आत्मकथा भाग-1 अंश-18

कक्षा 9 में मेरा छात्र जीवन लगभग घटना विहीन रहा। मैं कक्षा में खूब मन लगाकर पढ़ा करता था और अपनी कक्षा के सर्वश्रेष्ठ चार-पांच छात्रों में गिना जाता था। हालांकि इस वजह से मैं कई साथी लड़कों की ईर्ष्या का पात्र भी बना रहता था और कुछ लड़कों से झगड़ा चलता रहता था। वार्षिक परीक्षा में कक्षाध्यापक श्री भट्ट जी ने मेरी अंकतालिका पर ‘संतोषजनक’ शब्द टिप्पणी के रूप में लिखा था, जिससे मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हुई।
वह वर्ष हम सब भाइयों के लिए सफलता का वर्ष था। मैं स्वयं तो अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुआ ही था, मेरे अन्य सभी भाई भी उत्तीर्ण हो गये थे। सबसे बड़े भाईसाहब श्री महावीर प्रसाद जो पिछले वर्ष बी.एससी. प्रथम वर्ष में कृपांक मिलने के बाद ही उत्तीर्ण हुए थे, इस वर्ष बी.एससी. द्वितीय वर्ष में स्पष्टतया उत्तीर्ण हो गये।
उनसे छोटे भाई श्री राम मूर्ति, जो पिछले वर्ष सी.पी.एम.टी. में पास नहीं हो पाये थे और बी.एससी. कर रहे थे, इस बार न केवल बी.एससी. में पास हो गये, बल्कि सी.पी.एम.टी. के साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय की मेडिकल प्रवेश परीक्षा में भी उत्तीर्ण हो गये थे। आशा के अनुरूप उन्होंने आगरा के ही सरोजिनी नायडू मेडिकल काॅलेज में एम.बी.बी.एस. में प्रवेश ले लिया। उनसे छोटे भाई श्री गोविन्द स्वरूप भी अपनी कक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए।
कक्षा 9 का परीक्षाफल लेकर मैं गर्मियों की छुट्टियाँ बिताने अपने गाँव में आया। वहाँ मेरे साथ वह घटना घटी, जिसने न केवल मेरे जीवन में तूफान ला दिया, बल्कि मेरा भविष्य भी लगभग अन्धकारमय कर दिया। अपने अन्धकारमय लगने वाले भविष्य में प्रकाश की किरणों का संचार मैं किस तरह कर सका, यह किसी भी व्यक्ति के लिए कौतूहल और प्रेरणा का विषय हो सकता है।
उन दिनों बहुत गर्मी पड़ रही थी। गाँव में खुला आसमान होने के कारण गर्मी और लू की मात्रा कुछ ज्यादा ही थी, लेकिन अपनी सफलता के कारण कुछ निश्चिन्त होकर मैं घूमता फिरता था, खेलता था और कभी-कभी अपने गाँव के पास बहने वाली नहर, जिसे बम्बा कहा जाता है, के पानी में भी नहाता था। अचानक एक दिन मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरे कान बन्द होते जा रहे हैं। मेरा बायां कान काफी दिन पहले से ही खराब था, जिसका ज्ञान मुझे तब तक नहीं हो पाया था। इस बार मेरा दायां कान भी खराब होने लगा था। शुरू-शुरू में मुझे ऐसा लगा था, जैसे मेरे दायें कान में पानी-सा भर गया हो, जो कभी खुल जाता था और कभी बन्द हो जाता था। यह हालत लगभग आठ दिन रही। तब तक बन्द होने का समय लम्बा होता जा रहा था। आठ दिन बाद ऐसा हुआ कि मेरा दायां कान भी सदा के लिए खराब हो गया और मेरी दुनिया पूरी तरह शब्दहीन हो गयी।
