आत्मकथा भाग-1 अंश-17

अपने सभी अध्यापकों में जिनसे मुझे बहुत चिढ़ थी वे थे हमारे हिन्दी के शिक्षक श्री केशव देव माहेश्वरी, जिन्हें लड़के ‘के.डी.’ कहकर पुकारते थे। झकाझक सफेद कुर्ते और पाजामे में वे विद्यालय पधारा करते थे। हमारा सबसे पहला पीरियड हिन्दी का ही होता था, अतः वे सुबह-सुबह आकर कुर्सी में धँस जाते थे। प्रायः उनकी आँखें लाल पड़ी रहती थीं और लड़कों का ख्याल था कि वे भंग-भवानी के शौकीन हैं। उनका सबसे पहला काम होता था अपने किसी मुँहलगे लड़के (चमचे) को भेजकर तम्बाकू वाला पान मँगवाना। फिर वे किसी दूसरे चमचे की तरफ इशारा करते और कहते- ‘अबे गधे! खड़ा हो जा, पढ़!’ वह लड़का तुरन्त हिन्दी की कोई भी किताब खोलकर पढ़ना शुरू कर देता था। बाकी लड़के बोर होते हुए सुनते रहते थे और माहेश्वरी जी ऊँघते हुए पान की जुगाली करते रहते थे। घंटी बजते ही वे उठकर चल देते थे।
उनसे मेरी चिढ़ने की वजह यह थी कि वे मेरे जैसे पढ़ने वाले और उनकी चमचागीरी न करने वाले लड़कों से बहुत नाराज रहते थे और प्रायः उन्हें अपमानित करने का मौका ढूँढ़ते रहते थे। इसके विपरीत वे अपनी चमचागीरी करने वाले और सदा फिसड्डी रहने वाले लड़कों से बहुत खुश रहते थे। उनका दूसरा ‘गुण’ यह था कि वे अपने वरिष्ठ साथियों तक की बिल्कुल इज्जत नहीं करते थे। कई बार हमने अपनी आँखों से देखा था कि अध्यापकों के कक्ष में प्रिंसीपल साहब के आने पर सारे अध्यापक सम्मान में खड़े हो जाते थे, लेकिन माहेश्वरी जी जानबूझकर बैठे रहते थे। इस सबके कारण हम कुछ लड़कों की नजर में उनका सम्मान बहुत कम हो गया था और हम प्रायः हम उनकी उपेक्षा और अवहेलना करते रहते थे, हालांकि इससे हमारा ही नुकसान होता था।
यहाँ एक घटना मुझे याद आती है। एक बार अर्द्धवार्षिक परीक्षा में हिन्दी के पेपर में संस्कृत के कुछ रूप पूछे गये थे। संस्कृत के विद्यार्थी होने के कारण हमने प्रायः सारे रूप सही लिख दिये थे, लेकिन उन्होंने आदतन हमारे उत्तर गलत बताकर काट दिये। एक बार हमने उनसे शिकायत की कि यह उत्तर सही है, फिर काट क्यों दिया, तो उन्होंने यह किया कि उस उत्तर पर आधा नम्बर दे दिया, जबकि वह प्रश्न 2 नम्बर का था और इसके बदले में किसी दूसरे प्रश्न में जहाँ उन्होंने दो अंक दिये थे बदलकर डेढ़ कर दिये, ताकि कुल योग न बदलना पड़े। हमें इस पर गुस्सा तो बहुत आया था, लेकिन उनसे कुछ कहने का मतलब था अपनी आफत बुलाना।
लेकिन माहेश्वरी जी में एक गुण भी था। वह यह कि कभी-कभी मूड में आने पर बहुत जीवनोपयोगी बातें बताया करते थे। आत्मनिर्भरता का पाठ मैंने सबसे पहले उन्हीं से सीखा था।
मैं कक्षा 8 में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुआ था। अतः मुझे छात्रवृत्ति की उम्मीद भी थी और जरूरत भी क्योंकि हमारी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी। मैं अपने हिसाब से ठीक तैयारी के साथ छात्रवृत्ति की परीक्षा में बैठा। उसमें चार पर्चे थे- गणित, हिन्दी, अंग्रेजी और सामान्य ज्ञान। मेरे सारे पेपर अच्छे हुए थे केवल सामान्य ज्ञान के पेपर को छोड़कर। फिर भी मुझे विश्वास कि इसमें भी मुझे 40 अंक अवश्य मिल जायेंगे। परिणाम निकलने पर मालूम पड़ा कि उसमें केवल मेरे 25 अंक थे अर्थात मात्र उत्तीर्ण, जबकि गणित में मेरे अंक थे 96 शायद उच्चतम। मेरे लिए संतोष की बात यह थी कि छात्रवृत्ति मुझे मिल चुकी थी। यद्यपि उसकी राशि मात्र 10 रुपये मासिक थी। लेकिन मेरे लिए वह बहुमूल्य थी, क्योंकि यह हमारी आर्थिक स्थिति का ही नहीं, बल्कि मेरी आत्मनिर्भरता और प्रतिष्ठा का भी प्रश्न था।
