर्ण निष्ठा और संकल्प के साथ मैं अपनी पढ़ाई में जुट गया। त्रैमासिक और षट्मासिक परीक्षाओं में मेरा प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। मुझे पूर्ण विश्वास था कि बोर्ड की परीक्षा में मैं काफी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होऊँगा। प्रथम श्रेणी आने का विश्वास तो मुझे शुरू से ही था।
साथ ही मेरा इलाज भी चल रहा था। बीसियों बार मुझे माताजी के साथ सरोजिनी नायडू मेडिकल काॅलेज, आगरा जाना पड़ा था तथा हर तीसरे दिन मेरे इंजेक्शन लगा करता था। मैं केवल अपनी और परिवारवालों की संतुष्टि के लिए दवाइयाँ खा रहा था, हालांकि मुझे अपने ठीक होने की आशा लगभग नहीं के बराबर थी।
मुझे अपनी पढ़ाई में अपने शिक्षकों का पूर्ण सहयोग मिला। साथ ही कई सहृदय सहपाठियों का भी सहयोग प्राप्त हुआ, यद्यपि कुछ अन्य सहपाठी पढ़ाई में मेरी अच्छी स्थिति के कारण अभी भी मुझसे ईर्ष्या किया करते थे। हाईस्कूल बोर्ड की परीक्षा का मेरा केन्द्र हुब्बलाल इण्टर काॅलेज, बालूगंज में था, जो कि हमारे तत्कालीन घर लोहामंडी से काफी दूर है। अतः मेरे बड़े भाइयों में से कोई एक रोज मुझे साइकिल पर पहुंचाने जाते थे तथा फिर 10 बजे किसी को लेने भी जाना पड़ता था। कभी-कभी देरी से लेने आने के कारण और भूख के कारण मुझे झुँझलाहट भी होती थी, लेकिन कुल मिलाकर पेपर अच्छी तरह हो गये और मैं अपनी उत्तर पुस्तिकाओं से पूर्ण संतुष्ट था।
परीक्षाओं के बाद मैं गाँव आ गया, क्योंकि बोर्ड से रिजल्ट निकलने में काफी समय था और मेरा स्वास्थ्य भी बहुत खराब हो गया था। यहाँ पर बता दूँ कि हालांकि गाँव में भी मेरा स्वास्थ्य मामूली सा ही था, पर आगरा जाकर वह और ज्यादा खराब हो जाता था, क्योंकि वहाँ का वातावरण मुझे रास नहीं आता था। गाँव की हवा साफ होने के कारण यहाँ आकर मेरा स्वास्थ्य काफी हद तक सुधर जाता था और प्रत्यक्ष में कोई शिकायत नहीं रह जाती थी।
मेरे एक ताऊजी के लड़के डाॅ. सूरज भान, कानपुर में तत्कालीन उ.प्र. कृषि विज्ञान संस्थान और वर्तमान चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं तकनीकी विश्वविद्यालय में एग्रोनोमिस्ट हैं। उन्होंने पिताजी को पत्र लिखा था कि यहाँ कानपुर में एक स्वामी श्री देवमूर्ति जी महाराज हैं, जो प्राकृतिक विधियों से सभी प्रकार के रोगों का इलाज करते हैं। उन्होंने मुझे कानपुर लाने की सलाह दी। अतः उनके छोटे भाई श्री हरी मोहन के साथ एक दिन मैं कानपुर पहुँच गया और भाईसाहब को साथ लेकर मोती झील पर स्वामी जी से मिला। स्वामी जी ने मुझे ठीक हो जाने का विश्वास दिलाया और रबर नेती आदि कुछ क्रियायें बतायीं, जो मुझे काफी समय तक चलानी थीं।
मैं कानपुर में लगभग दो माह रहा और वहाँ सारी क्रियाएं नियमित रूप से करता रहा। लेकिन जाने क्या बात हुई कि स्वास्थ्य में मामूली सुधार के अलावा वहाँ मुझे कोई लाभ नहीं हुआ। अतः इन क्रियाओं पर मेरा विश्वास नहीं जम पाया और मैंने ये क्रियाएं छोड़ दीं।
(पादटीप- कानपुर वाले हमारे इन भाईसाहब का गुर्दों की खराबी के कारण देहान्त हो चुका है। उनके बारे में विस्तार से आगे लिखूँगा।)
मैं कानपुर में ही था, जब मेरा बोर्ड का परीक्षाफल निकला। लेकिन मेरा दुर्भाग्य कि मैं स्वयं उसे जानने से लम्बे समय तक वंचित रहा, क्योंकि वहाँ आगरा जिले का परीक्षाफल नहीं छपता था। अन्ततः मुझे पिताजी के एक पत्र द्वारा ही ज्ञात हुआ कि मैं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ हूँ। हालांकि मेरे पर्चे काफी अच्छे हो गये थे, लेकिन मैंने 66 प्रतिशत अर्थात् दो तिहाई से ज्यादा अंकों की उम्मीद नहीं की थी। लेकिन मेरे अंक थे 71.2 प्रतिशत और मुझे गणित तथा विज्ञान में विशेष योग्यता प्राप्त हुई थी।
वह वर्ष हमारे देश के लिए वैज्ञानिक उपलब्धियों का वर्ष था। भारत ने अपना पहला कृत्रिम उपग्रह आर्य भट्ट छोड़ा था तथा पोखरण में प्रथम भूमिगत परमाणु विस्फोट भी किया था। देश की इन सफलताओं का प्रभाव मेरे ऊपर न पड़ता, यह असंभव था। मैं अपनी कक्षा में तीसरे या चौथे नम्बर पर था। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था और अपनी इस प्रथम विजय के बाद मेरा आत्मविश्वास और ज्यादा बढ़ गया था। साथ ही मुझमें कुछ अहंकार भी जागृत हो गया था, हालांकि इस अति आत्मविश्वास से अन्त में मेरी हानि ही हुई।
कानपुर से मैं अपने बड़े भाई साहब के साथ सीधा आगरा आ गया, क्योंकि मेरी इण्टर की कक्षायें शुरू होने वाली थीं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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