उसी के साथ मैं बहुत तेज बीमार पड़ गया। जहाँ तक मुझे याद है मुझे बुखार नहीं था, केवल पेट की कोई बीमारी थी, जिससे मुझे उल्टी और दस्त हो गये थे। कई डाक्टरों और वैद्यों से इलाज कराने पर भी मेरा पेट ठीक होने पर नहीं आता था। आखिर अपने गाँव के ही एक वयोवृद्ध वैद्य श्री जीवाराम जी सिंघल, जो हमारे ही खानदान के थे, के कहने पर मुझे मोर की पंख जलाकर शहद में मिलाकर चटाई गई, जिससे मैं दो दिन में ही ठीक हो गया। मेरी जिन्दगी तो बच गयी, लेकिन मेरे कान सदा के लिए खराब हो चुके थे, जिसकी किसी के पास कोई दवा नहीं थी।
यहाँ मुझे एक घटना याद आती है। मुझे देखने एक नये डाक्टर साहब आये हुए थे, जो शायद नये-नये एम.बी.बी.एस. करके निकले थे। मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ था और काफी कमजोर था। इसलिए मैंने डाक्टर साहब से कहा- ‘कोई टाॅनिक लिख दो’। यह सुनकर डाक्टर साहब चौंक पड़े। उन्होंने सोचा होगा कि यह गाँव का गँवार, पागल-सा दिखने वाला, मरियल-सा लड़का ‘टाॅनिक’ शब्द से परिचित कैसे हो सकता है? तब मेरी माताजी ने उन्हें बताया- ‘डाक्टर साहब, यह बहुत होशियार है। बीमार पड़ा हुआ है, इसलिए पागल-सा लग रहा है।’ डाक्टर साहब का समाधान हुआ या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मैंने इतना अवश्य अनुभव किया था कि वे लगभग अविश्वास से मेरी तरफ देखते रहे थे।
जब लोगों को लगा कि अब कान अपने आप ठीक नहीं हो सकेंगे, तो उन्होंने मुझे आगरा दिखा लाने की राय दी। जल्दी ही मैं अपने भाई श्री राम मूर्ति के साथ आगरा गया और वहाँ एक बहुत अनुभवी डाक्टर को दिखाया। उन्होंने मुझे इंजेक्शन और गोलियाँ लेने को कहा और ठीक होने की संभावना बतायी। लेकिन न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि अब मैं कभी ठीक नहीं हो सकूँगा। फिर भी मैंने सारी दवाइयाँ नियम से लीं। एक माह बाद उन्होंने फिर आने को कहा था। इस बार उन्होंने सिर्फ एक दवा बदल दी, लेकिन मुझे फायदा न होना था, न हुआ।
लगभग दो माह तक मैं पागलों जैसी हालत में रहा। मेरे कानों में तरह-तरह की भयानक गर्जनाओं जैसे आवाजें लगातार आती रहती थीं, जिनसे आतंकित होकर मैं घंटों चुपचाप बैठा रहता था। कई लोग प्रायः कहते थे कि इस लड़के की जिन्दगी खराब हो गयी। मुझे भी शुरू में ऐसा लगा कि अब दुनिया में मेरा जीना लगभग बेकार है और हमेशा मुझे दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा। मेरे लिए संतोष की बात सिर्फ यह थी कि मैं साक्षर हो गया था और अच्छी तरह बोल भी लेता था। यदि किसी को मुझसे कोई बात कहनी होती थी, तो उसे लिखकर बताना पड़ता था। धीरे-धीरे मैंने होठों के हिलने से शब्दों को समझने की आदत डाली। दो-एक महीने के अभ्यास के बाद ही मैं इस लायक हो गया था कि घर में सबसे लगभग बिना लिखे जरूरी बातें कर लेता था। सौभाग्य से हमारे घर में प्रायः सभी साक्षर हैं, अतः मुझे इस तरह की कोई कठिनाई नहीं होती थी। कठिनाई केवल तब आती थी, जब मुझे किसी अजनबी आदमी से बात करनी होती थी और मेरी जान-पहचान का वहाँ कोई नहीं होता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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