घर आकर मैंने माताजी को यह शुभ समाचार सुनाया और उनके पैर छुए। मेरे बड़े भाइयों ने भी संतोष व्यक्त किया कि आखिर छात्रवृत्ति मिल गयी, हालांकि उनका यह भी कहना था कि अगर सामान्य ज्ञान के पेपर में एक अंक भी कम हो जाता तो छात्रवृत्ति नहीं मिलती। मैंने अपने बड़े मामाजी श्री दयालचन्द गोयल से भी नमस्ते की, क्योंकि भांजा होने के कारण मैं उनके पैर नहीं छू सकता था। संयोग से उस दिन 1973 की पहली जनवरी थी। मामा जी ने समझा कि मैं नये वर्ष की नमस्ते कर रहा हूँ, लेकिन जब मैंने उन्हें बताया कि मुझे छात्रवृत्ति मिल गयी है, तो वे बहुत प्रसन्न हुए।
इन्हीं दिनों मेरी क्रिकेट में रुचि जागृत हुई जैसा कि शहरों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए स्वाभाविक है। आजकल तो यह हाल है कि शहरों के बच्चे आधुनिक अभिमन्यु की तरह पेट से बाहर आने से पहले ही क्रिकेट और डिस्को सीख लेते हैं। लेकिन आप विश्वास नहीं करेंगे कि कक्षा 9 में पढ़ने के लिए आगरा आने से पहले मैंने क्रिकेट, हाकी वगैरह का केवल नाम ही सुना था। बैडमिंटन को चिड़िया बाॅल कहा करता था और हाकी की स्टिक मात्र देख रखी थी। टेबिल टेनिस, टेनिस, कैरम, ब्रिज जैसे खेलों के अस्तित्व से मैं पूरी तरह अनभिज्ञ था। आगरा आने पर मैंने भी अपनी कक्षा के लड़कों की देखा-देखी क्रिकेट में रुचि लेना शुरू किया। हालांकि मुझे सिर्फ बैटिंग करने को मिलती थी, जिसमें मैं प्रायः पहली या दूसरी गेंद पर क्लीन बोल्ड हो जाता था।
लेकिन मैंने एक दिन एक रन भी बनाया और संयोग से उस दिन आउट नहीं हुआ। वह रन मेरे द्वारा बनाया गया पहला और उस विद्यालय में आखिरी रन था, क्योंकि उसके बाद मुझे खेलने का अवसर ही नहीं मिला। कुछ इसलिए भी कि कक्षा में मुझसे बहुत अच्छे-अच्छे खिलाड़ी मौजूद थे। गाँव के खेलों जैसे कबड्डी, गित्ती-फोड़ और कंचा-गोली में मैं अभी भी पूर्ण पारंगत हूँ और प्रायः इन्हीं खेलों को आगरा में खेला करता था।
लेकिन आप यह न समझें कि क्रिकेट में मेरी रुचि समाप्त हो गयी थी। सत्य तो यह था कि मैं क्रिकेट में और ज्यादा रुचि लेने लगा था। उन दिनों टाॅनी लुइस की कप्तानी में एम.सी.सी. (इंग्लैण्ड) की क्रिकेट टीम भारत में टेस्ट मैच खेलने आयी हुई थी। उस अवधि में मेरा क्रिकेट ज्ञान इतना बढ़ गया था कि मैं स्वयं को क्रिकेट का विशेषज्ञ समझने लगा था, हालांकि मैं स्वयं क्रिकेट नहीं खेलता था। कहावत है कि मैं अंडे नहीं देता, लेकिन आमलेट के बारे में मुर्गी से ज्यादा जानता हूँ। यह कहावत यहाँ सही उतरती थी।
मुझे राजनीति में भी काफी दिलचस्पी रही है और अखबार पढ़ने का मुझे व्यसन-सा है। मुझे याद है कि गाँव में हमारे यहाँ दिल्ली से छपने वाला ‘वीर अर्जुन’ नामक अखबार आया करता था, जिसके शीर्षक कभी-कभी मैं भी पढ़ लेता था, हालांकि उन दिनों कुछ समझ में नहीं आता था। बाद में वह अखबार आना बन्द हो गया था। आगरा में आने पर मैं प्रायः रोज ही शाम को और कभी-कभी सुबह भी वाचनालयों में जाया करता था।
लोहामंडी, आगरा में उन दिनों दो वाचनालय थे- एक था श्री वीर पुस्तकालय एवं वाचनालय, जो नौबस्ता चैराहे के पास मंजूमल की बगीची में था और दूसरा था शिवहरे वैश्य वाचनालय एवं पुस्तकालय, जो आलमगंज में श्री राधाकृष्ण के मन्दिर में था। मैं इन दोनों वाचनालयों में आने वाले लगभग सभी अखबार और अधिकांश पत्रिकाओं का पारायण किया करता था। दुर्लभ पत्रिकाओं के लिए मैं कभी-कभी नागरी प्रचारिणी सभा पुस्तकालय, गोकुलपुरा तथा जाॅन्स पब्लिक लाइबे्ररी, पालीवाल पार्क में भी जाता था। पढ़ने की इस आदत के कारण मेरे सामान्य ज्ञान में काफी वृद्धि हुई। हालांकि अत्यधिक मानसिक श्रम के कारण मेरे स्वास्थ्य पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता था। इन सब पुस्तकालयों की दूरी मैं पैदल ही तय करता था, क्योंकि उन दिनों हमारी आर्थिक स्थिति रिक्शों का व्यय उठाने की नहीं थी और टैम्पो जैसे सस्ते साधन तब उपलब्ध नहीं थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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